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सत्ता विरोधी रहा है राहुल बजाज का परिवार, नेहरू-गांधी के खिलाफ भी खोला था मोर्चा

Sanjay Srivastava | News18Hindi
Updated: December 2, 2019, 9:52 PM IST
सत्ता विरोधी रहा है राहुल बजाज का परिवार, नेहरू-गांधी के खिलाफ भी खोला था मोर्चा
जाने - माने भारतीय उद्योगपति राहुल बेबाक हैं. उनकी छवि आमतौर पर खरी-खरी कहने वाले की है. उनका परिवार देश का ऐसा परिवार भी है, जो उद्योगजगत का सितारा भी रहा है और भारतीय राजनीति से भी सरोकार रखता है. बजाज कई बार धारा के खिलाफ जाकर अपनी बात कहने से सुर्खियों में रहे हैं. वो जानते थे कि उन्हें ट्रोल किया जाएगा लेकिन उन्हें जो कहना था वो सब उन्होंने कह ही डाला.

जाने - माने भारतीय उद्योगपति राहुल बेबाक हैं. उनकी छवि आमतौर पर खरी-खरी कहने वाले की है. उनका परिवार देश का ऐसा परिवार भी है, जो उद्योगजगत का सितारा भी रहा है और भारतीय राजनीति से भी सरोकार रखता है. बजाज कई बार धारा के खिलाफ जाकर अपनी बात कहने से सुर्खियों में रहे हैं. वो जानते थे कि उन्हें ट्रोल किया जाएगा लेकिन उन्हें जो कहना था वो सब उन्होंने कह ही डाला.

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  • Last Updated: December 2, 2019, 9:52 PM IST
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राहुल बजाज (Rahul Bajaj) को जो लोग नजदीक से जानते हैं, वो कहते हैं कि वो कभी उन लोगों में नहीं रहे जो दबाव और हालात को ध्यान में रखकर सुविधानुसार अपनी बात कहें. वो बेलाग और बेबाक बात करने वाले के तौर पर जाने जाते हैं. आलोचनाओं, ट्रोलिंग से उन्हें भय नहीं लगता. वो ऐसे परिवार से भी आते हैं, जो नेहरू-गांधी परिवार के बहुत करीब भी रहा लेकिन सही बातों पर उनके विरोध से भी नहीं चूका.

राहुल दो दिनों से जमकर ट्रोल हो रहे हैं. उन्हें अंदाज रहा होगा कि ऐसा हो सकता है. वो हार्वर्ड में पढ़े-लिखे हैं. हर साल दावोस के वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम (World Economic Forum) में जाते हैं. वो ऐसी हस्ती भी हैं जो अक्सर अपनी नाव को धारा के खिलाफ खेते हैं. फोर्ब्स उन्हें दुनिया के 1000 धनी लोगों की सूची में भी रखता है

उन्होंने मुंबई में एक प्रोग्राम में भाजपा अध्यक्ष और गृह मंत्री अमित शाह की मौजूदगी में कहा, लोग मौजूदा केंद्र सरकार से डरने लगे हैं, अपनी बात नहीं कहते, कृपया ऐसी स्थिति मत आने दीजिए.

उसके बाद ट्विटर से लेकर सोशल मीडिया तक उन्हें कोसने और नसीहते देने तांता लग गया. केंद्र सरकार के कई नेताओं ने भी मोर्चा खोल दिया.

राहुल बजाज उस परिवार के हैं, जो आजादी की लड़ाई के दौरान मजबूती से गांधीजी के साथ खड़ा रहा. उनके बाबा जमनालाल बजाज ना केवल गांधीजी के विश्वस्त सहयोगी थे बल्कि एक बड़े उद्योग साम्राज्य के मालिक भी.

नेहरू ने किया था राहुल का नामकरण 
साबरमती आश्रम छोड़ देने के बाद गांधीजी ने जमनालाल बजाज के कहने पर ही वर्धा को केंद्र बनाया. जगह बजाज परिवार ने ही उपलब्ध कराई. जमनालाल बजाज को गांधी अपना पांचवां पुत्र कहते थे. बहुत कम लोगों को मालूम होगा कि नेहरू ने ही राहुल बजाज का नामकरण किया, जिसे जब उन्होंने मुंबई के कार्यक्रम में सार्वजनिक तौर पर अपने अंदाज में कहा तो एकबारगी वहां हंसी की लहर भी दौड़ गई.

इमर्जेंसी में संजय गांधी के निशाने पर रहा परिवार
जमनालाल बजाज के दोनों बेटे रामकृष्ण और कमलनयन उद्योग के साथ भारतीय राजनीति से भी जुड़े रहे. रामकृष्ण अगर 1942 से लेकर 1946 तक जेल में रहे तो इमर्जेंसी में उन्हें इंदिरा गांधी के शासनकाल में खासा परेशान किया गया. वो राहुल के चाचा थे. जमनालाल के छोटे बेटे.
जब नेहरू ने मुंबई के वीके कृष्णमेनन को कांग्रेस प्रत्याशी बनाया तो सार्वजनिक तौर पर उन्होंने अपना विरोध जाहिर कर दिया.

इस तरह नेहरू का विरोध भी किया 
मेनन नेहरू के बहुत करीबी थे. इस विरोध का मतलब था नेहरू का विरोध. मेनन जीत गए. रामकृष्ण ने कांग्रेस से इस्तीफ़ा दे दिया. नेहरू से रिश्ते तनावपूर्ण हुए, लेकिन उनके खिलाफ सत्ता का इस्तेमाल नहीं हुआ.

लेकिन जब आपातकाल लगा तब रामकृष्ण को 21 महीनों तक परेशान किया गया. संजय गांधी और उनके सहयोगियों ने उनके विश्व युवा केंद्र को राष्ट्रविरोधी गतिविधियों का अड्डा बताया. रामकृष्ण डरे नहीं.

राहुल के पिता की इंदिरा से खटकी 
राहुल के पिता कमलनयन वर्धा से 1957 से लेकर 1971 तक सांसद रहे. वो वर्धा से चुनाव लड़कर लोकसभा में तीन बार पहुंचे. बाद में उनके रिश्ते इंदिरा से तनावपूर्ण होने लगे. वो 1966 में इंदिरा गांधी का साथ छोड़कर कांग्रेस (ओ) में चले गए. इसे जरूर इंदिरा ने अपने मन में रख लिया.

राहुल के बाबा जमनालाल गांधी के विश्वस्त सहयोगी थे तो राहुल का नामकरण नेहरू ने किया था


इससे अंदाज लगा सकते हैं कि ये ऐसा उद्योग घराना है जो धारा के खिलाफ खड़े रहने की हिम्मत रखता है. राहुल इसी की कड़ी हैं. वो अक्सर बेबाक बोलते हैं. चाहे सरकार एनडीए की हो या फिर यूपीए की-अगर उन्हें कुछ गलत लगा, तो उन्होंने उसे कभी छिपाया भी नहीं.

बेबाक वचन 
जब नोटबंदी हुई तो उसके करीब आठ महीने बाद उन्होंने कहा कि ये गलत हुआ,क्योंकि नोटबंद सकारात्मक परिणाम नहीं निकलेंगे.

इससे पहले वो वर्ष 2013 में यूपीए सरकार की लानत-मलामत करते हुए उनपर इकोनॉमी से खिलवाड़ करने का जिम्मेदार बता चुके थे. हालांकि जब देश 90 के दशक मेंं उदारीकरण के लिए नई नीतियां बनाकर दरवाजे खोल रहा था तब वो नहीं चाहते थे कि ऐसा हो. उदारीकरण शुरू होते ही कहीं ना कहीं ये नजर आया कि इसका असर उनके उत्पादों पर भी पड़ा.

इसके बाद इसी साल मार्च में वो बजाज आटो के एजीएम में जब बोलने के लिए खड़े हुए तो उन्होंने कहा, ये वास्तविकता है कि मंदी आ गई है.

वो राज्यसभा में रहते हुए कभी सरकार को थपथपाते तो आलोचना के मौके पर उन्हें पिन भी चुभोते. वर्ष 2001 में जब उन्हें पदमश्री मिला तो केंद्र में अटलबिहारी वाजपेयी की सरकार थी.

राहुल हमेशा से बेबाक बोलने वालों के तौर पर माने जाते हैं, जिन्होंने कभी राज्यसभा में बहस के दौरान उन्हें सुना हो, वो जानता होगा कि वो किस कदर अपनी बात कहने से कभी पीछे नहीं हटते


तब बजाज स्कूटर पर लंबी वेटिंग होती थी
जब राहुल बजाज ने अपने पिता कमलनयन से पारिवार के उद्योगों को हाथ में लिया तो उनसे एक कदम आगे बढ़ गए. बजाज स्कूटर, तिपहिया, सीमेंट और इलैक्ट्रिक उपकरणों में बजाज समूह की तूती बोलती थी. वो समय परमिट राज का समय था, बजाज स्कूटर के लिए लंबा इंतजार करना पड़ता था तो सीमेंट परमिट से मिलता था. तब लोग कहा करते थे कि देश की नीतियों का सबसे ज्यादा फायदा जो समूह उठा रहा है, उसमें बजाज भी हैं.

हालांकि राहुल बजाज को ऐसे उद्योगपतियों में भी गिना जाता है, जिन्होंने अपने कड़े नियम बनाए. उस पर चले भी. शायद उनके अंदर भी ये परिवार का ही गुण आया है कि वो अक्सर सत्ता में रहने वाली पार्टी को ही कठघरे में खड़ा कर लेते हैं.

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First published: December 2, 2019, 9:44 PM IST
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