बैक्टीरिया को मारने के लिए बहुत दवाएं हैं लेकिन वायरस से निपटने में क्यों हैं हम पीछे

पृथ्वी पर बैक्टीरिया काफी पहले से ऑक्सीजन पैदा करने लगे थे. (प्रतीकात्मक फोटो)
पृथ्वी पर बैक्टीरिया काफी पहले से ऑक्सीजन पैदा करने लगे थे. (प्रतीकात्मक फोटो)

मेडिकल साइंस में एंटीबायोटिक (antibiotic) यानी बैक्टीरिया (bacteria) को मारने वाली दवाएं (medicines) तो काफी हैं लेकिन वायरस पर हमला करने वाली दवाएं यानी एंटीवायरस (antiviral) काफी कम हैं. क्या वजह है कि वायरस जैसे कि कोरोना वायरस (coronavirus) को खत्म करने वाली दवा बनाना इतना मुश्किल है?

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दूसरे विश्व युद्ध (second world war) के दौरान घायल सैनिकों को बचाने के लिए काफी सारी एंटीबैक्टीरियल दवाएं (antibacterial drugs) तैयार हुईं. इनमें पेनिसिलिन (penicillin) सबसे मुख्य थी, जो जख्मों पर पैदा होने वाले बैक्टीरिया को खत्म कर देती थीं. बैक्टीरिया से होने वाली बीमारियों में तो विज्ञान ने खासी प्रगति की लेकिन वायरस का हमला रोकने के लिए ज्यादा कुछ नहीं कर सका. खासकर कोरोना वायरस (coronavirus) के हालिया वैश्विक हमले में ये कमी और उभरकर सामने आई है. दुनिया से सारे देशों से एक के बढ़कर एक वैज्ञानिक इसके लिए एंटीवायरल बनाने में जुटे हुए हैं लेकिन अब तक कोई सफलता नहीं मिल सकी. आखिर क्यों वायरस को मारने वाली दवा बनाना ज्यादा वक्त लेता है और ज्यादा मुश्किलों से भरा है, जानिए.

ऐसे काम करती हैं एंटीवायरल दवाएं
सबसे पहले तो ये समझते हैं कि एंटीवायरल ड्रग्स क्या हैं. ये वे प्रेसक्राइब्ड दवाएं हैं, जो फ्लू से लड़ने के लिए दी जाती हैं. ये टैबलेट, कैप्सूल, सीरप, पाउडर या इंट्रावीनस यानी नसों के जरिए भी दी जाती हैं. ये कभी भी ओवर द काउंटर नहीं मिल सकती हैं, सिर्फ डॉक्टर ही इसे लिख सकते हैं. वैसे बीमारी शुरू होने के 2 दिन यानी 48 घंटे के भीतर अगर एंटीवायरस शुरू हो जाए तो बीमारी जल्दी ठीक होती है वरना दवा लेने के बाद भी जटिलता बढ़ती जाती है.

पेनिसिलिन की खोज के बाद से अब तक बहुत से एंटीबैक्टीरिया ड्रग्स तैयार हो चुके हैं

क्या है एंटीबैक्टीरियल ड्रग


इसी तरह से एंटीबैक्टीरियल ड्रग्स बैक्टीरियल डिसीज को खत्म करती हैं. ये 2 तरह से काम करती हैं- या तो सीधे बैक्टीरिया पर हमला करके उन्हें खत्म करना या फिर उन्हें बढ़ने से रोक देना. पेनिसिलिन की खोज के बाद से अब तक बहुत से एंटीबैक्टीरिया ड्रग्स तैयार हो चुके हैं जो WHO के मुताबिक हर साल करोड़ों जानें बचाते हैं. हालांकि इसका भी एक नुकसान है कि लगातार इस्तेमाल के कारण बैक्टीरिया में दवाओं के लिए प्रतिरोध पैदा जाता है और फिर वे कम खुराक पर काम नहीं करते, बल्कि लगातार डोज बढ़ाना पड़ता है.

क्यों कठिन है एंटीवायरल बनाना
अब अगर ये देखा जाए कि एंटीवायरल बनाना मुश्किल क्यों है तो इसका जवाब साइंस में ही छिपा है. दरअसल वायरस शरीर की कोशिकाओं में ही घर बनाते हैं और उसी के जरिए मल्टीप्लाई होना शुरू करते हैं. वे किसी भी तरह से अलग होकर हमला नहीं कर पाते हैं. इसपर दशकों से साइंटिस्ट ये समझने की कोशिश भी कर रहे हैं कि वायरस क्या सच में कोई लिविंग ऑर्गेनिज्म भी है या नहीं! वायरस का प्रोटीन शरीर में उपस्थित स्वस्थ कोशिका से जुड़ता है. इस पहली कोशिका को होस्ट सेल कहते हैं. वायरस इसके बाद होस्ट सेल का सिस्टम अपने कब्जे में ले लेता है और लगातार बढ़ने लगता है. वायरस का हमला इसलिए भी खतरनाक होता है कि कई वायरस शरीर में प्रवेश करने के बाद लंबे समय तक सुप्त अवस्था में पड़े रहते हैं. इसके बाद अचानक ये धीरे-धीरे बढ़ने लगते हैं और शरीर की बहुत सी स्वस्थ कोशिकाओं को बीमार करते जाते हैं.

ये देखा जाए कि एंटीवायरल बनाना मुश्किल क्यों है तो इसका जवाब साइंस में ही छिपा है


एंटीवायरल दवा, तभी कारगर होती है, जब ये वायरस की लाइफ साइकल को तोड़ सके. लेकिन समस्या यही है कि चूंकि वायरस शरीर की स्वस्थ कोशिकाओं में बसेरा डालता है इसलिए वायरस को खत्म करने के लिए दी जाने वाली दवा शरीर की कोशिकाओं को भी मार सकती है. वायरस को मारना आसान है लेकिन होस्ट सेल को बचाए रखना काफी मुश्किल है. यही वजह है कि एंटीवायरस दवा बनाने में वैज्ञानिकों को इतनी मुश्किलें आती हैं.

वायरस की संरचना भी अलग-अलग
एक और समस्या ये है कि वायरस बैक्टीरिया के मुकाबले ज्यादा अलग-अलग होते हैं और ज्यादा जल्दी रूप बदलते हैं. कुछ वायरस के जीनोम सीक्वेंस में DNA होते हैं, जबकि कुछ में RNA. कुछ सिंगल स्ट्रेंडेड होते हैं और कुछ डबल स्ट्रेंडेड. इसी वजह से अलग-अलग वायरस के लिए एकदम अलग तरह से सोचना और दवा तैयार करना होता है.

कोरोना वायरस का नया रूप अपनी नुकीली संरचना के कारण होस्ट सेल से ज्यादा मजबूती से जुड़ रहा है


कैसे तैयार होते हैं एंटी वायरस
एक सफल एंटी वायरस दवा वो होती है, जो वायरस की संरचना पर ऐसे हमला करे कि मरीज के शरीर की कोशिकाओं को कम से कम नुकसान हो. वायरस कोशिका से जितनी मजबूती से जुड़ता है, एंटी वायरल दवा को बनाया जाना उतना ही मुश्किल होता है. वैसे इंफ्लूएंजा की दवा एंटी वायरल का बेहतरीन उदाहरण है. ये सीधे वायरस के एंजाइम पर हमला बोलते हैं ताकि संक्रमण की गति एकदम धीमी हो जाए. फिलहाल कोरोना वायरस का नया रूप चूंकि अपनी नुकीली संरचना के कारण होस्ट सेल से ज्यादा मजबूती से जुड़ रहा है इसलिए इसकी दवा बनाने के लिए वैज्ञानिक 5 महीनों से काम कर रहे हैं लेकिन अब तक कोई कामयाबी नहीं दिखी है.

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