India-China Rift: पहले पल्ला झाड़ रहा रूस अब भारत-चीन में सुलह कराने पर क्यों तुला है?

रूसी राष्ट्रपति  व्लादिमीर पुतिन ऐसे ही भारत और चीन के मामले में नहीं पड़े. (फाइल)
रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ऐसे ही भारत और चीन के मामले में नहीं पड़े. (फाइल)

India-China Border dispute: रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन (Vladimir Putin) ऐसे ही भारत और चीन के मामले में नहीं पड़े. इसके पीछे एक पूरी रणनीति काम कर रही है, जिसमें अमेरिका का भी पक्ष है.

  • News18Hindi
  • Last Updated: September 20, 2020, 12:13 PM IST
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भारत-चीन के बीच सीमा विवाद को लेकर रूस ने एकदम से पैंतरा बदला है. अब वो दोनों देशों के बीच शांति स्थापित करने वाले मध्यस्थ की भूमिका में दिखाई दे रहा है. बता दें कि इससे पहले वो लगातार ये कहता रहा कि ये तनाव भारत और चीन का आपसी मामला है और वो इसमें दखल नहीं देगा. अब शंघाई सहयोग संगठन की बैठक के दौरान दोनों देशों की बीच शांति वार्ता होने पर रूस ने कहा कि उसने ही दो एशियाई ताकतों को मंच दिया ताकि वे सुलह कर सकें. जानिए, एकाएक ऐसा क्या बदला जो रूस संत के चोले में आ गया.

आखिर क्या चाहता है रूस
इसके पीछे रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन की काफी अहम महत्वाकांक्षा मानी जा रही है. असल में इस तरह से वो दक्षिण एशिया में खुद को अमेरिका से ज्यादा मजबूत बनाना चाह रहा है. रूसी एकेडमी ऑफ साइंसेज के साथ काम करने वाली संस्था IMEMO के मुताबिक रूस दक्षिण एशिया में अपनी वापसी करना चाहता है ताकि वो सोवियत संघ के दौरान रहा अपना प्रभाव दोबारा हासिल कर सके.

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बता दें कि अस्सी के शुरुआती समय तक रूस काफी मजबूत था और अमेरिका को टक्कर देने वाला माना जाता रहा. यहां तक कि वो खुद को अमेरिका से बढ़कर ही मानता रहा. इसकी उसके पास पूरी वजहें भी रहीं जैसे स्पेस में उसकी कामयाबी, परमाणु शक्ति संपन्न होना. रूस के विघटन के साथ वो कमजोर पड़ता गया.



रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ.


अमेरिका को करना चाहते हैं रिप्लेस
अब सत्ता में अगले 20 सालों तक पक्के हो चुके पुतिन रूस को दोबारा सुपर पावर बना देखना चाहते हैं. यही वजह है कि वो यूरोप और एशिया में खुद को नए सिरे से जमा रहे हैं. हालिया भारत-चीन तनाव भी रूस के लिए एक बड़ा मौका है कि वो खुद को शांतिदूत की तरह दिखा सके. इससे विवादों में फंसे रहने वाले देश रूस को मध्यस्ता के लिए कहेंगे और इस तरह से रूस के पास कूटनीतिक ताकत बढ़ती जाएगी. यही सोचते हुए रूस भारत-चीन मामले में भी बीच में आ गया है.

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मॉस्को में दोनों देशों के विदेश मंत्रियों के बीच हुई शांति वार्ता का श्रेय रूसी विदेश मंत्री सर्गेई लावरोव ने लपक लिया. हालांकि पूर्वी लद्दाख में दोनों तरफ सैनिकों की तैनाती को देखते हुए ये पक्का नहीं है कि सीमा पर शांति कितने समय तक बनी रहेगी.

देशों के बीच छवि मजबूत करने की कोशिश
रूस के दुनियाभर के देशों में खुद को मजबूत और शांतिपसंद देश के तौर पर स्थापित करने के प्रयास लगातार दिख रहे हैं. जैसे दो सालों पहले ही उसने अफगानिस्तान में शांति की पहल के लिए मॉस्को में वार्ता का आयोजन किया था. इसमें 10 से ज्यादा देश शामिल हुए, जिनमें भारत भी एक था. वार्ता काफी सफल रही और इस तरह से रूस की इमेज अमेरिका पर खिसियाने वाले देश से बदलकर शांतिप्रिय ताकत के तौर पर बनी.

भारत-चीन के बीच भिड़ंत के हालात बने तो रूस के लिए दोनों में से एक का चुनाव मुश्किल हो जाएगा


अमेरिका के जवाब में की पहल
लद्दाख में आर-पार खड़े देशों को शांत करने की रूसी कोशिश के पीछे एक वजह ये भी मानी जा रही है कि अमेरिका भी इजरायल और अरब देशों को मिला रहा है. यूरेशियन टाइम्स की एक रिपोर्ट के मुताबिक अमेरिका ने हाल ही में लगातार दो खाड़ी देशों को इजरायल के साथ खड़ा कर दिया. दशकों से कट्टर दुश्मन माने जाने वाले देशों को साथ लाने में ट्रंप का योगदान बताया जा रहा है. यहां तक कि उन्हें नोबल शांति पुरस्कार के उम्मीदवार की तरह देखा जा रहा है. ऐसे में पुतिन भला कैसे पीछे रहें! वे भारत और चीन के बीच तनाव को अपनी छवि चमकाने के लिए इस्तेमाल कर रहे हैं.

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रूस में फिलहाल अस्थिरता नहीं
चूंकि फिलहाल रूस में पुतिन अगले दो दशकों के लिए सत्ता में है और राजनैतिक अस्थिरता का कोई कारण नहीं दिख रहा इसलिए वे अपना ध्यान एशिया से लेकर यूरोप तक में खुद को सबसे मजबूत बनाने में लगे हुए हैं. इस समय दूसरे देश अपने यहां कोरोना से निपटने में लगे हैं, वहीं रूस अपने यहां पक्की वैक्सीन का दावा कर रहा है. वहां अब इसका सिविल एडमिनिस्ट्रेशन भी शुरू हो चुका. ऐसे में मॉस्को दूसरे देशों के बीच सुलह के लिए भरपूर वक्त भी दे पा रहा है.

पूर्वी लद्दाख में भारत और चीन आमने-सामने हैं (news18 graphic)


माना जा रहा है कि अगर रूस की पहल से भारत और चीन के बीच शांति आ जाती है तो इससे एशियाई देशों में पुतिन का प्रभाव बढ़ेगा.

भारत और चीन से अच्छे संबंध भी एक वजह
इन सारी वजहों के साथ-साथ एक बड़ी वजह रूस के चीन और भारत दोनों से दोस्ताना संबंध हैं. ऐसे में अगर भारत-चीन के बीच भिड़ंत के हालात बने तो रूस के लिए दोनों में से एक का चुनाव मुश्किल हो जाएगा. यूरेशियन टाइम्स के मुताबिक चीन के खिलाफ जाना रूस के लिए इस समय में बेहद कठिन कदम होगा क्योंकि इससे उसके व्यापारिक संबंध प्रभावित होंगे. इसी तरह से भारत से भी रूस के हमेशा से ही अच्छे रिश्ते रहे हैं. सैन्य मामलों में भी भारत और रूस मिलकर काम करते हैं. ऐसे में दोनों देशों में से एक का चुनाव रूस के लिए घाटे का सौदा होगा. यही सारे गुणा-भाग करके रूस फिलहाल तटस्थता छोड़ दोनों देशों के बीच मीडिएटर का काम करने आ गया है.
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