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पुण्यतिथि : डॉ. राजेंद्र प्रसाद के निधन के बाद क्या हुआ उनके परिवार का

1953 में रक्षा बंधन के मौके पर राजेंद्र प्रसाद (image: commons wikimedia)

1953 में रक्षा बंधन के मौके पर राजेंद्र प्रसाद (image: commons wikimedia)

राष्ट्रपति भवन में जाने के बाद भी उन्होंने वहां हमेशा सादगी को सर्वोपरी रखा. वह पहले राष्ट्रपति थे, जो जमीन पर आसन बिछाकर भोजन करते थे.

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    डॉक्टर राजेंद्र प्रसाद देश के पहले राष्ट्रपति थे. आज उनकी पुण्यथिति है. राजेंद्र प्रसाद के कई मिसालें देश के सामने रखी थीं. उन्हें राष्ट्रपति के रूप में जितना वेतन मिलता था, उसका आधा वो राष्ट्रीय कोष में दान कर देते थे. ये कौतूहल स्वाभाविक है कि आजादी के बड़े नेताओं में एक राजेंद्र प्रसाद के निधन के बाद उनके परिवार का क्या हुआ. उनके बेटे कभी सियासत में आए या नहीं.

    राजेंद्र प्रसाद के तीन बेटे थे. आजादी में आने से पहले राजेंद्र प्रसाद बिहार के शीर्ष वकीलों में थे. पटना में बड़ा घर था. नौकर चाकर थे. उस जमाने में उनकी फीस भी कम नहीं थी. लेकिन गांधीजी के अनुरोध पर आजादी की लड़ाई में कूदे और फिर ताजिंदगी साधारण तरीके से जीते रहे.

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    यहां तक कि राष्ट्रपति भवन में जाने के बाद भी उन्होंने वहां हमेशा सादगी को सर्वोपरी रखा. वह पहले राष्ट्रपति थे, जो जमीन पर आसन बिछाकर भोजन करते थे. उन्होंने राष्ट्रपति भवन में अंग्रेजी तौर-तरीकों को अपनाने से इनकार कर दिया था.

    उनके बड़े बेटे
    डॉ. प्रसाद के परिवार से कोई उस तरह कभी राजनीति में नहीं रहा. डॉ. प्रसाद तीन बेटे थे. बड़े बेटे मृत्युंजय प्रसाद ने पटना स्थित जीवन बीमा निगम से संभागीय प्रबंधक के रूप में अवकाश प्राप्त किया. हां, 1977 में आपातकाल के बाद घोषित चुनाव में अवश्य वे जनता पार्टी की टिकट पर चुनाव लड़े. वो चुनाव नहीं लड़ना चाहते थे लेकिन जयप्रकाश नारायण के अनुरोध पर चुनाव में खड़े हुए जीते लेकिन इसके बाद फिर कभी सियासत में सक्रिय नहीं रहे.

    बाकी दो बेटे कहां रहे
    दूसरे एवं तीसरे बेटे धनंजय प्रसाद व जनार्दन प्रसाद छपरा में लगभग उपेक्षित जिंदगी जीते रहे. थोड़ी-बहुत खेती बाड़ी और एक स्थानीय बस परमिट से आजीविका चलाते थे. राजेंद्र प्रसाद के परिवार तथा किसी भी रिश्तेदार ने उनके पद का लाभ नहीं उठाया. वह खुद नहीं चाहते थे कि उनका कोई नजदीकी रिश्तेदार भी राष्ट्रपति पद की गरिमा पर कोई आंच आने दे.



    डॉ राजेन्द्र प्रसाद की दो पोतियां झारखंड में रहती हैं. एक पोती जमशेदपुर और एक रांची में रहती है. एक पोती पटना में रहती है. रांची एवं जमशेदपुर में रहने वाली डॉ राजेन्द्र प्रसाद की पोतियां प्रचार से दूर रहती हैं.

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    आखिरी दिन
    उनके आखिरी दिन जिस तरह से बीते वो भी दुखद है. वह पटना के सदाकत आश्रम में रहते थे. वहां उनके ढंग से इलाज की व्यवस्था भी नहीं थी. एक राष्ट्रपति की आखिरी दिनों में ये हालत होगी, सोचा भी नहीं जा सकता. उन्होंने अपना सबकुछ तकरीबन देश को दिया.

    अगर वह चाहते तो एक वकील के रूप में खासा कमा सकते थे. वह वर्ष 1910 के आसपास पटना के जाने माने वकील बन चुके थे. अपनी सत्यनिष्ठा, कर्तव्यपरायणता और वकालत के अपने अकूत ज्ञान के लिए विख्यात थे. 1963 में राजेंद्र बाबू की मृत्यु पटना में हुई.

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