डॉ. राजेंद्र प्रसाद की चली होती, तो 26 जनवरी नहीं होता गणतंत्र दिवस!

भारत के पहले राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद.

भारत के पहले राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद.

Dr. Rajendra Prasad Death Anniversary : ऐतिहासिक किस्सा है कि 28 फ़रवरी 1963 को पटना में अंतिम सांस लेने वाले डॉ. राजेंद्र प्रसाद देश के पहले राष्ट्रपति होते ही नहीं, अगर पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू (Jawaharlal Nehru) की चली होती.

  • News18Hindi
  • Last Updated: February 28, 2021, 7:47 AM IST
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क्या आपने कभी सोचा है कि भारत का संविधान (Constitution of India) 26 जनवरी 1950 को ही क्यों लागू किया गया, जबकि यह नवंबर 1949 में तैयार हो चुका था! इस सवाल का जवाब खोजते हुए आप उस कहानी तक भी पहुंच जाते हैं, जब देश के पहले राष्ट्रपति (First President of India) के तौर पर डॉ. राजेंद्र प्रसाद के नाम पर विचार हो रहा था. तब पहले प्रधानमंत्री (First PM of India) जवाहरलाल नेहरू नहीं चाहते थे कि प्रसाद (Nehru vs Prasad) राष्ट्रपति बनें इसलिए उन्होंने एक कुटिल चाल भी चली थी और फिर उसकी सफाई भी पेश की थी.

नेहरू और प्रसाद के बीच विचारधारा को लेकर एक लड़ाई या विरोध था, जो उभरकर सामने आता रहा. पहले आपको यही बताते हैं कि गणतंत्र दिवस के लिए तारीख क्यों और कैसे मुकर्रर हुई. नेहरू या प्रसाद, 26 जनवरी की तारीख तय करने के पीछे किसकी चली थी?

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गणतंत्र दिवस 26 जनवरी को क्यों?
अंग्रेज़ों के खिलाफ भारत के स्वधीनता संग्राम में 26 जनवरी तारीख का अपना महत्व रहा था. 1929 में कांग्रेस का लाहौर अधिवेशन हुआ था, तब उस साल इसी तारीख को पूर्ण स्वराज का ऐलान किया गया था. इस दिन को न केवल नेताओं, बल्कि इतिहासकारों ने भी भारत के संप्रभु गणतंत्र बनने की यात्रा में एक अहम पड़ाव माना.

इसी दिन को ऐतिहासिक रूप से महत्व देने के मकसद से 26 जनवरी को गणतंत्र लागू किए जाने का फैसला किया गया था. लेकिन संविधान तैयार होने के दो महीने बाद की इस तारीख को चुनने के लिए राह आसान नहीं थी. वजह थी प्रधानमंत्री बनाम राष्ट्रपति मतभेद.

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नेहरू और प्रसाद की ऐतिहासिक तस्वीर.


प्रसाद नहीं चाहते थे यह तारीख!
जी हां, राजेंद्र प्रसाद पुराने खयालात के थे और धर्म व ज्योतिष में विश्वास करते थे, जबकि इसके उलट नेहरू प्रगतिशील या नये विचार के माने जाते थे. और बेहतर ढंग से कहा जाए तो उन पर पश्चिमी विचार का प्रभाव ज़्यादा था. प्रसाद का मानना था कि ज्योतिष के अनुसार 26 जनवरी की तारीख शुभ नहीं थी, लेकिन नेहरू ने इस दलील को तरजीह नहीं दी.

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नेहरू के अड़ने और इतिहास के हवाले से रखे गए प्रस्ताव को आखिर स्वीकार किया गया क्योंकि एक तरह से यह नेहरू की 'एक बात तो रखी जाए' वाला मामला हो गया था. 26 जनवरी 1950 को प्रसाद ने राष्ट्रपति पद की शपथ ग्रहण की थी, लेकिन तारीख के मामले में जीते नेहरू, राष्ट्रपति कौन बने, इस मामले में मन मसोसकर रह गए थे.

नेहरू नहीं चाहते थे प्रसाद बनें राष्ट्रपति
चक्रवर्ती राजगोपालाचारी देश के पहले राष्ट्रपति बनते, अगर नेहरू की ज़िद या चाल कामयाब हो जाती. 1949 में संविधान जब तैयार हो रहा था तो देश के पहले राष्ट्रपति के लिए शीर्ष नेताओं के बीच नाम चुनने की कवायद चल रही थी. एक तो राजगोपालाचारी गवर्नर जनरल थे ही, तो उन्हें राष्ट्रपति पद पर प्रमोट किया जाना तार्किक था और दूसरे सेक्युलरिज़्म वाली विचारधारा को लेकर उन्हें नेहरू अपने करीब पाते थे.

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राजगोपालाचारी के नाम को बढ़ावा देने के पीछे नेहरू की मूल भावना यह थी कि वो धार्मिक विचार के प्रति झुकाव रखने वाले प्रसाद के दावे को पीछे करना चाहते थे. लेकिन बाकी कांग्रेसियों को राजगोपालाचारी के नाम पर इसलिए आपत्ति थी क्योंकि उन्होंने भारत छोड़ो आंदोलन से बीच में ही अचानक हाथ खींचा था. रिपोर्ट्स की मानें तो दोनों नामों के बीच खींचातानी और कई तरह की अफवाहों का दौर भी चला.

फिर नेहरू ने चली चाल, जो उल्टी पड़ी
पूर्व इंटेलिजेंस अफसर रहे आरएनपी सिंह ने किताब लिखी 'नेहरू ए ट्रबल्ड लीगेसी', जिसके मुताबिक नेहरू ने 10 सितंबर 1949 को प्रसाद को एक पत्र लिखा और कहा कि उन्होंने 'सरदार पटेल से राजाजी के नाम को लेकर बात की और राष्ट्रपति पद के लिए उनका नाम तय कर लिया गया'. नाराज़ प्रसाद ने अगले ही दिन ​इस चिट्ठी के जवाब में एक सवाल दागा कि नेहरू पार्टी में अपने पद की भूमिका स्पष्ट करें.

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सरदार पटेल और नेहरू की यादगार तस्वीर.


प्रसाद ने चूंकि पत्र की एक प्रति पटेल को भी भेजी थी इसलिए यह चिट्ठी पाते ही नेहरू समझ गए कि उनकी चाल उल्टी पड़ गई और उन्हें तत्काल सफाई देना पड़ी. नेहरू ने लिखा 'मैंने जो लिखा था, उससे सरदार वल्लभभाई पटेल का कोई लेना देना नहीं था. मैंने वो बात अपने मंतव्य के आधार पर ही लिखी थी. इस बारे में सरदार वल्लभभाई कुछ नहीं जानते थे.'

तो नेहरू की क्यों नहीं चली?
इस पूरे किस्से के बाद सवाल यह भी उठता है कि पहले प्रधानमंत्री होने के बावजूद आखिर नेहरू की बात को पार्टी के भीतर मान क्यों नहीं दिया गया था! प्रसाद के नाम पर नेहरू की असहमति के बावजूद मुहर लगना क्या साबित करता था? विशेषज्ञ मानते हैं कि तब कांग्रेस कई विचारधाराओं को अपने भीतर समेटने और सबको शामिल करते हुए साथ लेकर चलने वाली पार्टी थी.

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नेहरू वास्तव में रूस की तरक्की देखकर समाजवादी रास्ते के समर्थक थे और कतई नहीं चाहते थे कि राजनीति में धर्म की दखलंदाज़ी हो. वहीं प्रसाद का विचार इस मामले में कुछ अलग रहा था. इस विरोधाभास के बावजूद कांग्रेस के भीतर उस वक्त 'सबको साथ, सबको शामिल करने' की विचारधारा कायम रखने की लड़ाई थी.
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