क्यों एक के बाद एक देश अंतरिक्ष में सैन्य अभ्यास कर रहे हैं?

अंतरिक्ष में बढ़ते खतरों को देखते हुए देश स्पेस आर्मी बना रहे हैं- सांकेतिक फोटो (pikist )

अंतरिक्ष में बढ़ते खतरों को देखते हुए देश स्पेस आर्मी बना रहे हैं- सांकेतिक फोटो (pikist )

तीसरे महायुद्ध के कयास लगातार लग रहे हैं. इस बीच ताकतवर देश अंतरिक्ष की प्रणालियों में भी खुद को मजबूत करते हुए स्पेस आर्मी (space army) तैयार कर रहे हैं.

  • News18Hindi
  • Last Updated: March 12, 2021, 10:12 AM IST
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अंतरिक्ष में बढ़ते खतरों को देखते हुए अमेरिका, रूस और चीन के बाद अब फ्रांस ने भी स्पेस फोर्स तैयार कर डाली. हाल ही में इस देश ने स्पेस में सैन्य अभ्यास शुरू किया है. इस ड्रिल के तहत ऐसी गतिविधियां की जाएंगी, जिससे खुद अपने ही देश के सैटेलाइटों को खतरा हो. इसका मकसद इस बात की जांच है कि अगर कभी स्पेस में युद्ध हो तो देश कैसे उन हालातों का सामना करेंगे. ये एक तरह से युद्ध की मॉक ड्रिल होगी. लेकिन क्या वजह है जो स्पेस में भी युद्धाभ्यास हो रहा है?

स्पेस फोर्स तैनात करने की शुरुआत अमेरिका से हुई

साल 2018 में तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने पहली बार अमेरिकी स्पेस फोर्स के बारे में बात की. जैसा कि नाम से आपको समझ में आ रहा होगा स्पेस फोर्स से ट्रंप का आशय एक और सैन्य शाखा है. फिलहाल अमेरिकी सेना की पांच शाखा हैं आर्मी, एयरफोर्स, नौसेना, मरीन कॉप्स और कोस्ट गार्ड. लेकिन स्पेस फोर्स से इसमें एक और इजाफा हो गया.

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अलग अलग देशों की सैटेलाइट से अंतरिक्ष भरा हुआ है- सांकेतिक फोटो (pixabay)

क्यों जरूरी है स्पेस फोर्स

ओबामा प्रशासन में एयरफोर्स सचिव डेबोरा ली जेम्स ने कहा था – स्पेस अब शांतिपूर्ण जगह नहीं रही. यह मुमकिन है कि धरती पर होने वाले संकट का खून स्पेस में बहाया जाए. रूस और चीन भी अमेरिका के लिए चिंता की वजह बने. 2018 में अमेरिकी रक्षा विभाग ने कहा था कि चीन ऐसी हाइपरसॉनिक मिसाइलों में निवेश कर रहा है तो अमेरिकी डिटेक्शन सिस्टम से बच सकें. यही कारण है कि धरती पर सुपर पावर देश ने स्पेस में भी दबदबा बनाने के लिए अंतरितक्ष में अपनी आर्मी तैनात कर दी.

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स्पेस में किस तरह का तनाव है

तनाव ही तनाव है. अलग अलग देशों की सैटेलाइट से अंतरिक्ष भरा हुआ है. ये वे उपग्रह हैं जो अमेरिका, रूस, चीन और अन्य देशों को दुश्मनों को ट्रैक करने में मदद करते हैं. साथ ही गुप्तचर एंजेसियों की तस्वीरें और मिसाइल कंट्रोल करने जैसे काम भी ये उपग्रह करते हैं. यह समझ लीजिए कि उपग्रह धरती के काम को बहुत आसान कर देता है. ताकतवर देश इसी वजह से स्पेस पर नजरें टिकाएं बैठे हैं. देशों को खासकर चीन की विस्तारवादी प्रवृति से डर है. चीन एक बार सैटेलाइट हैकिंग में माहिर हो जाए तो कई देशों की शामत आ सकती है, जो अर्थव्यवस्था में उससे होड़ ले रहे हैं. खासकर अंतरिक्ष में इससे बवाल मच सकता है.

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जिन देशों के पास पैसा और ताकत है, वह स्पेस में अपनी मजबूत उपस्थिति दर्ज करवाना चाहते हैं- सांकेतिक फोटो


इसके अलावा कमर्शियल उपग्रह जो आपके फोन, फेसबुक को चलाते हैं और टैक्सी को रास्ता दिखाते हैं. सैटेलाइट को हैक कर देना भी बड़ा काम नहीं है. इसके अलावा अंतरिक्ष का मलबा जो कमर्शियल और मिलेट्री स्पेस उपकरणों में रुकावट पैदा करता है. ऐसे में हर देश चाहेगा कि उसका टीम, स्पेस में रहकर इन सारी समस्याओं से निपटता रहे. जिन देशों के पास पैसा और ताकत है, वह इसलिए स्पेस में अपनी मजबूत उपस्थिति दर्ज करवाना चाहते हैं, फिर उसके लिए उन्हें सेना ही क्यों न भेजनी पड़े.

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रूस की बात करें तो उसने पहले ही अपना एंटी-सैटेलाइट प्रोग्राम चला रखा है ताकि दुश्मन देशों पर नजर रखी जा सके और किसी भी मिनट सैटेलाइटों को हैक करके सिस्टम तबाह किया जा सके. जाहिर है कि ऐसे में दूसरी ताकतें कैसे चुप रहेंगी! यही कारण है कि फ्रांस भी इस होड़ में आ चुका. वो पहला यूरोपियन देश है, जिसने स्पेस आर्मी की पहल की. इसमें उसे जर्मनी का भी साथ मिला है.

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फ्रांस की इस स्‍पेस एक्‍सरसाइज का मकसद भयंकर युद्ध की स्थिति में अपने सैटेलाइट्स और दूसरे उपकरणों की रक्षा करना और उसके लिए बनाए गए अपने स्‍पेस कमांड की क्षमता के बारे में जानना है. बता दें कि फ्रांस में स्‍पेस फोर्स का गठन दो वर्ष पहले 2019 में किया गया था. साल 2025 तक इसे और बढ़ाने की योजना है, जिसमें लगभग 500 स्टाफ होगा, जिसे अंतरिक्ष में महारथ होगी. इसके अलावा फ्रांसीसी सरकार आगामी छह सालों में इस मिशन पर करीब 5 अरब डॉलर का निवेश करने जा रही है.
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