रेलवे ने अपनाई ये तकनीक, लोगों ने बंद कर दिया ट्रेन के सामने कूदना

नीली लाइट लगाकर आत्यहत्या रोकने की ये कोशिश नज तकनीक (nudge technique) कहलाती है.

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Updated: July 31, 2019, 4:44 PM IST
रेलवे ने अपनाई ये तकनीक, लोगों ने बंद कर दिया ट्रेन के सामने कूदना
नीली लाइट लगाकर आत्यहत्या रोकने की ये कोशिश नज तकनीक (nudge technique) कहलाती है. (प्रतीकात्मक फोटो)
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Updated: July 31, 2019, 4:44 PM IST
कुछ सालों पहले एक रिसर्च पेपर ने दुनिया में तहलका मचा दिया था. इस पेपर में दावा किया गया कि किसी भी जगह और खासकर रेलवे स्टेशनों पर नीली लाइटें लगवाने पर खुदकुशी का प्रतिशत काफी कम हो सकता है. ये महज दावा नहीं था. वैज्ञानिकों ने जापान के रेलवे स्टेशनों पर ये प्रयोग किया और रेलवे स्टेशनों पर आत्महत्या की दर 84 प्रतिशत तक कम हो गई.

जापान में युवाओं में आत्महत्या का प्रतिशत तेजी से बढ़ा है. साल 2014 में रोज लगभग 70 जापानी युवा खुदकुशी कर रहे थे. ऐसे एक साल में 25 हजार से ज्यादा लोगों ने खुदकुशी की. सुसाइड के मामले में जापान विकसित देशों में सबसे ऊपर है. इसे रोकने के लिए जापान में नए-नए तरीके खोजे जा रहे हैं. रेलवे स्टेशनों पर नीली लाइटें लगवाना इसी में से एक तरीका रहा.

साल 2000 से 2010 तक जापान के 71 रेलवे स्टेशनों पर ब्लू लाइटें लगवाई गईं. इसमें टोक्यो के स्टेशन भी थे, जिनमें 29 स्टेशनों पर ब्लू लाइटें इन्सटॉल की गईं. पैनल डाटा का इस्तेमाल करते हुए इन्हें एक-दूसरे से जोड़ा गया. इसके बाद लगातार 10 सालों तक नजर रखी गई.



नतीजे चौंकाने वाले रहे. लाइटों वाले स्टेशनों में आत्महत्या करने वाले लोगों की दर तेजी से घटी और ओवरऑल खुदकुशी का प्रतिशत 84 प्रतिशत तक कम हुआ. इसके बाद ये आइडिया और भी कई देशों में अपनाया गया. ब्रिटेन के स्कॉटलैंड में एक जगह और गेटविक एयरपोर्ट ट्रेन स्टेशन पर भी नीली लाइटें लगाई गईं.

नीली लाइट लगाकर आत्यहत्या रोकने की ये कोशिश नज तकनीक (nudge technique) कहलाती है. इसमें रोशनी की मदद से बिहेवियर पर असर डाला जाता है. एक और स्टडी में पाया गया कि ब्लू लाइट्स से डिप्रेशन घटता है. इस स्टडी के तहत डिप्रेशन से गुजर रहे लोगों को नीली रोशनी वाले कमरों में लिटाया गया. थोड़ी ही देर बाद अवसाद का प्रतिशत कम हो गया.

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कई तरह की बीमारियों के इलाज में नीली लाइट्स का इस्तेमाल होता है. इसमें सीजनल एफेक्टिव डिसऑर्डर, अलग-अलग स्तर का डिप्रेशन, जेट लेग, स्लीप डिसऑर्डर और डिमेंशिया जैसी बीमारियां शामिल हैं. स्किन की कई बीमारियों में भी इसका उपयोग होता है.



इसपर भी शोध हो रहे हैं कि क्या सिर्फ नीली रोशनी में ये असर होता है या फिर कोई भी तेज रोशनी लोगों पर ऐसा असर डालती है. यूनवर्सिटी ऑफ लीड्स में कलर एंड डिजाइन एक्सपर्ट स्टीफन वेस्टलैंड कहते हैं कि नीली रोशनी मन को शांत करती है लेकिन डिप्रेशन या खुदकुशी के इरादे पर असर डालती है, ऐसा कोई प्रमाण नहीं. उनके अनुसार रोशनी का मन पर काफी असर होता है. यहां तक कि सीजनल एफेक्टिव डिसऑर्डर (SAD)के इलाज में भी लाइट थैरेपी दी जाती है लेकिन इससे ये साबित नहीं होता कि खुदकुशी जैसा इरादा भी इससे टाला जा सकता है.

जापान में खुदकुशी की दर इतनी ज्यादा क्यों है, इसपर भी लगातार पड़ताल हो रही है. जापान में मरने के इस कदम को जिम्मेदारी उठाने की तरह देखा जा रहा है. इस देश में इन्श्योरेंस नियम खुदकुशी के बाद मरने वाले का कर्ज चुकाते हैं. युवा इसे इसी तरह से लेते हैं कि जब सारे कदम फेल हो जाएं तो मरने पर इन्श्योरेंस कंपनी कर्ज चुका देगी.

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First published: July 31, 2019, 4:44 PM IST
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