Rahul Gandhi Birthday: दो बार सत्ता को ठुकरा सियासत के बियाबान में अपना रास्ता तलाशते राहुल गांधी

राहुल गांधी आज यानी 19 जून को जन्मदिन मना रहे हैं और जीवन के 50वें साल में प्रवेश कर रहे हैं. सक्रिय राजनीति में 15 सालों का उनका सफर कैसा रहा और इससे पहले उनके जीवन में क्या खास रहा?

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Updated: June 19, 2019, 6:18 PM IST
Rahul Gandhi Birthday: दो बार सत्ता को ठुकरा सियासत के बियाबान में अपना रास्ता तलाशते राहुल गांधी
राहुल गांधी. फाइल फोटो.
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Updated: June 19, 2019, 6:18 PM IST
19 जून यानी आज वर्तमान कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी का जन्मदिन है. नेहरू-गांधी खानदान के वारिस के तौर पर राहुल गांधी इस समय देश की राजनीति के एक छोर कहे जाते हैं. हाल में संपन्न लोकसभा चुनावों में कांग्रेस को आशातीत सफलता न मिल पाने के बाद राहुल ने कांग्रेस अध्यक्ष पद से इस्तीफे की पेशकश कर दी है. इस फैसले को कांग्रेस के नज़रिए से अहम मोड़ माना जा रहा है. उनके जन्मदिन के मौके पर उनके सियासी सफर की झलकियों के साथ ही कुछ और खास बातें भी जानिए.

राहुल गांधी का सियासी सफर ठीक तरह से साल 2004 में शुरू हुआ जब उन्होंने पहली बार अमेठी से चुनाव लड़ा था. इससे पहले उनकी ज़िंदगी में क्या खास रहा और वह राजनीति में सक्रिय नहीं थे, तो क्या करते थे? सियासी सफर से पहले इस सवाल का जवाब जानिए.

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कैम्ब्रिज के राहुल विंची से मुंबई की कंपनी तक

राहुल गांधी की प्रारंभिक शिक्षा देहरादून के दून स्कूल में हुई. इसके बाद दिल्ली के सेंट स्टीफन कॉलेज में उन्होंने पढ़ाई की. फिर राहुल ने अमेरिका और इंग्लैंड जाकर हार्वर्ड और ट्रिनिटी जैसे संस्थानों से उच्च शिक्षा हासिल की, साथ ही एमफिल की डिग्री भी. इसी दौरान राजीव गांधी की हत्या हुई थी, इसलिए राहुल को सुरक्षा कारणों से कैम्ब्रिज में राहुल विंची के नाम से भी रहना पड़ा था. यह भी उल्लेखनीय है कि ट्रिनिटी कॉलेज से ही राहुल के पिता राजीव गांधी और परदादा जवाहरलाल नेहरू भी ग्रेजुएट हुए थे.

ग्रेजुएशन के बाद राहुल ने लंदन में मॉनिटर ग्रुप की एक कंपनी में तीन साल काम किया था. उसके बाद राहुल भारत आकर एक स्ट्रैटजी कंसल्टेंसी कंपनी से जुड़े थे. साल 2002 में वो मुंबई बेस्ड कंपनी बैकॉप्स सर्विसेज़ प्राइवेट लिमिटेड कंपनी के डायरेक्टरों में शुमार थे. इसके बाद 2004 में राहुल ने सक्रिय राजनीति में अपनी पारी की शुरुआत की.

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अमेठी से जीतना और संगठन में ज़िम्मेदारी
अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार के खिलाफ 2004 में कांग्रेस ने चुनाव लड़ा और जीता. राहुल ने कांग्रेस की इस जीत से अपनी सियासी करियर की शुरुआत की और खुद अमेठी से चुनाव जीतकर सांसद बने, जहां से उनके पिता राजीव गांधी चुनाव जीतते रहे थे. कांग्रेसनीत यूपीए की सरकार बनी और इसके बाद राहुल गांधी को पार्टी में महासचिव पद सौंपा गया. साथ ही, युवा कांग्रेस और एनएसयूआई की ज़िम्मेदारी भी राहुल के पास आई.

पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की सरकार में शामिल न होने के फैसले के बाद राहुल संगठन के लिए काम करते रहे. विरोधी पार्टियों ने राहुल गांधी की खिल्ली उड़ाने का कोई मौका नहीं छोड़ा. लेकिन, राहुल अपने सियासी सफर में अपना रास्ता खुद बनाने की तरफ बढ़ते रहे.

यूपीए 2 के समय पीएम बनने से इनकार
साल 2009 के आम चुनाव के बाद यूपीए की ​सरकार फिर बनी और इस समय कांग्रेस में राहुल गांधी को प्रधानमंत्री तक बनाए जाने की मांग उठी थी. यहां तक कि खुद मनमोहन सिंह ने भी कहा था कि उन्हें राहुल के नेतृत्व में काम करने में खुशी होगी. लेकिन, राहुल गांधी ने पीएम ही नहीं बल्कि ​सरकार में कोई भी पद न लेने का फैसला किया. तबसे अब तक जब भी राहुल के पीएम बनने की चर्चा चली, राहुल ने यही कहा कि ये फैसला जनता का होगा. अगर कांग्रेस पूर्ण बहुमत के साथ सरकार बनाती है, तभी वह पीएम बनने का फैसला लेंगे.

चर्चा में रहे राहुल के बगावती तेवर
मनमोहन सिंह की सरकार के समय दागी नेताओं को बचाने संबंधी एक अध्यादेश को राहुल गांधी ने मीडिया के सामने फाड़कर बगावती तेवर दिखाए थे. इसे अपनी ही सरकार के खिलाफ राहुल की बगावत करार दिया गया था, जिस पर मिश्रित प्रतिक्रियाएं मिली थीं. इससे पहले, 2011 में उत्तर प्रदेश में मायावती के सीएम रहते हुए भट्टा परसौल कांड में बसपा सरकार का विरोध करते हुए राहुल जब एक बाइक पर बैठकर पुलिस को चकमा देते हुए गांव के भीतर पहुंच गए थे. इस कारण तब उन्हें गिरफ्तार भी किया गया था. इस घटना से राहुल ने अपने बगावती इरादे साफ ज़ाहिर किए थे.

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प्रियंका गांधी और राहुल गांधी. फाइल फोटो.


राज्यों में कई बार हार और पार्टी अध्यक्ष पद
साल 2009 में राहुल गांधी की पहली बड़ी सियासी परीक्षा तब हुई थी, जब उन्हें उत्तर प्रदेश में आम चुनाव के सिलसिले में प्रचार अभियान की ज़िम्मेदारी दी गई थी. उत्तर प्रदेश में तब 80 लोकसभा सीटों में से 22 सीटें जीतीं, जो बीते कुछ सालों में कांग्रेस के लिए बेहतर आंकड़ा था. लेकिन, इसके बाद विधानसभा चुनावों में राहुल को लगातार निराशा मिलती रही. उत्तर प्रदेश में कांग्रेस की जड़ें अब तक नहीं जम सकी हैं.

वहीं, बिहार में 2010 के विधानसभा चुनावों में भी कांग्रेस को बेहद निराशा हाथ लगी, क्योंकि 243 विधानसभा सीटों में से सिर्फ 4 पार्टी के हाथ लगीं. इसके लिए भी राहुल ने जी तोड़ मेहनत की थी, जो रंग नहीं लाई. इसी तरह देश भर के कई राज्यों में छोटी मोटी कामयाबियों के बावजूद अक्सर राहुल के नाम के साथ हार का टैग जुड़ता गया. इस बीच, साल 2017 में सोनिया गांधी ने कांग्रेस अध्यक्ष पद छोड़ा और राहुल ने यह पद संभाला.

मोदी को गले लगाना फिर तीन राज्य जीतना
पिछले साल 2018 में संसद के मानसून सत्र के दौरान लोकसभा में अपने भाषण के बाद राहुल गांधी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से गले मिलने के कारण चर्चा में रहे थे. उसके बाद पिछले साल के आखिर में कांग्रेस पार्टी को एक उल्लेखनीय कामयाबी हाथ लगी. राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में लंबे समय से काबिज़ भाजपा सरकार को शिकस्त देते हुए कांग्रेस ने राज्यों में सरकार सरकार बनाई. इन तीन राज्यों में जीत को राहुल गांधी के लिए बड़ी कामयाबी माना गया, क्योंकि इसके कुछ ही महीने बाद लोकसभा चुनाव होने थे और इस जीत को आम चुनाव में फायदे के तौर पर देखा जा रहा था.

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लोकसभा में मोदी से गले मिलते राहुल गांधी. (फाइल फोटो)


और हालिया हार के बाद राहुल का इस्तीफा
लोकसभा चुनाव 2019 में कांग्रेस को उम्मीदें ज़्यादा थीं लेकिन नतीजा 2014 के चुनाव नतीजों से मिलता जुलता ही रहा. कांग्रेस सिर्फ 52 लोकसभा सीटें जीत सकी. साथ ही, राहुल गांधी को अमेठी में भी हार का स्वाद चखना पड़ा. केंद्र में एक बार फिर नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली भाजपा सरकार बनी. इस बड़ी हार के बाद राहुल गांधी ने कांग्रेस अध्यक्ष पद से इस्तीफे की पेशकश कर दी. उन्होंने पार्टी को एक माह के भीतर नया अध्यक्ष चुन लेने का वक्त देते हुए कहा है कि वह पार्टी के लिए लगातार काम करते रहेंगे.

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First published: June 19, 2019, 9:58 AM IST
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