चीन के खिलाफ 'तिब्बत कार्ड' खेलना भारत के लिए क्यों खतरनाक है?

जानिए, क्या है तिब्बत कार्ड और भारत को इसका क्या फायदा या नुकसान हो सकता है- सांकेतिक फोटो (Pixabay)
जानिए, क्या है तिब्बत कार्ड और भारत को इसका क्या फायदा या नुकसान हो सकता है- सांकेतिक फोटो (Pixabay)

चीन से गहराते तनाव (India-China border tension) के बावजूद भारत तिब्बतियों में अपनी पैठ का इस्तेमाल नहीं कर रहा. हालांकि चीनी मीडिया (Chinese media) अक्सर इस बात पर डरता है कि भारत कहीं अपनी तिब्बत नीति (Tibet policy of India) पलट न दे.

  • News18Hindi
  • Last Updated: September 30, 2020, 6:02 PM IST
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भारत और चीन के बीच पूर्वी लद्दाख स्थित वास्तविक नियंत्रण रेखा (India-China tension at LAC) को लेकर तनाव गहराया हुआ है. छिटपुट सैन्य भिड़ंत के अलावा कूटनीतिक मोर्चे पर भी जंग चल रही है. हालांकि झड़प का मुंहतोड़ जवाब देने के बाद भी अब तक भारत ने शांति का रास्ता लिया हुआ है. इस बीच राजनैतिक विश्लेषक लगातार चर्चा कर रहे हैं कि आखिर भारत चीन को पटकनी देने के लिए तिब्बत कार्ड (Tibet card) का इस्तेमाल क्यों नहीं करता. जानिए, क्या है तिब्बत कार्ड और भारत को इसका क्या फायदा या क्या नुकसान हो सकता है.

चीन को है डर
असल में तिब्बत छोड़कर भारत में रह रहे तिब्बती धर्मगुरु दलाई लामा को पूरी दुनिया में पहचान मिली हुई है. चीन की ज्यादती के खिलाफ दलाई लामा को अमेरिका से लेकर सभी मजबूत यूरोपियन देशों की सहानुभूति मिली. अब चीन को डर है कि दलाई लामा और दूसरे निर्वासित तिब्बतियों की मदद से भारत चीन के खिलाफ नया मोर्चा खोल सकता है. चीन का सरकारी मीडिया ग्लोबल टाइम्स जब-तब भारत को ऐसा न करने के लिए धमकाता भी रहता है.

भारत के दलाई लामा की मान्यताओं पर सहमति जताने पर चीन अक्सर नाराजगी जताता है- सांकेतिक फोटो (Pixabay)

भारत क्यों इससे बच रहा है


हालांकि भारत ने कभी भी चीन के खिलाफ ये तरीका नहीं अपनाया. इसकी वजह समझने के लिए एक बार भारत, चीन और तिब्बत का इतिहास समझना होगा. साल 1959 में तिब्बत पर चीन के कब्जे के बाद वहां के नेता और धर्म गुरु दलाई लामा भागकर भारत आ गए. उनके साथ ही तिब्ब्तियों की एक बड़ी आबादी आई, जो अब हिमाचल के धर्मशाला से लेकर देश के कई हिस्सों में बस चुकी है. यहीं रहते हुए दलाई लामा चीन के खिलाफ मोर्चाबंदी किए हुए हैं और लगातार अपने देश की चीन से आजादी की बात उठाते रहते हैं.

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भारत ने तिब्बत को चीन का हिस्सा मान लिया था
दलाई लामा को शरण देने के कारण चीन भारत से तब से ही चिढ़ा हुआ है. खासकर भारत के दलाई लामा की मान्यताओं पर सहमति जताने पर चीन अक्सर नाराजगी जताता है. वैसे इसका दूसरा पहलू भी है. साल 2003 में तत्कालीन पीएम अटल बिहारी वाजपेयी सरकार ने तिब्बत को चीन का हिस्सा माना और चीन ने सिक्किम को भारत का हिस्सा मान लिया. ये एक तरह से करार था कि दोनों देश आपसी मामले में दखल न दें. तब चीन के राष्ट्रपति जियांग जेमिन हुआ करते थे. इसके साथ ही भारत उत्तरी सीमा को आधिकारिक तौर पर भारत-तिब्बत सीमा कहने की बजाए, भारत-चीन सीमा कहने लगा. ये एक तरह से चीन के तिब्बत पर अधिकार को मान्यता थी.

साल 2003 में भारत ने चीन के तिब्बत पर अधिकार को मान्यता दी- सांकेतिक फोटो (Pixabay)


क्या मुसीबत दे सकता है चीन
इसके बावजूद अब मौजूदा हालातों में ये बात आ रही है कि भारत अब चीन के खिलाफ अपना पत्ता खोल दे. हालांकि भारत के ऐसा न करने के पीछे कई वजहें हैं. जैसे बिगड़ते हालातों में अगर भारत तिब्बत की मदद लेता है या उसके स्वतंत्र राष्ट्र होने की बात करता है तो ये चीन के साथ साल 2003 में हुई बातचीत का उल्लंघन होगा. इससे ये भी हो सकता है कि चीन सिक्कम पर फिर से अपना हक जताने लगे. फिलहाल कोरोना से चरमराई अर्थव्यवस्था के बीच कोई भी नया विवाद देश को मुसीबत में डाल सकता है.

चुप्पी की ये एक बड़ी वजह
भारत के तिब्बत कार्ड से परहेज के कारण गिनाते हुए यूरेशियन टाइम्स में एक रिपोर्ट आई है. इसमें हिंदुस्तान टाइम्स के हवाले से बताया गया कि आखिर क्यों सत्ता पक्ष ये कार्ड नहीं चल रहा. माना जाता है कि तब तत्कालीन कांग्रेस सरकार ने दलाई लामा को शरण दी थी और उनके पक्ष में खुलकर बोला था. इसी का नतीजा था साल 1962 में चीन का भारत पर हमला.

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रिपोर्ट के मुताबिक चीन को हमेशा से डर रहा कि तिब्बत में सबसे अहम माने जाने वाले दलाई लामा और भारत मिलकर चीन में अस्थिरता ला सकते हैं. इसी डर की वजह से वो पहले भी आक्रामक हुआ था और दोबारा और भड़क सकता है. भारत के तिब्बत मामले पर चुप्पी की ये एक बड़ी वजह है.

भारत में रह रहे तिब्बती धर्मगुरु दलाई लामा को पूरी दुनिया में पहचान मिली हुई है


दलाई लामा भी एक वजह हैं 
एक बड़ी वजह खुद 85 साल के दलाई लामा हैं, जो कई बार ये कह चुके हैं कि वे न तो अपना उत्तराधिकारी चुनेंगे और न ही उसे प्रशिक्षण देंगे. ऐसे में अगर भारत तिब्बत कार्ड चल भी दे तो आने वाले वक्त में ये भारी पड़ सकता है. कुल मिलाकर यही माना जा रहा है कि भारत ने भले ही दलाई लामा और तिब्बत से निर्वासित लोगों को अपने यहां शरण दी लेकिन वो इस मामले में चीन के खिलाफ शायद ही कुछ बोले.

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साल 2003 का समझौता बड़ा रोड़ा
सबसे बड़ा कारण साल 2003 में भारत-चीन के बीच हुआ समझौता है, जिसके बाद से चीन ने तिब्बत को अपना मानते हुए सिक्किम से अपना जबरिया दावा हटा लिया. ऐसे में अगर भारत तिब्बत को स्वतंत्र कहता है तो चीन भारत के पड़ोसी देशों, जैसे पाकिस्तान और नेपाल के साथ मिलकर हर सीमा पर विवाद छेड़ सकता है. बता दें कि कुछ ही महीनों पहले नेपाल ने उत्तराखंड के तीन इलाकों को अपना बताया था. माना जा रहा है कि नेपाल ने ऐसा चीन के कहने पर किया. इसी तरह से पाकिस्तान, जो कि पहले से ही भारत से दुश्मनी रखता है, वो भी चीन के जरिए कश्मीर में विवाद पैदा कर सकता है.
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