क्यों कोरोना मरीजों में दिख रही है खून का थक्का बनने की समस्या?

कोरोना संक्रमण फेफड़ों के अलावा रक्त वाहिनियों पर भी असर डाल रहा है- सांकेतिक फोटो

चोट लगने पर शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता (immunity system) खून का थक्का (blood clotting) बनाकर ज्यादा खून बहने से रोकती है. यही बात कोरोना के गंभीर मरीजों से साथ भी दिख रही है. अस्पतालों में ब्लड क्लॉटिंग की शिकायत लेकर खासकर युवा मरीज (young Covid-19 patients with blood clotting problems) आ रहे हैं.

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    कोरोना के कहर के बीच इसके नए-नए लक्षण दिख रहे हैं. फेफड़ों की ये बीमारी केवल इसी अंग तक सीमित नहीं, बल्कि कोरोना के गंभीर संक्रमण के शिकार मरीजों की मौत हार्ट अटैक से भी होने की खबरें आ रही हैं. कुछ मरीजों की रिपोर्ट में खुलासा हुआ है कि उनके अंदर खतरनाक तरीके से खून के थक्के बन गए, जिससे हालात और जानलेवा बन गए. दुनियाभर में इस तरह के मामले आ रहे हैं, जिसमें ब्लड क्लॉटिंग होने जिसे डीप वेन थ्रोम्बोसिस (Deep vein thrombosis) के नाम से जाना जाता है, की शिकायत मिली.

    क्या है नसों में रक्त का थक्का जमना
    विशेषज्ञ मान रहे हैं कि कोरोना संक्रमण फेफड़ों के अलावा रक्त वाहिनियों पर भी असर डाल रहा है. डीप वेन थ्रोम्बोसिस यानी DVT वो स्थिति है, जिसमें नसों में रक्त का थक्का जमने लगता है. आमतौर पर ये पांव, टखने में सूजन के साथ होता है. इसमें पैर में दर्द शुरू होता है, जो पिंडली और ऊपर तक जाता है. प्रभावित अंग की स्किन तेज गर्म हो जाती है और लाल-नीली दिखने लगती है. लेकिन ये लक्षण केवल बाहरी हैं और कोविड के मामले में ये काफी अलग होते हैं. इसमें ये थक्के कहीं भी जम सकते हैं.

    blood clotting post covid
    कोविड के बाद खून के थक्के बनने का जोखिम सामान्य से कई गुना बढ़ जाता है- सांकेतिक फोटो (pixabay)


    कोरोना के मरीजों में स्टडी से पता चला है कि अस्पताल में भर्ती कोविड के लगभग 20 से 30 प्रतिशत रोगियों में ये समस्या देखने को मिल रही है. ये कैसे हो रहा है, इसपर फिलहाल स्टडी ही चल रही है लेकिन माना जा रहा है कि ये कोविड के कारण शरीर में आई सूजन के कारण होता है.

    इम्यून सिस्टम की प्रतिक्रिया 
    इसे इस तरह से भी समझ सकते हैं कि जैसे आप घुटनों के बल गिरें तो चोट लगने पर सबसे पहले दिखता है कि जख्मी अंग पर खून का थक्का जम जाता है. ये इसलिए होता है क्योंकि हमारा इम्यून सिस्टम चोट पर प्रतिक्रिया करता है और क्लॉटिंग होती है ताकि खून न बहे. इसी तरह से शरीर में किसी गंभीर संक्रमण पर भी इम्यून सिस्टम एक्टिव होकर क्लॉटिंग का संकेत देता है. यही कोरोना में हो रहा है. इसमें संक्रमित अंग यानी फेफड़ों के आसपास क्लॉटिंग हो रही है.

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    ये हो सकते हैं संभावित कारण
    वीएक्सनरमेडिकल बेवसाइट में ओहियो स्टेट मेडिकल सेंटर के एमडी मैथ्यू एक्सलाइन इस बारे में विस्तार से बताते हैं. उनके मुताबिक केवल गंभीर कोविड मरीजों में ही नहीं, बल्कि कम गंभीर मरीजों में भी ये हो सकता है. ऐसे मरीज घर पर ही आइसोलेट होकर इलाज लेते हैं. इस दौरान चलना-फिरना लगभग नहीं के बराबर हो जाता है. इन हालातों में भी शरीर की नसों में खून का थक्का बनने की आशंका रहती है. शरीर में सूजन और कम चलना-फिरना मिलकर इस खतरे को और बढ़ा देते हैं.

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    अस्पतालों में ब्लड क्लॉटिंग की शिकायत लेकर खासकर युवा मरीज आ रहे हैं- सांकेतिक फोटो (pixabay)


    ये जांच कराई जा रही 
    अप्रैल में प्रकाशित यूनिवर्सिटी ऑफ ऑक्सफोर्ड के एक अध्ययन के अनुसार कोविड के बाद खून के थक्के बनने का जोखिम सामान्य से कई गुना बढ़ जाता है. इसे ही रोकने के लिए अब कोरोना के बाद लोगों को खतरे से बाहर नहीं मान लिया जाता, बल्कि कई जांचें कराई जा रही हैं. इसमें से मुख्य है D-Dimer जांच. ये जांच पता करती है कि कोरोना के दौरान मरीज के शरीर का इम्यून सिस्टम खून के थक्के जमाकर खुद का ही नुकसान करने की तैयारी में तो नहीं. टेस्ट में शरीर में किसी भी ब्लड क्लॉट का पता चल जाता है.

    क्या समझ आता है जांच से 
    D-Dimer टेस्ट में लेवल अगर हाई होता है तो इसका मतलब है कि शरीर के भीतर खून के थक्के बन रहे हैं. चिकित्सक इसे देखते ही इसके मुताबिक इलाज शुरू कर देते हैं. कोरोना की शुरुआत में भी बहुत से लोगों को डी-डायमर की सलाह दी जा रही है ताकि शुरुआत में ही खतरे का पता लग सके. साथ ही ये भी दिख रहा है कि डी-डायमर टेस्ट में ज्यादा स्कोर वाले मरीजों के साथ ये डर होता है कि उन्हें आगे चलकर अस्पताल में ऑक्सीजन की जरूरत पड़े.

    किस तरह का इलाज हो रहा है 
    चिकित्सक रक्त के थक्के जमने की आशंका को देखते हुए कई तरह के इलाज दे रहे हैं. इसमें आमतौर पर ब्लड थिनर दवाएं दी जाती हैं ताकि खून पतला रहे और जमने का डर घटे. इसके अलावा कई बार थ्रोम्बोलाइटिक दवाएं भी नसों में दी जाती हैं, जो कि ज्यादा गंभीर स्थिति के लिए है. खून के थक्के अगर खतरनाक तरीके से बढ़ने लगें तो दवाओं की बजाए सर्जरी का सहारा लेना पड़ता है, ताकि थक्कों के कारण प्रभावित अंग तक ऑक्सीजन का प्रवाह बाधित न हो. इस प्रक्रिया को थ्रोम्बेक्टॉमी कहते हैं, जिसमें रक्त वाहिनिओं से थक्के हटाकर उन्हें वापस सिल दिया जाता है. हालांकि ये एक जटिल प्रक्रिया है, और विशेषज्ञ कोशिश कर रहे हैं कि कोविड की शुरुआत में ही ऐसे मरीजों की पहचान हो सके, जो खतरे की श्रेणी में हैं.