#MissionPaani: पानी तो होगा लेकिन पीने को एक बूंद मयस्सर नहीं होगी...

News18Hindi
Updated: July 2, 2019, 1:16 PM IST
#MissionPaani: पानी तो होगा लेकिन पीने को एक बूंद मयस्सर नहीं होगी...
इन मुख्य वजहों से जलसंकट गहराया हुआ है (तस्वीर- मनीकंट्रोल)

1970 में ही यह साफ हो चुका था कि गन्ने की पैदावार पहले से ही जलसंकट से जूझ रहे महाराष्ट्र के लिए ठीक नहीं. इसके बावजूद यहां इसपर नियंत्रण नहीं किया गया. गन्ने की पैदावार के कई राजनैतिक लाभ भी थे, जिनकी वजह से इसपर सरकारी लगाम नहीं कसी गई. अंजाम सामने है.

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आरएन भास्कर 

देश में जलसंकट की बड़ी वजह दरअसल पानी की कमी नहीं, बल्कि 'बेदिली' है. यहां सरकार के पास पानी की खपत को जांचने के लिए कोई सख्त पैमाना नहीं.

ब्रिटिश कवि सैमुअल कोलरिज की एक कविता है- "द रिम ऑफ द एंशिएंट मेरिनर". कविता का नायक गलती से albatross (समुद्री पक्षी की एक प्रजाति) को मार देता है. मारा गया पक्षी ईश्वर को बेहद पसंद था. इसके बाद उसे मारने वाला अपनी पूरी जिंदगी पश्चाताप में बिताता है. फिलहाल देश में पानी के हालातों को देखकर भी कुछ यही कहा जा सकता है.जल्द ही हम भी ऐसे ही पश्चाताप में डूबने वाले हैं.

भारत दुनिया के चुनिंदा देशों में से है, जहां भरपूर पानी है. लेकिन इसके बावजूद यह अकेला देश हो सकता है जहां निकट भविष्य में भुखमरी और पानी की कमी के कारण सबसे ज्यादा मौतें हो सकती हैं. पानी के हालात इस साल बदतर होने जा रहे हैं, उससे कहीं ज्यादा बदतर, जिसकी हमने कल्पना की है. जिन मुख्य वजहों से जलसंकट इतना गहराया हुआ है, उसमें इस साल कम बारिश की संभावना भी एक वजह है.

हमारे यहां पानी के भरपूर स्त्रोत तो हैं लेकिन इस बात की कोई नाप-जोख नहीं रखी जा रही कि कितना पानी कहां और किसलिए खर्च हो रहा है. कई नगरपालिकाओं में ऐसा करने की कोशिश तो होती है लेकिन सही ढंग से नहीं. अकेले मुंबई में ही लगभग 30 प्रतिशत पानी नॉन-रेवेन्यू पानी (एनआरडब्ल्यू) के तहत गायब हो रहा है. भूमिगत पानी भी लिया जा रहा है, लेकिन इसका कोई आंकड़ा नहीं. फसलों में कितना पानी खर्च होता है, इसका कोई पैमाना नहीं. और महाराष्ट्र में खासकर किसान सहकारी समितियों में खेतों से जुड़े उद्योगों में कितना पानी लग रहा है, इसकी कोई जांच या पैमाना नहीं है.

जैसा कि कहा जाता है, जल प्रबंधन की शुरुआत जल मापन से होती है. भारत में अपने घर या खेत में बोरवेल कराने के लिए सरकारी इजाजत लेनी होती है. लेकिन इसपर कोई नियंत्रण नहीं होता कि बोरवेल के बाद कितना पानी खर्च हो रहा है. नहरों से लिए जा रहे पानी का भी यही हाल है. जब तक ये डाटा नहीं मिलता है, जल प्रबंधन मुमकिन नहीं.

जल प्रबंधन के लिए पानी की खपत मापने का कोई पैमाना नहीं (तस्वीर- मनीकंट्रोल)

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हर कोई उतना पानी खर्च करता है, जितना वो चाहे. जो शख्स जितना ताकतवर होता है, वो पानी खर्च करना अपना उतना ही बड़ा हक मानता है.

महाराष्ट्र जैसे राज्य, जहां किसानों की खुदकुशी का आंकड़ा सबसे ज्यादा है, वहां इसे खास तरीके से देखे जाने की जरूरत है. गन्ने की पैदावार में पानी की खपत सबसे ज्यादा होती है. इसके बावजूद यहां गन्ने की फसल की अनुमति मिलती है. आज, महाराष्ट्र पानी की कमी के बावजूद चीनी के राष्ट्रीय उत्पादन में 21 प्रतिशत की हिस्सेदारी रखता है. साल 1991 के बाद से यहां गन्ने की पैदावार में बढ़त ही हुई जो दूसरे राज्यों से बहुत ज्यादा है.

हालांकि 1970 में ही यह साफ हो चुका था कि गन्ने की पैदावार पहले से ही जलसंकट से जूझ रहे महाराष्ट्र के लिए ठीक नहीं. इसके बावजूद यहां इसपर नियंत्रण नहीं किया गया. गन्ने की पैदावार के कई राजनैतिक लाभ भी थे, जिनकी वजह से इसपर सरकारी लगाम नहीं कसी गई. अंजाम सामने है.

गन्ने की फसल पानी की खपत के दूसरे पहलुओं की तरफ भी ले जाती है. खासकर शराब उद्योग में. गन्ने का रस भट्टियों में इस्तेमाल होता है. ये लाभ का धंधा है, जो अमूमन निजी व्यवसायों के तौर पर चल रहा है. इसमें सहकारी समितियों को कोई हिस्सा नहीं मिलता. यानी निचले तबके के लोगों तक इसका कोई लाभ नहीं पहुंच रहा है. यहां तक ​​कि महाराष्ट्र के सबसे प्रभावशाली राजनीतिक नेता शरद पवार की भी बारामती में और उसके आसपास चीनी-सहकारी समितियां हैं लेकिन डिस्टिलरी का कारोबार निजी संस्था की तरह चलता है. गणित साफ है. सहकारी समितियों का नुकसान हो तो सरकार से भरपाई मिलेगी लेकिन मुनाफा हो तो फायदा अपनी जेब में जाता है.

सिंचाई में अनियमितता महाराष्ट्र के किसानों की तंगहाली की एक वजह है (तस्वीर- प्रतीकात्मक)


महाराष्ट्र पर गहराए संकट की एक और वजह भी है. ये है सिंचाई में अनियमितता. सिंचाई के लिए दिया जाने वाला फंड निजी लाभों के मद्देनजर दिया जाने लगा. ये बात सामने आई, जब फरवरी 2012 में - राज्य के सिंचाई विभाग के एक मुख्य अभियंता विजय पंद्रे ने अधिकारियों को एक पत्र लिखा. भ्रष्टाचार और भाई-भतीजावाद के कारण जनता का पैसा कैसे बर्बाद हुआ, इसके कई उदाहरणों का हवाला देते हुए उन्होंने 15 पेज के दस्तावेज में घोर अनियमितताओं की ओर इशारा किया. उन्होंने दस्तावेज में बताया कि कैसे लगभग 99 प्रतिशत सिंचाई योजनाएं ठप पड़ी हुई हैं, जिसके कारण लगभग 15,000 करोड़ का नुकसान हुआ.

अगस्त, 2012 में एक स्वैच्छिक संस्था जन मंच द्वारा मुंबई हाईकोर्ट की नागपुर बेंच के समक्ष एक लिखित याचिका दायर की गई थी. इसने लागत की जांच की मांग की. याचिका के अनुसार, साल 2009 में 7 महीनों के भीतर विदर्भ इरिगेशन डेवलपमेंट कार्पोरेशन (VIDC) के तहत आने वाले सिंचाई के 38 प्रोजेक्ट्स की लागत तय लागत से एकाएक लगभग 20 करोड़ अधिक हो गई.

अदालत ने सरकार को नोटिस भेजा. जांच बंद करने से इन्कार कर दिया लेकिन तमाम कोशिशों के बावजूद एक भी दोषी सामने नहीं लाया जा सका.

फंड में हेराफेरी एक और राजनैतिक लाभ की वजह बन गई. यह पक्का किया गया कि राज्य के दूसरे हिस्सों में पानी न पहुंचे. इस तरह से गन्ने की लॉबी में कम या ज्यादा जितना भी पानी बाकी है, खर्च होता रहे और रसूखदार लोगों की जेबें भरती रहें.

RBI की हैंडबुक (2018-19) के आंकड़े


अगर महाराष्ट्र में कृषि संकट के लिए कोई जिम्मेदार है, तो वह नेता हैं, खासकर गन्ना कारखानों को चलाने वाले नेता. आने वाले सालों में विदर्भ जैसे इलाकों में लोग विद्रोह कर उठें तो हैरानी की बात नहीं होगी.

महाराष्ट्र के वर्तमान मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने संभावित संकट वाले इलाकों में जलयुक्त शिविर या तालाब बनवाने की पहल की है. यह एक अच्छी कोशिश हो सकती है. ऐसे में बारिश का पानी उन किसानों के काम आ सकता है, जो सिंचाई योजनाओं में अब भी शामिल नहीं किए गए हैं.

लेकिन फडणवीस की ये योजना भी आकार नहीं ले सकेगी, ऐसा लगता है. कम बारिश की आशंका को देखते हुए किसानों ने पहले ही बोरवेल बनवा लिया है. और अपने तालाबों को पानी से भर चुके हैं. वे जानते हैं कि बारिश नहीं हुई तो उन्हें अपना इंतजाम रखना ही होगा. यानी इस बार तो इससे उन्हें फायदा हो सकता है लेकिन एक बार फिर से जमीन में पानी का स्तर घट गया है.

हालात इतने गंभीर और भयावह हो चुके हैं कि नुकसान का असर आने वाली कई पीढ़ियां झेलेंगी. तब अंग्रेजी भाषा के कवि कोलरिज की कविता हकीकत बन जाएगी- "Nor any drop to drink".

(लेखक आरएन भास्कर मनीकंट्रोल में कंसल्टिंग एडिटर हैं)

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First published: July 1, 2019, 2:53 PM IST
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