रावलपिंडी में दंगाइयों से बचने के लिए हिंदू-सिख औरतों ने कुएं में छलांग लगा दी

एक तरह से नस्ली सफाये का उन्माद दंगाइयों के दिलों में भरा हुआ था

15 मार्च को रावलपिंडी में दंगों (Rawalpindi riots) की जो शुरुआत हुई, उसने लाखों लोगों को अपना घरबार छोड़कर भागने को मजबूर कर दिया. लेकिन सबसे ज्यादा जुल्म अल्पसंख्यक महिलाओं ने सहा.

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    साल 1947 में भारत विभाजन के साथ ही पूरे देश ने हैवानियत की वो झलक देखी, जो आज भी इतिहास के पन्नों पर काले अक्षरों में लिखी हुई है. लाखों लोगों के कत्ल, अपहरण और बलात्कार हुए. सबसे बड़ा जख्म पंजाब के लोगों को मिला, जिनकी गलती ये थी कि वे रेडक्लिफ लाइन के दूसरी ओर यानी मौजूदा पाकिस्तान में थे. मार्च 1947 में ही आजादी और बंटवारे से कई महीने पहले पंजाब के दूसरे हिस्से में कत्लेआम हो रहा था, जिसकी शुरुआत 15 मार्च से हुई.

    पाकिस्तान के हिस्से गई उत्तरी पंजाब और NWFP (अब खैबर पख्तूनख्वा) में अल्पसंख्यकों पर हुई इस हिंसा का जिक्र “Muslim League Attack on Sikhs and Hindus in the Punjab 1947” नाम की रिपोर्ट में हुआ था. इस रिपोर्ट को कंपाइल करने में कई दशक लग गए और आखिरकार साल 1991 में ये पाकिस्तान में रिलीज हुई. हालांकि तुरंत ही इसे दबा दिया गया.

    rawalpindi pakistan partition riots
    मोहल्लों में चील-गिद्धों का झुंड नजर आने लगा था (Photo- flickr)


    वैसे तो मजहब के आधार पर दंगों की शुरुआत साल 1946 में ही हो चुकी थी. तब ऑल इंडिया मुस्लिम लीग ने कोलकाता में डायरेक्ट एक्शन डे मनाने की बात की थी. वे धर्म के आधार पर देश के विभाजन की बात करने लगे थे. उनका कहना था कि वे बहुसंख्यक हिंदुओं के राष्ट्र में अपने हितों की रक्षा नहीं कर सकेंगे. इसके बाद से छिटपुट दंगे होने लगे. 4 और 5 मार्च को लाहौर और अमृतसर में मुस्लिम लीग से जुड़े चरमपंथियों ने मारपीट की. ये शुरुआत थी.

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    15 मार्च को रावलपिंडी में दंगों की जो शुरुआत हुई, उसने लाखों लोगों को पाकिस्तान (तब अखंड भारत) छोड़कर दूसरे राज्यों में भागने को मजबूर कर दिया. बंटवारे की हैवानियत का सबसे बड़ा शिकार पंजाब की महिलाओं को होना पड़ा. इस दौरान औरतों के साथ बलात्कार, कत्ल, धर्मांतरण जैसी तमाम जघन्य घटनाएं हुईं और हजारों की संख्या में महिलाएं लापता हो गईं. बाद में उनका कहीं कोई पता नहीं चला.

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    मजहब के आधार पर दंगों की शुरुआत साल 1946 में ही हो चुकी थी (Photo- flickr)


    रावलपिंडी हमलों के दौरान ही बड़ी संख्या में महिलाओं ने खुद को बलात्कार से बचाने के लिए खुद ही अपनी जान दे दी. थोहा खालसा के गांव में हिंदू सिक्ख औरतें दंगाइंयों से अपनी इज़्जत बचाने के लिए कुएं में छलांग लगाकर मर गईं. संत गुलाब सिंह की हवेली में औरतों की लाशों से भरा ये कुआं राजनेताओं को भी डराने लगा था. खुद पंडित जवाहरलाल नेहरू ने इस इलाके का दौरा किया था. बंटवारे के दौरान यह अनुमान लगाया जाता है कि करीब 25,000 से 29,000 हिन्दू और सिख महिलाओं और 12,000 से 15,000 मुस्लिम महिलाएं अपहरण, बलात्कार, धर्मांतरण और हत्या का शिकार हुईं.

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    एक तरह से नस्ली सफाये का उन्माद दंगाइयों के दिलों में भरा हुआ था. हालत यहां तक पहुंच गई कि पंजाब के पाकिस्तान वाले हिस्से में हिंदू-सिखों की आबादी 30 फीसदी से घटकर कुछ ही महीनों में 1 फीसदी हो गई. तकरीबन 5 से 7 लाख लोग पंजाब के दोनों तरफ मारे गए. जबकि लगभग 80 लाख लोगों को तीन महीनों के भीतर अपने शहर और राज्य छोड़ने पड़े.

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    शरणार्थियों को ले जाने वाली ट्रेनों में जिंदा लोग बैठते और लाशों से भरी ट्रेनें गंतव्य तक पहुंचती. दंगाइयों के इस नरसंहार के बारे में पंजाबी साहित्य के भूतपूर्व लेखक कुलवंत सिंह विर्क (Kulwant Singh Virk) ने लिखा था कि नहरें लाशों से ऐसे भरी आती थीं कि पाकिस्तान में उनके पानी से वुजू करना मुश्किल हो गया था. लाशों से भरी ट्रेनों का जिक्र भी कई समकालीन लेखकों ने किया था.

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