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Rani Laxmibai Birth Anniversary: जानिए मनु कैसे बन गई झांसी की वीरांगना

Rani Laxmibai Birth Anniversary: जानिए मनु कैसे बन गई झांसी की वीरांगना

आज के समय रानी लक्ष्मीबाई (Rani Laxmibai) की वीरता की गाथा किसी काल्पनिक कहानी के जैसे लगती है. (तस्वीर: Wikimedia Commons)

आज के समय रानी लक्ष्मीबाई (Rani Laxmibai) की वीरता की गाथा किसी काल्पनिक कहानी के जैसे लगती है. (तस्वीर: Wikimedia Commons)

Rani Laxmibai Birth Anniversary: झांसी की रानी (Queen of Jhansi) ने अपने समय में जिस वीरता का का परिचय दिया है. वह बेमिसाल और उस पर ना भूत ना भविष्यतो का वाक्य सटीक बैठता है. बचपन के हालात ने उनके सैन्य प्रशिक्षण में योगदान तो दिया लेकिन उनकी लगन और साहस की अधिक भूमिका दी. पति के मरने के बाद विधवा का जीवन ना चुनकर उन्होंने योद्धा (Warrior) का जीवन चुना और ऐसा चुना जो आज तक लोगों के लिए प्रेरणा बना हुआ है. अपनी अंतिम सांस तक उन्होंने जिस वीरता का परिचय दिया उसके उनके शुत्र अंग्रेज तक कायल हुए बिना नहीं रह सके. 19 नंवबर को देश उनकी जयंती मना रहा है.

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    क्या झांसी की रानी लक्ष्मी बाई (Rani Laxmibai) वाकई बहुत वीरांगना थीं. या फिर कवियित्री सुभद्रा कुमारी चौहान की कविता की पंक्तियां ‘खूब लड़ी मर्दानी वो तो झांसी वाली रानी थी’, कोई अतिशयोक्ति तो नहीं थी. यह जानना कम रोचक नहीं है कि कैसे एक 29 साल की महिला ने ताकतवर अंग्रेजी सेना के दांत खट्टे कर दिए और विरोधियों तक को अपनी वीरता का कायल बना दिया. आखिर ऐसा क्या था जो देश की तमाम रियासतों के राजा ना कर सके जो रानी लक्ष्मी बाई ने कर दिखाया. कैसे उस देश में झांसी की रानी ने ऐसा रण कौशल दिखा दिया जहां स्त्रियों के लिए शस्त्र उठाना ही बहुत बड़ी बात मानी जाती है.

    पिता ने की परवरिश
    रानी लक्ष्मीबाई का जन्म 19 नवंबर 1828 में वराणसी के मराठी कराड़े ब्राह्मण परिवार में हुआ था. उनका पिता का नाम मोरोपंत तांबे और माता का नाम भागिरथी सप्रे थे. लक्ष्मीबाई का मायके में नाम मणिकर्णिका तांबे थे और उन्हें प्यार से मनु कह कर पुकारा जाता है. जब वे चार साल की ही उम्र की थीं तब उनकी माता का देहांत हो गया था. उनका लालन पालन उनके पिता ने किया.

    पेशवा ने बेटी की तरह दिलाई शिक्षा
    मोरोपंत तांबे  बिठूर के मराठा बाजीराव पेशवा के दरबार में काम करते थे. मोरोपंत मनु को अपने साथ दरबार ले जाया करते थे जहां पेशवा उनसे अपने बेटी की तरह स्नेह किया करते थे और उन्हें प्यार से छबीली कहकर पुकारा करते थे. यहीं पर उन्होंने घुड़सवारी, तलावारबाजी जैसे हुनर सीखे. मणिकर्णिका को वह सारी शिक्षाएं मिलीं तोउस दौर में महिलाओं को नहीं मिलती थीं.

    विवाह और पुत्र
    मनु ने घर परही पढ़ना लिखना सीखा और  नाना साहेब और तात्यां टोपे उनके बचपन के मित्र थे. उन्होंने निशानेबाजी और मलखम्भ भी सीखा था. मणिकर्णिका का विवाह झांसी के महाराज गंगाधऱ राव नेवलकर से 1842 में हुआ था विवाह के दिन ही उनका नाम लक्ष्मीबाई रख दिया गया. 1851 में उनका एक पुत्र भी हुआ जो पैदा होने के चार महीने के बाद मर गया.  महाराज गंगाधर ने अपनी मृत्यु से एक दिन पहले  अपने चचेरे भाई के लड़के आनंद राव को गोद लिया जिसका नाम दामोदर राव रखा गया.

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    रानी लक्ष्मीबाई (Rani Laxmibai) को बचपन से ही घुड़सवारी, तलावरबाजी और निशानेबाजी का गहन प्रशिक्षण मिला था. (तस्वीर: Wikimedia Commons)

    वारिस मानने से इनकार
    पति गंगाधर के मौत के बाद ही लक्ष्मीबाई की सौन्य और राजकाज की शिक्षाओं की परीक्षा शुरू हो गई. उस समय के गवर्नर जनरल लार्ड डलहौजी की नीति के तहत ईस्ट इंडिया कंपनी ने गोद लिए बालक को वारिस मानने से इनकार कर दिया. रानी ने इसे अंग्रेजों की यह दलील मानने  से इनकार करते हुए अंग्रेजों को दो टूक जवाब दिया कि वे अपनी झांसी नहीं देंगी. इससे अंग्रेजों और रानी लक्ष्मीबाई के बीच युद्ध तय हो गया, जिसके लिए रानी भी तैयार थीं.

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    झांसी में पहला युद्ध
    23 मार्च 1858 को अंग्रेजों ने झांसी पर हमला किया और 3 अप्रैल तक जम कर युद्ध हुआ जिसमें तात्या टोपे  ने रानी को का साथ दिया जिसकी वजह से अंग्रेज झांसी में 13 दिन तक नहीं घुस पाए. अंततः 4 अप्रैल को अंग्रेज झांसी में घुस गए और रानी को झांसी छोड़ना पड़ा. रानी एक ही दिन में कालपी पहुंचीं जहां उन्हें नाना साहेब पेशवा, राव साहब और तात्या टोपे का साथ मिला. फिर ये सभी ग्वालियर पहुंचे जहां निर्णायक युद्ध हुआ.

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    खुद अंग्रेज सिपाही तक रानी लक्ष्मीबाई (Rani Laxmibai) के साहस के कायल हो गए थे. (फाइल फोटो)

    अंतिम लेकिन निर्णायक युद्ध
    17 जून को रानी लक्ष्मीबाई का अंतिम  लेकिन ऐतिहासिक युद्ध शुरू हुआ. ह्यूरोज की अगुआई में अंग्रेजों की घेराबंदी से रानी लक्ष्मीबाई घिर गईं थीं. रानी को लड़ते हुए गोली लगी थी जिसके बाद वे विश्वस्त सिपाहियों के साथ बाहर निकल गईं. उनका पीछा करते हुए अंग्रेज सिपाही की तलवार ने उने सिर पर वारकिय लेकिन उनका शव उनके विश्वस्तों ने अंग्रेजों से दूर ले गए और तुरंत ही उनका अंतिम संस्कार कर दिया जिससे वह अंग्रेजों के हाथ ना आ सके. लेकिन अग्रेज सैनिक और सेनापति रानी की बहादुरी के कायल जरूर हो गए.

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    रानी लक्ष्मीबाई की बहादुरी की मिसाल किवदंती तो बनी हीं. अंग्रेज सेना के अधिकारियों के संस्मरण में भी उनकी वीरता का ससम्मान जिक्र मिलता है. लॉर्ड कैनिंग और अंग्रेजों के वृत्तांतों से रानी की वीरता और उनके आखिरी युद्ध के बारे में जानकारी मिलती है. स्थानीय बोलियों की गान-कथाओं में रानी को विशेष स्थान दिया गया है. सुभद्रा कुमारी चौहान की उन पर लिखी गई कविता बहुत सराही जाती है.

    Tags: 19 November Jhansi Ki Rani Laxmibai Birthday, History, India, Research

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