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भारत के इस प्राइमरी टीचर को मिला अवार्ड, 7 करोड़ का आधा हिस्सा किया दान

विजेता रंजीत सिंह दिसाले (Photo- firstpost via globalteacherprize)
विजेता रंजीत सिंह दिसाले (Photo- firstpost via globalteacherprize)

महाराष्ट्र के शिक्षक रंजीत सिंह दिसाले (Ranjit singh Disale) ने इनाम की घोषणा होते ही आधी राशि दूसरे प्रतिभागियों में बांटने की बात कह दी.

  • News18Hindi
  • Last Updated: December 5, 2020, 8:01 PM IST
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देश के एक प्राइमरी स्कूल में लड़कियों की शिक्षा को बढ़ावा देने और उसे तकनीक से जोड़ने की कोशिशों के कारण महाराष्ट्र के एक ग्रामीण शिक्षक को ग्लोबल टीचर प्राइज (Global Teacher Prize) मिला. 32 साल के विजेता रंजीत सिंह दिसाले (Ranjit singh Disale ) को इसके तहत 10 लाख डॉलर (लगभग 7 करोड़ 38 लाख रुपए) का पुरस्कार मिला. दिसाले अब इस राशि को आधा हिस्सा अपने साथियों को देने का एलान कर चुके हैं.

कोरोना महामारी के दौर में स्कूल पूरी तरह से बंद पड़े हैं. स्कूलों में डिजिटल लर्निंग हो तो रही है लेकिन वो काफी नहीं. खासकर लड़कियां इसमें पीछे जा रही हैं क्योंकि उनके हाथ में मोबाइल कम ही आता है. वहीं इसी दौर में देश के एक छोटे से गांव के शिक्षक ने लड़कियों की पढ़ाई में शानदार योगदान दिया.





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कहानी शुरू होती है महाराष्ट्र के सोलापुर जिले के पारितेवादी गांव से. साल 2009 में दिसाले जब वहां के प्राइमरी स्कूल पहुंचे तो स्कूल के हाल बेहाल थे. स्कूल के नाम पर जो इमारत थी, वो बुरी हालत में थी. साफ लगता था कि वो पशुओं के रखने और स्टोर रूम के काम आती थी. लोगों को अपने बच्चों और खासकर लड़कियों को पढ़ाने में कोई दिलचस्पी नहीं थी क्योंकि उनका मानना था कि इससे कुछ बदलने वाला नहीं.

रंजीत सिंह दिसाले ने एक-एक करके किताबों का मातृभाषा में अनुवाद किया (Photo-twitter)


दिसाले ने इसे बदलने का जिम्मा लिया. घर-घर जाकर बच्चों के अभिभावकों को पढ़ाई के लिए तैयार करना अकेला काम नहीं था. इसके साथ ही एक और समस्या थी कि लगभग सारी किताबें अंग्रेजी में थीं. दिसाले ने तब एक-एक करके किताबों का मातृभाषा में अनुवाद किया, बल्कि उसमें तकनीक भी जोड़ दी. ये तकनीक थी क्यूआर कोड देना ताकि स्टूडेंट वीडियो लेक्चर अटेंड कर सकें और अपनी ही भाषा में कविताएं-कहानियां सुन सकें. इसके बाद से ही गांव और आसपास के इलाकों में बाल विवाह की दर में तेजी से गिरावट आई.

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महाराष्ट्र में किताबों में क्यूआर कोड शुरू करने की पहल ही सोलापुर के इस शिक्षक ने की. इसके बाद भी दिसाले रुके नहीं, बल्कि साल 2017 में महाराष्ट्र सरकार को ये प्रस्ताव दिया कि सारा सिलेबस इससे जोड़ दिया जाए. इसके बाद दिसाले की ये बात पहले प्रायोगिक स्तर पर चली और तब जाकर राज्य सरकार ने घोषणा की कि वह सभी श्रेणियों के लिए राज्य में क्यूआर कोड पाठ्यपुस्तकें शुरू करेगी. अब तो एनसीईआरटी ने भी ये घोषणा कर दी है.

महाराष्ट्र में किताबों में क्यूआर कोड शुरू करने की पहल ही सोलापुर के इस शिक्षक ने की- सांकेतिक फोटो (pxhere)


जिस क्यूआर कोड ने दिसाले को इतना नाम दिया, अब थोड़ा उसके बारे में भी जानते चलें. क्यूआर कोड का फुल फॉर्म है क्विक रिस्पॉन्स कोड. इसे बारकोड की अगली जेनरेशन कहा जाता है जिसमें हजारों जानकारियां सुरक्षित रहती हैं. अपने नाम के ही मुताबिक ये तेजी से स्कैन करने का काम करता है. ये स्क्वायर आकार के कोड होते हैं, जिसमें सारी जानकारी होती है. किसी उत्पाद, फिर चाहे वो किताबें हों या अखबार या फिर वेबसाइट सबका एक क्यूआर कोड होता है.

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सोलापुर के बुरी तरह से सूखाग्रस्त गांव में जिला परिषद प्राइमरी स्कूल के टीचर दिसाले को उनकी कोशिशों के कारण दुनिया के सबसे अद्भुत टीचर का अवॉर्ड मिला. वारके फाउंडेशन ने असाधारण शिक्षक को उनके उत्कृष्ट योगदान के लिए पुरस्कृत करने उद्देश्य से 2014 में यह पुरस्कार शुरू किया था, जिसके लिए इस साल दुनियाभर से 12000 हजार शिक्षकों की एंट्री आई. इनाम की राशि का एलान होते ही दिसाले ने आधी राशि बाकी प्रतिभागी शिक्षकों में बांटने की घोषणा कर दी. वे कहते हैं कि शिक्षक हमेशा देने और बांटने में यकीन करते हैं. बता दें कि इनाम की आधी राशि बांटने पर हरेक रनर-अप के हिस्से 40 हजार पाउंड आएंगे.
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