राजमाता विजयराजे सिंधिया : जिन्होंने इंदिरा गांधी को दी थी चुनौती

ग्वालियर की राजमाता बनने से पहले विजयराजे सिंधिया का नाम लेखा दिव्येश्वरी था. उनके राजा जीवाजी राव से प्रेम का किस्सा भी बहुत चर्चित है.

Avinash Dwivedi | News18Hindi
Updated: October 12, 2018, 2:40 PM IST
राजमाता विजयराजे सिंधिया : जिन्होंने इंदिरा गांधी को दी थी चुनौती
विजयाराजे सिंधिया की राजनीतिक विरासत आज भी चमक रही है.
Avinash Dwivedi | News18Hindi
Updated: October 12, 2018, 2:40 PM IST
एक रानी जिन्हें 'किंगमेकर' माना जाता था. जिन्होंने मध्य भारत की राजनीति की दिशा बदल दी. रानी जिन्होंने तत्कालीन प्रधानमंत्री और 'आयरनलेडी' कही जाने वाली इंदिरा गांधी को चुनौती दे दी. राजतंत्र की तरह ही लोकतंत्र में भी उन्हें जनता ने स्वीकारा. महिलाओं के अधिकारों की समर्थक रही इस महिला ने अपनी बेटियों को भी अपने ही जैसा बनाया. आज भी उनकी बेटियां भारत की राजनीति में अपनी खास पहचान रखती हैं. ये रानी थीं ग्वालियर रियासत की राजमाता विजयाराजे सिंधिया. जिनकी छवि को उनकी बेटियों वसुंधरा राजे और यशोधरा राजे में देखा जा सकता है.

आजादी के बाद राजतंत्र का पतन हो चुका था. ग्वालियर एक नए राज्य मध्यदेश में आता था. जीवाजीराव सिंधिया इसके राजा थे. वे 1925 में इस रियासत के उत्तराधिकारी बने थे लेकिन तब वे नाबालिग थे. करीब एक दशक बाद वे पूरी तरह से राजा बन गए. जिसके बाद त्रिपुरा की राजकुमारी 'कमलप्रभा' से उनकी सगाई हुई पर मराठा सरदार इस सगाई से नाखुश थे. वे किसी मराठी महिला को ही रानी के रूप में देखना चाहते थे. ऐसे में उनके दबाव में जीवाजीराव ने यह सगाई तोड़ दी गई.

जिस लेखा दिव्येश्वरी को लोगों ने माना बाहरी, बाद में उसे ही पलकों पर बिठाया
वैसे मराठा सरदारों का सपना, सपना ही रहने वाला था क्योंकि कुछ ही दिनों बाद जीवाजीराव सिंधिया की जिंदगी में आईं लेखा दिव्येश्वरी. दोनों मुंबई में ताज होटल में पहली बार मिले. जीवाजीराव को पहली ही नज़र में उनसे प्यार हो गया. लेखा नेपाल हाउस में पली-बढ़ी थीं. उनके मौसा चंदन सिंह, जीवाजी राव के सलाहकार हुआ करते थे. उन्होंने ही दोनों के रिश्तों की पहल की और मराठा और राजपूतों का रिश्ता हो गया.

रानी बनने के साथ ही लेखा दिव्येश्वरी का नाम बदलकर विजयाराजे सिंधिया हो गया था. लेकिन लेखा के लिए यह आसान नहीं था क्योंकि लेखा दिव्येश्वरी किसी शाही परिवार से नहीं थीं और मराठा सरदार मराठी लड़की को ही रानी के रूप में चाहते थे. यही वजह रही कि जब शादी के बाद जीवाजी राव अपने मुख्य सलाहकार संभाजीराव आंगरे से विजयराजे को मिलवाने मुंबई ले गए, आंगरे ने परंपरा के अनुसार नई रानी का कोई स्वागत नहीं किया गया. जीवाजी राव को यह बहुत बुरा लगा.

लेकिन धीरे-धीरे महारानी ने सिंधिया संस्कार अपनाने शुरू कर दिए और अगले 10 सालों में जीवाजीराव के सारे करीबी उनके भी करीबी होते चले गए. सभी मानने लगे कि जीवाजीराव का, विजयराजे से शादी का फैसला बिल्कुल सही था. सभी सरदार महारानी के भी कसीदे पढ़ने लगे. इसके बाद सिंधिया राजवंश को राजतंत्र से लोकतंत्र में भी सफल बनाने में विजयराजे सिंधिया का बहुत योगदान रहा.

राजनीति में महारानी के आने का किस्सा भी
आजादी के बाद जीवाजीराव ने रियासत को खुद ही भारत में मिला लिया था क्योंकि रियासतों के गणतंत्र में विलय से बचने का यही तरीका था. लेकिन जीवाजी सत्ता से अनमने हो गए थे, उन्होंने सारा काम-काज रानी को सौंप दिया था. नेहरू ने 1957 में जीवाजी से मिलने के बाद उन्हें कांग्रेस में शामिल होने का न्यौता दिया. लेकिन जीवाजी राव इसके लिए राजी नहीं हुए. वे कांग्रेस की नीतियों को पसंद नहीं करते थे, उनका झुकाव हिंदू महासभा की ओर था. इस मामले में भी महारानी विजयाराजे जाकर नेहरू से मिलीं और उन्हें दो टूक जीवाजीराव के राजनीति में आने से इंकार कर दिया.

लेकिन कांग्रेस ने अपना पासा फिर फेंका और महारानी को ही कांग्रेस के टिकट पर खड़ा होना की सिफारिश की. रानी मान गईं. यह लोकतंत्र में राजतंत्र की शुरुआत थी. महारानी ने गुना सीट से 1957 में उन्होंने पहली बार कांग्रेस के टिकट पर चुनाव लड़ा था. हिंदू महासभा के देश पांडेय को 60,000 वोटों से हराया. यही गुना सीट आज भी सिंधिया रियासत की पहचान बनी हुई है. राजनीति में आने के बाद महारानी एक कुशल राजनीतिज्ञ बनकर उभरीं.

मुख्यमंत्री से तनातनी के चलते छोड़ दी कांग्रेस
वे दूसरी बार भी चुनाव जीत गईं. इस बार वे ग्वालियर से जीती थीं. मध्यप्रदेश में कांग्रेस की सरकार थी और डीपी मिश्रा वहां के मुख्यमंत्री हुआ करते थे. डीपी मिश्रा (द्वारिका प्रसाद मिश्रा) धाकड़ नेता थे. इसकी वजह उनका इंदिरा गांधी का करीबी होना था. ग्वालियर में जबरदस्त छात्र आंदोलन हुआ. मुख्यमंत्री डीपी मिश्रा आंदोलन को खत्म करने में जुटे थे. लेकिन महारानी उसे बल दे रही थीं. डीपी मिश्रा की महारानी से तनातनी थी. सरगुजा महाराज के महल में पुलिस भेजना भी विजयराजे के दिल पर चोट कर गया था. ऐसे में उन्होंने कांग्रेस छोड़ दी.



इंदिरा गांधी बनाम राजमाता सिंधिया
अगले साल राजमाता ने राज्य और केंद्र दोनों के चुनाव लड़े. करैरा से जनसंघ की उम्मीदवार थीं तो गुना से स्वतंत्र उम्मीदवार. दोनों चुनाव जीतीं लेकिन प्रदेश में कांग्रेस की ही सरकार बनी. इसके बाद जनसंघ ने उन्हें विपक्ष का नेता बना दिया. कांग्रेस के भी फूट पड़ रही थी. रीवा रियासत के गोविंद नारायण सिंह ने 35 विधायकों के साथ जनसंघ में आने का प्रस्ताव महारानी के सामने रखा. इससे साबित हो चुका था कि महारानी किंगमेकर हो चुकी हैं. उन्होंने कुल 153 विधायकों के साथ मिलकर सरकार गिरा दी और राज्य में पहली बार जनसंघ की सरकार बनी. गोविंद नारायण सिंह मुख्यमंत्री बने और राजमाता सदन की नेता. ये इंदिरा गांधी के लिए सीधी चुनौती थी. इंदिरा गांधी ने इस चुनौती को गंभीरता से लिया और 20 महीने में ही यह सरकार गिरी और गोविंद नारायण वापस कांग्रेस में चले गए थे. राजमाता को इंदिरा को चुनौती देने का खामियाजा इमरजेंसी के दौरान भी चुकाना पड़ा. उनकी गिरफ्तारी हुई और उन्हें पीटा भी गया. जिसके बाद से उनकी तबीयत खराब रहने लगी.

राजमाता की राजनीतिक विरासत आज भी चमक रही है
महज 48 साल की उम्र में जीवाजी राव का निधन हो गया था. राजमाता ने अकेले ही रियासत, परिवार और राजनीति तीनों को संभाला. फिलहाल भाई ध्यानेंद्र सिंह, भाभी माया सिंह, बेटी वसुंधरा राजे सिंधिया और यशोधरा राजे सिंधिया बीजेपी की ओर से उनकी विरासत को आगे बढ़ा रहे हैं. वहीं कांग्रेस की ओर से उनके बेटे माधव राव सिंधिया के बाद पोते ज्योतिरादित्य सिंधिया भी राजनीतिक परंपरा निभा रहे हैं. राजमाता की तीसरी पीढ़ी लोकतांत्रिक राजनीति में आ चुकी है.

बेटे माधवराव सिंधिया के साथ रिश्ते में आ गई बहुत तल्खी
1967 में विजयराजे के कांग्रेस छोड़ दी थी और स्वतंत्र पार्टी के टिकट पर सांसद बनीं थीं. लेकिन उनके बेटे माधवराव को कांग्रेस की राजनीति, जनसंघ से ज्यादा रास आई थी. जिससे दोनों आमने-सामने आ गए थे. एक दौर में तो दोनों के बीच की दरार इस कदर बढ़ गई थी कि राजमाता ने अपने ही बेटे से महल जयविलास पैलेस में रहने का किराया मांग लिया था. हालांकि किराये के तौर पर लिया जाने वाला 1 रुपया प्रतीकात्मक ही था लेकिन यह दिखाता था कि दोनों के रिश्तों में यह दरार कितनी गहरी थी. 1985 में अपने हाथ से लिखी अपनी वसीयत में राजमाता ने अपने बेटे को मुखाग्नि देने से भी मना कर दिया था. हालांकि 2001 में लंबी बीमारी के बाद जब राजमाता की मौत हुई तो माधवराव ने ही उन्हें मुखाग्नि दी.

एक बार राजमाता ने कहा था कि इमरजेंसी के दौरान पुलिस ने उनके बेटे के सामने उन्हें लाठियों से पीटा पर माधवराव ने कुछ नहीं किया. राजमाता अपने बेटे को संपत्ति में से कुछ नहीं देना चाहती थीं. ऐसे में उन्होंने अपनी बेटियों के नाम अपने गहने और काफी जायदाद कर दी. इसके अलावा उन्होंने अपने विश्वस्त संभाजीराव आंगरे को विजयराजे सिंधिया ट्रस्ट का मालिक बना दिया. माधवराव सिंधिया के हाथ बहुत कम दौलत आई.

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