टैगोर जयंती 2021 : ऐसे गुरुदेव जिनका अद्वितीय योगदान तीन देशों के राष्ट्रगान में

टैगोर असाधारण प्रतिभा वाले ऐसे शख्स थे, जिनकी प्रतिभा का विस्तार एक नहीं अनेक क्षेत्रों और विषयों तक था.

टैगोर असाधारण प्रतिभा वाले ऐसे शख्स थे, जिनकी प्रतिभा का विस्तार एक नहीं अनेक क्षेत्रों और विषयों तक था.

गुरुदेव रवींद्र नाथ टैगोर की आज जन्मतिथि है. उनका जन्म 07 मई 1861 में कोलकाता में हुआ था. वो असाधारण प्रतिभा वाले शख्स थे. चित्रकारी से लेकर गायन तक के क्षेत्र में उनकी अद्भुत उपलब्धियां हैं. उनकी कृति गीतांजलि को नोबल पुरस्कार मिला लेकिन भारत समेत तीन देशों के राष्ट्रगान में भी उनका अद्वितीय योगदान है. जानिए कैसे-

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20वीं शताब्दी के शुरुआती दशकों में भारतीय राजनीति को दो ऐसे राजनेता मिले, जो अद्वितीय विचारक भी थे. उन्होंने राष्ट्रीय ही नहीं अंतरराष्ट्रीय स्तर पर छाप छोड़ी. ये थे महात्मा गांधी और रवींद्रनाथ टैगोर. गांधीजी ने जहां अपने सत्य और अहिंसा के मूल्यों से दुनिया को नई राह दिखाई तो टैगोर ने अपने आधुनिक विचारों, कविताओं और राष्ट्रवाद पर विचारों के जरिए एक नई लीक खींची.

हालांकि कभी-कभी दोनों के विचार एक-दूसरे के विरोधी भी रहे. लेकिन गहराई से विचार करें तो दोनों के विचार एक-दूसरे के पूरक थे. टैगोर के राष्ट्रवाद संबंधी विचारों की तो आज भी धाक है. कवि, कहानीकार, गीतकार, संगीतकार, निबंधकार, नाटककार और चित्रकार सभी रहे रवींद्रनाथ टैगोर की आज जयंती है. ऐसे में हम उनके एक ऐसे योगदान के बारे में भी बताएंगे, जो दुनिया में शायद किसी और शख्स के नाम नहीं है.

लंदन गए, कानूनी पढ़ाई की लेकिन डिग्री नहीं ली

रवींद्रनाथ टैगोर का जन्म कलकत्ता के जोड़ासांको ठाकुरबाड़ी में हुआ था. उनके पिता देवेंद्रनाथ टैगोर एक जाने-माने समाज-सुधारक थे. टैगोर की पढ़ाई सेंट जेवियर स्कूल से हुई थी. लंदन में उन्होंने कानून की पढ़ाई की पर बिना डिग्री लिए ही वापस चले आये. टैगोर की शादी 1883 में मृणालिनी देवी के साथ हुई थी.

अपने बड़े भाई के कहने पर वह लंदन में कानून की पढ़ाई करने गए. वहां रहकर पढ़ाई भी की लेकिन बगैर डिग्री लिए वापस लौट आए.

गीतांजलि के लिए मिला नोबेल पुरस्कार

रवींद्रनाथ टैगोर को 'गुरुदेव' भी कहा जाता है. बचपन में ही उनका रुझान कविता और कहानी लिखने की ओर हो चुका था. उन्होंने अपनी पहली कविता 8 साल की उम्र में लिखी थी. 1877 में वह 16 साल के थे जब उनकी पहली लघुकथा प्रकाशित हुई थी.



गुरुदेव को उनकी सबसे लोकप्रिय रचना गीतांजलि के लिए 1913 में नोबेल अवॉर्ड से सम्मानित किया गया था. टैगोर को 'नाइटहुड' की उपाधि भी मिली हुई थी. जिसे टैगोर ने जलियांवाला बाग हत्याकांड (1919) के बाद अपनी लौटा दिया था. 1921 में उन्होंने 'शांति निकेतन' की नींव रखी थी. जिसे 'विश्व भारती' यूनिवर्सिटी के नाम से भी जाना जाता है.

गीतांजलि के रूप में बांग्ला में प्रकाशित उनकी कविताओं का जब अंग्रेजी में अनुवाद हुआ तो यूरोप इसे लेकर प्रभावित हुए बगैर नहीं रह सका. इन कविताओं में अगर ताजगी थी तो जीवन के प्रति नया दृष्टिकोण और आध्यात्मिकता भी.

तीन देशों के राष्ट्रगान से जुड़ता है नाम

टैगोर की रचनाएं दो देशों का राष्ट्रगान बनीं. भारत का 'जन गण मन' और बांग्लादेश का 'आमार सोनार बांग्ला' उन्हीं की रचनाएं हैं. वहीं श्रीलंका का राष्ट्रगीत 'श्रीलंका मथा' भी टैगोर की कविताओं की प्रेरणा से बना है. इसे लिखने वाले आनंद समरकून शांतिनिकेतन में रवींद्रनाथ टैगोर के पास रहे थे. उन्होंने कहा था कि वे टैगोर स्कूल ऑफ पोएट्री से बेहद प्रभावित थे.

दुखद यह है कि कुछ साल पहले टैगोर की रचनाओं को बांग्लादेश की स्कूली किताबों से हटाने की बात सामने आई थी. दो साल पहले वहां की सरकार ने स्कूल सिलेबस में बदलाव किया था. कक्षा 6 की किताब से टैगोर की कविता ‘बांग्लादेशर हृदोय’ को हटा दिया गया था जिसमें टैगोर ने अपनी मातृभूमि की खूबसूरती का जिक्र किया है.

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