• Home
  • »
  • News
  • »
  • knowledge
  • »
  • जब पटेल और नेहरू में ठनी और दोनों के बन गए गुट

जब पटेल और नेहरू में ठनी और दोनों के बन गए गुट

महात्मा गांधी और जवाहरलाल नेहरू के साथ मंत्रणा करते वल्लभभाई पटेल (फोटो सौजन्यः विकीमीडिया कामंस)

महात्मा गांधी और जवाहरलाल नेहरू के साथ मंत्रणा करते वल्लभभाई पटेल (फोटो सौजन्यः विकीमीडिया कामंस)

गांधी के निधन के कुछ ही समय बाद नेहरू और पटेल के मतभेद फिर उजागर हो गए. असर कांग्रेस में भी दिखने लगा.

  • Share this:
जवाहरलाल नेहरू और पटेल से रिश्तों को लेकर काफी कुछ कहा गया. हाल के बरसों में इस तरह की बातों ने भी जोर पकड़ा कि दोनों में काफी मतभेद थे. हालांकि ये सही नहीं लगता. क्योंकि समय समय पटेल ने इस बारे में खुद काफी साफ साफ लिखा और कहा है. 14 नवंबर 1949 को जब पूरा देश जब नेहरू का 60वां जन्मदिन मना रहा था तब एक ग्रंथ का प्रकाशन किया गया, जिसमें कई दिग्गज तत्कालीन नेताओं के साथ वल्लभभाई पटेल ने भी नेहरू पर एक अध्याय लिखा. उसमें उन्होंने साफ किया था कि नेहरू से उनके कोई मतभेद नहीं हैं बल्कि कुछ लोग अपने स्वार्थ और निजी हितों के चलते इस तरह की बातें फैलाते रहे हैं.

वो ये मानते थे कि दोनों के दृष्टिकोण कई मुद्दों पर अलग होते थे लेकिन वो इन सभी पर खुले दिल और दिमाग से विचार विमर्श करके रास्ता निकालते थे. तमाम महत्वपूर्ण मामलों में नेहरू उनसे और वह नेहरू से बातचीत करते थे. कोई ऐसा दिन नहीं होता था, जब दोनों की बातचीत नहीं हो. पटेल खुद मानते थे कि गांधी के बाद अगर देश में कोई लोकप्रिय औऱ जनता का नेता कोई है तो वह नेहरू हैं. हां, ये सही है कि कई मामलों पर पटेल का रुख दृढ़ होता था और नेहरू को उसे मानना होता था. कई बार पटेल नेहरू की हिचकिचाहट के बाद भी फैसला ले लेते थे. जिस तरह उन्होंने हैदराबाद विलय के सवाल पर सेना भेजने के मामले पर किया था. हालांकि ये भी कहा जाता है कि उनकी इस कार्रवाई में नेहरू की सहमति छिपी हुई थी, अन्यथा वो इतनी बड़ी कार्रवाई बगैर प्रधानमंत्री के चाहे कैसे कर लेते.

पहले राजेंद्र प्रसाद को लेकर ठनी
राजेंद्र प्रसाद इस पद के मजबूत दावेदार थे. ज्यादातर कांग्रेसी राजेंद्र प्रसाद के पक्ष में थे. न जाने कैसे नेहरू ने राजेंद्र प्रसाद को तैयार कर लिया कि वो राजगोपालाचारी के रास्ते में नहीं आएं. इससे राजेंद्र प्रसाद के समर्थकों में रोष फैल गया। वे पटेल के पास सलाह लेने पहुंचे, क्योंकि उन्हें मालूम था कि पटेल भी राजेंद्र प्रसाद के समर्थक हैं. पटेल ने समर्थकों से व्यंग्य किया, जब दूल्हा ही मैदान छोड़ गया तो बारात कैसे जाएगी. लेकिन पटेल ने समर्थकों के साथ विचार विमर्श के बाद कहा, जब ये प्रश्न औपचारिक तौर पर उठे तो नेहरू को प्रसाद के हक में औऱ सीआर के खिलाफ फैसला लेने पर विवश किया जाए.

फैसला वो हुआ जो पटेल चाहते थे
नेहरू ने जब राष्ट्रपति के चुनाव पर औपचारिक तौर पर अनुमोदन कराने के लिए मीटिंग बुलाई तो उन्होंने काफी देर तक राजगोपालाचारी के गुणों का बखान किया. लेकिन इसका ज्यादा असर पड़ा नहीं. ज्यादातर कांग्रेसियों का कहना था कि राजगोपालाचारी ने तब कांग्रेस का साथ छोड़ दिया था जब गांधीजी ने 1942 में भारत छोड़ों आंदोलन शुरू किया था. तब उन्होंने पार्टी से त्यागपत्र दे दिया था. यही नहीं उन्होंने जिन्ना से समझौते की बात कहकर पाकिस्तान की मांग को मान्यता भी दी थी. राजगोपालाचारी के समर्थन में नेहरू की सारी दलीलें बेकार गईं. आखिर में नेहरू का मान रखने के लिए पार्टी ने फैसला नेहरू और पटेल पर छोड़ दिया. फैसला वही हुआ जो पटेल और पार्टी चाहती थी. नेहरू नाराज तो हुए लेकिन राजेंद्र प्रसाद पहले राष्ट्रपति बन चुके थे. फिर तमाम ऐसी बातें होती रहीं जो पटेल और नेहरू के बीच मतभेद बढाती रहीं.

पटेल को बहुत चाहते भी थे नेहरू
नेहरू पर बाद में ये आऱोप लगे कि उन्होंने पटेल को वो सम्मान नहीं दिया, जिसके वो हकदार थे. ये अटकलें और बातें भी होती रहीं कि दोनों के रिश्तों में दूरियां, अविश्वास और असहजा थी. लेकिन पटेल ने अपने और नेहरू के संबंध में फैली इस बातों पर खुद समय-समय पर गहरी नाराजगी जाहिर की. पटेल का कहना था कि नेहरू और उन्होंने इतने लंबे समय तक साथ में काम किया है कि उनमें खास अनुराग, भाईचारा और समझबूझ पैदा हो गई है. अगर आपसी मंत्रणा के लिए मुझे नेहरू का साथ नहीं मिल पाता तो मैं खालीपन महसूस करता हूं. उन्होंने नेहरू के 60वें जन्मदिन पर लिखा, हमारी आपसी समझबूझ समय के साथ बढ़ी है. लोगों के लिए इसे समझ पाना मुश्किल है कि जब हम अलग होते हैं तो एक-दूसरे को किस कदर मिस करते हैं.

नेहरू ने पटेल के देहांत के एक घंटे बाद 15 दिसंबर 1950 को संसद में कहा, आज सुबह एक महान जीवन का अंत हो गया, हम सभी उनके महान जीवन की कहानी से वाकिफ हैं, ये पूरा देश जानता है. इतिहास में उनके नाम कई पेज दर्ज होंगे. परंतु हममे से ज्यादातर के लिए वह स्वतंत्रता के हमारे संघर्ष के महान कप्तान हैं. ऐसे शख्स जो जीत औऱ दिक्कत के क्षणों में हमें सलाह देते थे. मैं उनके साथ यहां कई सालों से बैठा हूं. अब जब भी इस खाली जगह को देखूंगा तो खालीपन का अहसास होगा.

पटेल और नेहरू दोनों बहुत विशाल कद के नेता थे. और दोनों ने शायद कभी दूसरे को कुछ ऐसा कहा हो, जो अनुचित हो और ये दिखाता हो कि उनमें मतभेद हैं. हां, कई ऐसे मौके जरूर आए जब नेहरू ने कोई बड़ी गलती की और पटेल ने उन्हें सीधे टोक दिया. जिसे नेहरू ने स्वीकार भी किया. नेहरू भलीभांति वाकिफ थे कि पटेल ने गृहमंत्री के रूप में कई ऐसे बड़े काम किए, जो उनके लिए आसान नहीं थे. पटेल ने सार्वजनिक तौर पर जो कुछ भी लिखा या कहा, उसमें नेहरू को लेकर एक अपनत्व हमेशा झलकता रहा. लेकिन समय के साथ चर्चाएं और कयास के रूप बदल जाते हैं. समय के पहिए के साथ ये बात और जोर पकड़ती गई कि नेहरू और पटेल दो अलग अलग ध्रुवों पर खड़े थे. ये भी माना जाता रहा कि प्रधानमंत्री नहीं बनाए जाना पटेल के साथ अन्याय था.

यह भी पढ़ें: सुभाषचंद्र बोस को लेकर क्यों लगाए जाते हैं जवाहरलाल नेहरू पर आरोप?

पढ़ें Hindi News ऑनलाइन और देखें Live TV News18 हिंदी की वेबसाइट पर. जानिए देश-विदेश और अपने प्रदेश, बॉलीवुड, खेल जगत, बिज़नेस से जुड़ी News in Hindi.

हमें FacebookTwitter, Instagram और Telegram पर फॉलो करें.

विज्ञापन
विज्ञापन

विज्ञापन

टॉप स्टोरीज