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पूरे साल कोहरे की घनी परत से ढंकी रहती हैं दुनिया की ये जगहें

News18Hindi
Updated: December 31, 2018, 2:46 PM IST
पूरे साल कोहरे की घनी परत से ढंकी रहती हैं दुनिया की ये जगहें
फाइल फोटो

कोहरे के धुएं के साथ मिलने पर धुंध यानी स्मॉग बनता है. साल 1905 में स्मॉग शब्द चलन में आया जो अंग्रेजी से फॉग और स्मोक से मिलकर बना है.

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  • Last Updated: December 31, 2018, 2:46 PM IST
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साल के आखिरी महीने के आखिरी सप्ताह में लगभग पूरा देश शीतलहर की चपेट में रहा है. पारा लुढ़कने की वजह से दिन का भी तापमान सामान्य से कम चल रहा है. साथ में कोहरे की भी मार है. सर्दियों के मौसम में कोहरा आम बात है जिसका असर रोजमर्रा के कामों पर भी पड़ता है. जिस कोहरे की वजह से गाड़ियों की रफ्तार कम हो जाती है, ट्रेनें, हवाई जहाज रद्द होने लगते हैं, क्या है वो कोहरा, किस तरह से ये धुंध से अलग है और क्या नुकसान के अलावा इसके कोई फायदे भी हैं, इसपर एक पड़ताल.

बहुत छोटे-छोटे जलबिंदुओं के समूह को मिलाकर कोहरा बनता है, ये मूलतः गैस होती है जो कंडेंसेशन की प्रक्रिया यानी भाप के पानी बनने की प्रक्रिया से गुजरती है. पानी के ये छोटे कण हवा में तैरते रहते हैं और आंखों के सामने हल्की सफेद चादर जैसी दिखाई देती है जिससे आसपास की चीजें भी साफ नजर नहीं आती हैं. शहरों में ये स्थिति और खराब होती है, जहां धूल और धुएं के कण मिलकर पानी के इन कणों को और सांद्र यानी गाढ़ा बना देते हैं, जिससे बहुत करीब की चीजें भी धुंधली लगती हैं.





हरदम कोहरे से ढंकी रहती है ये जगहें



एक ओर हम कुछ ही हफ्तों के कोहरे से परेशान हो जाते हैं तो दूसरी ओर दुनिया की कई ऐसी जगहें भी हैं, जो हर वक्त कोहरे से ढंकी रहती हैं. कनाडा के न्यूफाउंडलैंड द्वीप के पास ग्रांड बैंक्स नाम की जगह दुनिया की सबसे ज्यादा कोहरे से ढंकी जगह है जो अटलांटिक महासागर में आती है. उत्तर की ओर से चलने वाली ठंडी लेब्राडोर करंट और पूर्व की ओर से आने वाली गर्म गल्फ हवाएं ग्रांड बैंक्स को हर वक्त घने कोहरे से ढांकी रहती हैं. इसके बाद क्रमशः चिली के अटाकामा कोस्ट, इटली की पो वैली, स्विटरलैंड के मध्यवर्ती पठार, अफ्रीका का नामिब रेगिस्तान, अटलांटिक कोस्ट का मिस्टेक आइलैंड, कैलीफोर्निया का सैन फ्रांसिस्को, कैलीफोर्निया का ही पॉइंट रेयेज़ और न्यूजीलैंड के हेमिल्टन को दुनिया में सबसे ज्यादा कोहरे में ढंकी जगहों में शुमार किया जाता है.

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कोहरा एक प्राकृतिक स्थिति है जो कई तरह की होती है, जैसे समुद्र की सतह पर होने वाला कोहरा जिसे सी-फॉग कहते हैं. कई बार कोहरा एकदम से घना होता है और फिर तुरंत ही गायब हो जाता है, इसे फ्लेश फॉग कहते हैं. ये फॉग हवा में नमी और तापमान की वजह से अचानक आकर चला जाता है.



कोहरा यानी फॉग और धुंध यानी स्मॉग/मिस्ट में अंतर है. कोहरे के धुएं के साथ मिलने पर धुंध यानी स्मॉग बनता है. साल 1905 में स्मॉग शब्द चलन में आया जो अंग्रेजी से फॉग और स्मोक से मिलकर बना है. डॉ हेनरी एंटोनी वोयेक्स ने अपने पेपर में इसका जिक्र किया, जिसके बाद से ये टर्म कहा-सुना जाने लगा.

कोहरा धुंध से घना होता है और अपेक्षाकृत ज्यादा वक्त तक रह सकता है क्योंकि इसमें पानी के कण धुंध से ज्यादा होते हैं. कोहरे में देख सकने की क्षमता हजार मीटर से कम हो जाती है, इसमें हवाई जहाज तो चल सकते हैं लेकिन सड़क पर गाड़ियां चलने के लिए ये आदर्श स्थिति नहीं. 50 मीटर से कम दृश्यता होते ही सड़क पर दुर्घटनाएं होने लगती हैं.

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कोहरे और धुंध की वजह से दुर्घटनाएं भी पिछले तीन सालों में लगातार बढ़ी हैं. रोड ट्रांसपोर्टेशन मिनिस्ट्री के अनुसार 2014 में 16 लोगों की कोहरे की वजह से सड़क दुर्घटना में मौत हुई तो 2015 में ये 21, जबकि 2016 में बढ़कर 25 से ज्यादा हो गया. दिल्ली, यूपी, पश्चिम बंगाल और हरियाणा में ही आधे से ज्यादा दुर्घटनाएं और मौतें हुईं. ये सभी रिपोर्टेड मामले हैं यानी वही मामले हैं, जिनपर कोई पुलिस कार्रवाई हुई. मौतों के अलावा गंभीर दुर्घटनाएं इन आंकड़ों में शामिल नहीं हैं.



सर्दियों में ही क्यों होता है स्मॉग?
इसकी एक बड़ी वजह खासतौर पर सर्दी के दौरान होने वाला प्रदूषण है, जो दिवाली में आतिशबाजी के अलावा पंजाब में पराली जलाए जाने की वजह से भी होता है. नासा की रिपोर्ट के अनुसार, पंजाब, उत्तर प्रदेश, राजस्थान और हरियाणा में हर साल जलाई जाने वाली पराली की वजह से और हवा की गति में गिरावट से एयर लॉक के हालात हो जाते हैं. यानी इससे होने वाला प्रदूषण स्मॉग में बदल जाता है, जो महीनों तक वातावरण में बना रहता है.

देश के कई हिस्से सर्दियों के दौरान लगातार कोहरे की चपेट में रहते हैं. इनमें दिल्ली, उत्तर प्रदेश, बिहार, हरियाणा और दक्षिणी पंजाब शामिल हैं. यहां पराली का जलना और हवा में मौजूद प्रदूषण स्मॉग की वजह बनता है. इसके अलावा सर्दी से बचाव के लिए लकड़ी-कोयला जलाना, पेंट, हेयरस्प्रे और पॉपकॉर्न पैकेजिंग भी इसकी कुछ वजहें हैं.



स्मॉग के फॉग से ज्यादा खतरे हैं. इसमें पानी की बूंदों के साथ धूल और हवा में मौजूद जहरीले तत्व जैसे नाइट्रोजन ऑक्साइड और ऑर्गेनिक कंपाउंड मिलकर नीचे की तरफ ओजोन की गहरी परत बना लेते हैं. अब आप सोचेंगे कि ओजोन तो हमें अल्ट्रावायलेट किरणों से बचाने वाली अच्छी परत है तो यह जान लें कि ओजोन तभी तक ठीक है जब वातावरण में ऊपर की ओर हो, जैसे ही यह ग्राउंड-लेवल पर आती है, सेहत के लिए बेहद खतरनाक हो जाती है.

वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गेनाइजेशन के आंकड़ों के अनुसार दुनियाभर में हर साल 4 मिलियन से भी ज्यादा लोगों की वायु प्रदूषण की वजह से होने वाली बीमारियों से मौत हो जाती है. भारत इस सूची में काफी आगे हैं, जिसकी पुष्टि इंडियन कौंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च की हालिया रिपोर्ट कहती है. इसके अनुसार हर 8 में से 1 मौत के लिए कहीं न कहीं वायु प्रदूषण जिम्मेदार है. इसमें भी दिल्ली, यूपी, बिहार, हरियाणा और राजस्थान में प्रदूषण का स्तर सबसे ज्यादा है.

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साल 2017 में भारत में जहरीली हवा 12.4 लाख लोगों की मौत के लिए लिए जिम्मेदार रही. इसमें वे आंकड़े शामिल नहीं हैं जिसमें प्रदूषण के कारण गर्भ में ही शिशु की मौत हो गई. इसके अलावा अवसाद, चर्मरोग, नेत्ररोग और अल्जाइमर्स जैसी बीमारियां भी बढ़ती जा रही हैं. साथ में छुटपुट समस्याएं जैसे गला, सिर, आंखों में दर्द और जलन से कोई भी बचा नहीं है.



जान भी बचाता है कोहरा
एक ओर कोहरा जानलेवा साबित हो रहा है तो दूसरी ओर कई सभ्यताओं में ये जान बचाने वाला भी बनता रहा है. कई जगहों पर जहां पीने के पानी की कमी होती है, वे पेड़-पौधों के नीच बर्तन रख देते हैं ताकि पानी जमा हो सके. हालांकि ये तरीका ज्यादा असरदार नहीं है. अब फॉग कैचर भी एक टर्म चलन में आया है. इसमें तकनीकी विशेषज्ञ बड़ी सी जगह पर जमा फॉग को पानी में बदलने की कोशिश कर रहे हैं ताकि पानी की कमी से निजात मिल सके.बेलाविस्टा और पेरू में फॉग कैचर काफी काम कर रहे हैं. बेलाविस्टा में नदी, झील या ग्लेशियर नहीं हैं, जिसकी वजह से पानी की कमी आम लेकिन गंभीर समस्या है. साल 2006 से वहां फॉग कैचर ने काम शुरू किया ताकि पानी की कमी से कुछ हद तक निजात मिल सके.

 

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First published: December 31, 2018, 11:10 AM IST
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