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रानी लक्ष्मीबाई के साहस पर अंग्रेज भी थे फिदा, किताब में लिखा-नहीं भूल पाएगा हिंदुस्तान

News18Hindi
Updated: November 19, 2019, 4:02 PM IST
रानी लक्ष्मीबाई के साहस पर अंग्रेज भी थे फिदा, किताब में लिखा-नहीं भूल पाएगा हिंदुस्तान
वास्तव में वह स्वतंत्रता संग्राम की पहली नायिका थीं, ऐसे समय में जब पुरुषों के वर्चस्व वाला समाज था, तब किसी रानी या महिला का रणभूमि में कूद पड़ना स्वाभाविक बात तो नहीं थी.

उत्तर भारत के ज्यादातर इलाकों में साहस और वीरता के लिए उपमा के तौर पर प्रयोग की जाने वाली रानी लक्ष्मीबाई की आज 191वीं जयंती (Rani Laskmibai 191th Birth Anniversary) है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (PM Narendra Modi) ने जन्मितिथि पर रानी लक्ष्मीबाई को याद किया है.

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  • Last Updated: November 19, 2019, 4:02 PM IST
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नई दिल्ली. उत्तर भारत के ज्यादातर इलाकों में साहस और वीरता के लिए उपमा के तौर पर प्रयोग की जाने वाली रानी लक्ष्मीबाई की आज 191वीं जयंती (Rani Laskmibai 191th Birth Anniversary) है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (PM Narendra Modi) ने जन्मितिथि पर रानी लक्ष्मीबाई को याद किया है. पीएम के ट्विटर हैंडल से लिखा गया है कि करोड़ों भारतीयों के लिए रानी लक्ष्मीबाई साहस, निर्भीकता, देशभक्ति की मिसाल हैं. उन्होंने सामाज्यवाद के खिलाफ पूरी ताकत से युद्ध किया.

स्वतंत्रा संग्राम की नायिका
वास्तव में वह स्वतंत्रता संग्राम की पहली नायिका थीं, ऐसे समय में जब पुरुषों के वर्चस्व वाला समाज था, तब किसी रानी या महिला का रणभूमि में कूद पड़ना स्वाभाविक बात तो नहीं थी. लक्ष्मीबाई के व्यक्तित्व ने न केवल इतिहासकारों बल्कि समाज की हर धारा के बुद्धिजीवियों को आकर्षित किया, फिर चाहे वो लेखक हों या फिल्मकार या नाटककार. सभी कलाकारों ने अपने माध्यम के लिहाज़ से कहानी कहने के लिए सच के साथ कल्पना का मिश्रण किया.

हाल ही में रानी लक्ष्मी बाई पर एक फिल्म भी बनाई गई थी जिसमें अभिनेत्री कंगना रनौत ने  लीड रोल प्ले किया था. रानी लक्ष्मीबाई ने 18 जून 1858 को अंग्रेज़ी फौज के खिलाफ संघर्ष करते हुए बलिदान दिया था. रानी लक्ष्मीबाई के जीवन पर कुछ मशहूर हिंदी फिल्में भी बन चुकी हैं और कई नाटक भी खेले जा चुके हैं.

दिलचस्प बात ये है कि भारत के लिए लड़ते-लड़ते बलिदान देने वाली रानी लक्ष्मीबाई के मुरीद न सिर्फ भारतीय हैं बल्कि अंग्रेजों ने भी उनकी तारीफ की है. ब्रिटिश शासन के दौरान भारत में तैनात रहे बड़े अंग्रेज अधिकारी कर्नल मैलेसन ने अपनी किताब हिस्ट्री ऑफ इंडियन म्यूटिनी वॉल्यूम 3 में रानी लक्ष्मी बाई के बारे में लिखा है. इस किताब में कर्नल मैलेसन ने स्वीकार किया है कि हम अंग्रेजों की निगाह में लक्ष्मीबाई भले गलत हों लेकिन अपने देश के लिए उन्होंने अदम्य साहस का परिचय दिया. उन्होंने लिखा, ' लक्ष्मीबाई के देश के लोग हमेशा याद रखेंगे कि वो अपने देश के लिए जिंदा रहीं और अपने देश के लिए ही जान दी. हम भारत के लिए लक्ष्मीबाई के बलिदान को नकार नहीं सकते.'

तस्वीर विकीपीडिया से साभार


रानी की सुंदरता के दीवाने थे अंग्रेज़!
अफेयर की बातों में कितनी सच्चाई है? यह इतिहास और फिक्शन के बीच का मुद्दा है लेकिन इतिहास के हवाले से ये ज़रूर कहा जा सकता है कि उस समय के अंग्रेज़ अफसर रानी लक्ष्मीबाई के सौंदर्य और व्यक्तित्व के मुरीद थे. पहले स्वाधीनता संग्राम के दौरान रानी लक्ष्मीबाई की फौज का मुकाबला करने वाले सर ह्यूज रोज ने बाद में अपनी डायरी में लिखा, 'रानी वाकई बहुत बहादुर, बुद्धिमान और कुशल प्रशासक थीं. हालांकि उनके चेहरे पर चेचक के निशान थे लेकिन उनकी आंखें और देहयष्टि बहुत सुंदर थी. हमारी सेना के कई अफसर उनकी सुंदरता से प्रभावित थे'.



मृत्यु के बाद बेटे की मुश्किलें
अंग्रेजों ने लक्ष्मीबाई के बेटे दामोदर राव को कभी झांसी का वारिस नहीं माना था, सो उसे सरकारी दस्तावेजों में कोई जगह नहीं मिली थी. 1959 में छपी वाई एन केलकर की मराठी किताब ‘इतिहासाच्य सहली’ (इतिहास की सैर) में दामोदर राव का इकलौता वर्णन छपा. महारानी की मृत्यु के बाद दामोदार राव ने एक तरह से अभिशप्त जीवन जिया.

5 मई 1860 को दामोदर राव को इंदौर में 10,000 सालाना की पेंशन अंग्रेजों ने बांध दी. उन्हें सिर्फ सात लोगों को अपने साथ रखने की इजाजत मिली. ब्रिटिश सरकार ने सात लाख रुपए लौटाने से भी इंकार कर दिया. दामोदर राव के असली पिता की दूसरी पत्नी ने उनको बड़ा किया. 1879 में उनके एक लड़का लक्ष्मण राव हुआ. 1906 में 58 साल की उम्र में दामोदर राव की मौत हो गई. इनके परिवार वाले आज भी इंदौर में 'झांसीवाले' सरनेम के साथ रहते हैं. रानी के एक सौतेला भाई चिंतामनराव तांबे भी था. तांबे परिवार इस समय पूना में रहता है.
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First published: November 19, 2019, 3:55 PM IST
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