राजस्थान के वो हिंदू महाराजा, जो जिन्ना से मिलकर पाकिस्तान में विलय के लिए तैयार थे

आजादी के समय जोधपुर के महाराजा हनवंत सिंह
आजादी के समय जोधपुर के महाराजा हनवंत सिंह

जब भारत के बंटवारे (Partition of India) के साथ देश की आजादी (Freedom) की तारीख तय हो गई तो देशभर में स्वतंत्र रियासतों ( Indian princely state ) के राजाओं से भारत और पाकिस्तान (India and Pakistan) में विलय के लिए कहा गया. तब राजस्थान के दो राजा इतने क्षुब्ध थे कि उन्होंने पाकिस्तान के साथ हिंदू रियासत के विलय का फैसला कर लिया था. गुपचुप जिन्ना (Mohammad Ali Jinnah) से मुलाकात भी कर आए

  • News18India
  • Last Updated: September 21, 2020, 11:51 AM IST
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जब भारत की आजादी का दिन तय हो गया और ये भी तय हो गया कि भारत और पाकिस्तान के भौगोलिक क्षेत्र में आने वाली रियासतों के राजाओं को इन दोनों देशों में अपने राज्यों का विलय करना होगा तो कई हिंदू राजा भी ऐसे थे, जो किसी भी हालत में ऐसा करना नहीं चाहते थे. उसी में एक थे जोधपुर के महाराजा. जिन्होंने महाराजा जैसलमेर के साथ मिलकर दिल्ली में छिपकर जिन्ना से मिलने का बंदोबस्त किया.

कॉलिंस और डोमिनिक लेपियर की किताब फ्रीडम एट मिडनाइट में इसका विस्तार से वर्णन है. जून 1947 में हनवंत सिंह अपने पिता के निधन के बाद जोधपुर के महाराजा बने थे. उनके कई बहुत महंगे शौक थे. जैसे हवाई जहाज उड़ाना, औरतें और जादूगरी के तमाशे. उन्होंने पड़ोसी महाराजा जैसलमेर के साथ मिलकर जिन्ना से मिलने का इंतजाम किया. वो उनसे पूछना चाहते थे कि अगर वो अपनी हिंदू रियासतों को लेकर उनके पाकिस्तान में आ मिलें तो किस तरह के स्वागत की आशा कर सकते हैं.

जोधपुर राज्य को ऐतिहासिक तौर पर मारवाड साम्राज्य के नाम से जाता था. ब्रिटिश राज में ये प्रिंसले स्टेट बन गया था. इसकी राजधानी जोधपुर थी.



जिन्ना खुश हो गए
जिन्ना को जब ये पता चला कि दो हिंदू राजा उनसे मिलना चाहते हैं तो वो ये सोचकर उछल पड़े कि दो बड़ी रियासतों को अपने प्रतिद्वंद्वियों से छीनकर वो उन्हें नीचा दिखा सकते हैं. जिन्ना ने अपने मेज की दराज से एक सादा कागज निकाला और जोधपुर के महाराजा के आगे बढ़ा दिया.

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दोनों राजाओं की हर शर्त के लिए तैयार थे जिन्ना
जिन्ना ने उनसे कहा, आप अपनी शर्तें इस पर लिख दीजिए, मैं उनपर दस्तखत कर दूंगा. दोनों ने अपने होटल में जाकर विचार करने के लिए कुछ मोहलत मांगी. वहां पहुंचे तो देखते क्या हैं कि वीपी मेनन उनकी राह देख रहे हैं. राज्यों के विलय के लिए बनी कमेटी में मेनन गृहमंत्री वल्लभभाई पटेल के साथ थे और उनके बहुत विश्वासपात्र थे. उन्हें इस मामले में पर्याप्त अधिकार भी मिले हुए थे.

maharaja hanwant singh of jodhpur
जोधपुर के महाराजा हनवंत सिंह अपनी महारानी के साथ. महाराजा को हवाई जहाज उड़ाने का बहुत शौक था


लेकिन ये बात छिपी नहीं रही
मेनन को अपने भरोसेमंद सूत्र से पता चल गया था कि ये दो राजा कुछ अलग चाल चल रहे हैं और दिल्ली में चोरी छिपे जिन्ना से मिलने आए हैं. वो पाकिस्तान में मिलने का फैसला कर सकते हैं. उन्होंने महाराजा जोधपुर से कहा कि वायसराय उनसे फौरन मिलना चाहते हैं. उन्हें वायसराय भवन चलना होगा.

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महाराजा को एक कमरे में बिठाकर मेनन ने वायसराय हाउस में माउंटबेटन को तलाशा. अब तक माउंटबेटन को खुद नहीं अंदाज था कि मेनन आखिर क्यों महाराजा जोधपुर को वहां लेकर आए हैं. मेनन ने माउंटबेटन को वाकया बताया और उनसे रूठे हुए महाराजा को मनाने का अनुरोध किया.

माउंटबेटन ने युवा महाराजा को लताड़ा
महाराजा जोधपुर के हाल ही में दिवंगत पिता लार्ड माउंटबेटन के अच्छे दोस्त थे. माउंटबेटन ने महाराजा हनवंत सिंह से कहा, अगर आज उनके पिता जिंदा होते तो बेटे की इस हरकत से निश्चित तौर पर उन्हें बहुत तकलीफ होती. उन्होंने ये भी कहा कि केवल अपने स्वार्थ के लिए हिंदू रियासत की प्रजा को पाकिस्तान में ले जाने की कोशिश करना बहुत बड़ी मूर्खता होगी. उन्होंने महाराजा को समझाने की कोशिश की और ये भी कहा कि उनके निजी शौकों पर भारत सरकार कोई रोक नहीं लगाएगी.

maharaja hanwant singh of jodhpur
महाराजा हनवंत सिंह अपनी बेटियों के साथ. बाद में महाराजा की एक बेटी बहुत कुशल पायलट बनी.


महाराजा ने कलम में पिस्तौल सेट करा रखी थी
माउंटबेटन इस नौजवान महाराजा को एक कच्चे समझौते पर हस्ताक्षर करने के लिए मेनन के साथ वहीं छोड़कर चले गए. उसके बाद महाराजा ने जोधपुर के अपने ही कारखाने में बने कलम निकाली. समझौते पर साइन करने के लिए जैसे ही उन्होंने पेन का ढक्कन खोला. उसमें से एक पिस्तौल निकल आई, जिसे उन्होंने मेनन पर तान दी. फिर महाराजा चिल्लाए, मैं आपकी धमकियों से डरने वाला नहीं हूं. शोरगुल सुनकर माउंटबेटन वापस लौट आए. उन्होंने महाराजा से पिस्तौल छीन ली.

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फिर महाराजा ने शानदार दावत दी
तीन दिनों बाद मेनन ने विलय के पक्के करारनामे का कागज महाराजा के महल भिजवा दिया. मुंह लटकाकर महाराजा ने उस पर दस्तखत कर दिए. इसके बाद उन्होंने अतीत को दफन करने के लिए बड़ा जश्न मनाने का फैसला किया. जिसमें नहीं चाहते हुए भी मेनन बतौर मेहमान शामिल होना पड़ा. मेनन को कई दौर शैम्पेन के पीने पड़े. महाराजा ने इस जश्न की शानदार व्यवस्था की हुई थी. इसमें नाचनेवालियां भी थीं. मेनन शाकाहारी थे. उन्होंने गोश्त को हाथ भी नहीं लगाया. उनके लिए ये जश्न बहुत भारी साबित हुआ.

महाराजा ने हवाई जहाज में मेनन की हालत कर दी पतली
जश्न खत्म करने की आज्ञा देने के बाद महाराजा ने ऐलान किया कि वो खुद अपने निजी हवाई जहाज में मेनन को लेकर दिल्ली छोड़ने जाएंगे. उन्होंने हवाई जहाज राकेट जैसी तेजी के साथ उड़ाया. कई बार हवा में कलाबाजियां खिलाईं. मेनन का सिर चकरा रहा था. जब हवाई जहाज दिल्ली पहुंचा तो मेनन किसी तरह हवाई जहाज से निकले.
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