जानिए, कितने दिनों तक रेप के सैंपल से रिजल्ट मिलता है सही

उत्तरप्रदेश में हाथरस मामला काफी तूल पकड़ चुका है- सांकेतिक फोटो (news18 creative)
उत्तरप्रदेश में हाथरस मामला काफी तूल पकड़ चुका है- सांकेतिक फोटो (news18 creative)

रेप (rape) की शिकायत पर सैंपल सही वक्त और सही तरीके से फॉरेंसिक लैब पहुंचना जरूरी है वरना इसके नतीजे पक्के नहीं रहते.

  • News18Hindi
  • Last Updated: October 6, 2020, 9:12 AM IST
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हाथरस गैंगरेप केस (Hathras Gang Rape Case) में 19 वर्षीय युवती की मौत के बाद से मामला काफी गरमाया हुआ है. इसी मामले पर टिप्पणी करते हुए अलीगढ़ के मुख्य चिकित्सा अधिकारी (CMO) ने पीड़िता की फॉरेंसिक रिपोर्ट को बेकार करार दिया. उनके मुताबिक जांच के लिए 11 दिनों बाद सैंपल लिया गया, जिससे सही रिजल्ट नहीं आता. जानिए, कितने दिनों के भीतर सैंपल लिए जाने पर सामने आता है सच? क्या कहती है रेप के मामलों पर सरकारी गाइडलाइन.

क्यों उठी है चर्चा
उत्तरप्रदेश में हाथरस मामला काफी तूल पकड़ चुका है. इस बारे में सत्ता और विपक्ष दोनों एक-दूसरे पर हमलावर हैं. इस बीच ये बात संदेह के घेरे में आ गई है कि क्या मृतका के साथ गैंगरेप हुआ था? असल में पीड़िता की फरेंसिक रिपोर्ट के आधार पर अलीगढ़ मेडिकल कॉलेज ने अपना अंतिम नजरिया बताया. इस बारे में इंडियन एक्सप्रेस में विस्तार से रिपोर्ट आई है. इसमें मेडिकल कॉलेज के सीएमओ डॉ. अजीम मलिक के हवाले से पीड़िता की फॉरेंसिक रिपोर्ट को अप्रासंगिक बताया जा रहा है.

पीड़िता के बालों, कपड़ों, नाखूनों, वजाइना से सैंपल लिए जाते हैं- सांकेतिक फोटो (news18 creative)

96 घंटों के भीतर लें सैंपल


डॉ मलिक के मुताबिक पीड़िता का सैंपल 11 दिनों बाद लिया गया, जबकि सरकारी गाइडलाइन के मुताबिक रेप की शिकायत पर पीड़िता का सैंपल सिर्फ 96 घंटों के भीतर ही लिया जाना चाहिए, तभी सही रिपोर्ट आती है. कुल मिलाकर डॉ मलिक के अनुसार अब जो सैंपल मिले हैं, उनके किसी रेप की पुष्टि नहीं हो सकती है क्योंकि काफी देर हो चुकी.

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सैंपल के तौर पर पीड़िता के बालों, कपड़ों, नाखूनों, वजाइना और गुदाद्वार से सैंपल लिए जाते हैं. इस दौरान ये जांच होती है कि क्या इन जगहों पर या ऑब्जेक्ट्स में स्पर्म मिल रहा है. ये जांच तभी सही होती है, जब जल्दी से जल्दी की जाए. इसमें देर होने पर यूरिनेशन, मल विसर्जन या पीरियड्स के आने के कारण स्पर्म हट जाते हैं और रिपोर्ट प्रभावित होती है.

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रेप की जांच के कई तरीके
फॉरेंसिक रिसर्च एंड क्रिमिनोलॉजी इंटरनेशनल नामक साइंस जर्नल में इस बारे में बताया गया है कि किन तरीकों से जांच करके अंतिम निर्णय लिया जाता है. रेप की पुष्टि के लिए पीड़िता के बयान के अलावा मेडिकल साक्ष्यों का भी काफी महत्व है. इसके तहत पीड़िता के कपड़ों की फॉरेंसिक जांच होती है और देखा जाता है कि क्या इसमें सीमन या खून या पसीने के कोई प्रमाण हैं.

रेप करने के तरीकों के साथ भी इसके सैंपल की जांच का समय बदलता है- सांकेतिक फोटो (news18 creative)


वक्त का ध्यान रखना जरूरी
रेप की दशा में पीड़िता के नाखून भी तह तक पहुंचने में मदद करते हैं. इनमें सीमन सैंपल या फिर अपराधी की स्किन पार्टिकल हो सकते हैं, जिनके जरिए डीएनए जांच हो सकती है. इसके अलावा पीड़िता की स्किन पर सलाइवा, पसीना या फिर स्पर्म की जांच के लिए भी सैंपल लेने की कोशिश की जाती है. हालांकि इन सारे ही सैंपल को जमा करने का एक खास तरीका होता है और साथ ही साथ ये टाइम-बाउंड भी होते हैं.

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कई बार एक दिन के भीतर सैंपल इकट्ठा करना जरूरी
रेप करने के तरीकों के साथ भी इसके सैंपल की जांच का समय प्रभावित होता है. अगर पीड़िता के मुंह में रेपिस्ट ने यौनांग डाला हो, तब ओरल स्वाब टेस्ट होता है. ये रेप के 12 से 24 घंटों के भीतर होना चाहिए, वरना नतीजों पर असर पड़ सकता है. ऐसे ही अगर वजाइना में यौनांग डाला जाए तो 3 से 5 दिनों के भीतर सैंपल दिया ही जाना चाहिए वरना इसके नतीजे सही नहीं आते. कई बार अगर पीड़िता के पीरियड्स हो रहे हों या फिर वो मूत्राशय के किसी रोग से पीड़ित हो तो सैंपल 24 घंटों के भीतर लिया जाना जरूरी होता है वरना प्रामाणिक नतीजे नहीं मिलते क्योंकि स्पर्म यूटेराइन कैविटी (गर्भाशय छिद्र) से हट जाते हैं.

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कपड़ों, नाखून और बालों के अलावा कई और सैंपल भी लिए जाते हैं. जैसे अगर पीड़िता का तब पीरियड चल रहा हो तो उसका टैंपून या पैड भी एक अहम साक्ष्य होता है. एक तरीका पब्लिक हेयर कॉबिंग भी है. इसमें साफ सरफेस पर पीड़िता की कंघी की जाती है ताकि अगर कोई फॉरेन आब्जेक्ट हो तो पता लगे.
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