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research is gossiping is good and positive for health

रिसर्च : क्या चुगली करना स्वास्थ्य के लिए अच्छा होता है

गॉसिप करने के बाद हमें रिलैक्स होते हैं, तनाव कम होता है और कई बार बांडिंग भी बढ़ती है. (ShutterStock)

गॉसिप करने के बाद हमें रिलैक्स होते हैं, तनाव कम होता है और कई बार बांडिंग भी बढ़ती है. (ShutterStock)

दुनियाभर में कई रिसर्च ये बताते हैं कि गॉसिपिंग करने की हमारी आदत ना केवल बहुत नेचुरल है बल्कि काफी हद तक ये स्वास्थ्य और खुशी के लिए भी जरूरी होती है. कई रिसर्च ये भी कहते हैं कि दुनिया में हम जिस तरह परिवार, ग्रुप, धर्म और समुदाय देख रहे हैं, हो सकता है कि प्राचीन समय में उन्हें बनाने का काम गॉसिपिंग ने ही किया हो.

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आमतौर पर आपने शुरू होगा कि चुगली करना बुरी आदत होती है. हर आफिस में गॉसिप क्वीन या गॉसिप किंग के तौर पर कुछ लोगों को चिन्हित कर दिया जाता है कि इनसे सतर्क रहें क्योंकि ये लोग बहुत चुगलीबाज हैं, बहुत इधर का उधर करते हैं लेकिन अगर आपसे ये कहा जाए कि गॉसिपिंग या चुगली की आदत में हमें नैसर्गिक तौर पर मिली है. हमारे ब्रेन की वायरिंग ही ऐसी है कि हम ऐसा करेंगे ही करेंगे. केवल यही नहीं हाल के कई रिसर्च तो ये भी कहते हैं कि गासिपिंग अच्छी है, ये सेहत को बेहतर रखती है. खुश रखती है. ये बांडिंग बनाती है.

इसे लेकर कुछ समय पहले पाविया यूनिवर्सिटी इटली, आक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी में रोचक रिसर्च हुई. हाल की एक चर्चित किताब “सेपियंस – ए ब्रीफ हिस्ट्री ऑफ मैनकाइंड” के लेखक युवल नोह हरारी ने अपनी किताब में इसका जिक्र किया है.

बात शुरू करते हैं ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी की आंखें खोल देने वाली रिसर्च से, जो कहती है कि गॉसिपिंग की आदत हमें मानवीय बनाती है. इससे खुशी मिलती है. उम्र बढ़ती है. ये कुछ उसी तरह की लत है जैसे सिगरेट पीने वाले को उसकी लत महसूस होती रहती है.

विरासत में मिली है ये आदत 
कुछ समय पहले “डेली मेल” ने इस रिसर्च को लेकर एक आर्टिकल प्रकाशित किया. बकौल इसके, गॉसिपिंग की आदत हमें विरासत में मिली है. यानि हमारे डीएनए में है. जब से मानव ने संवाद की कला विकसित की. वो संकेतों से लेकर बोलने की कला तक पहुंचा. भाषा का विकास हुआ, उसी के साथ गॉसिप का भी विकास हुआ. ये हमारे अंदर जोर मारने लगी.

स्वस्थ, प्रसन्न और इंसान जैसा महसूस करते हैं
रिपोर्ट के अनुसार गॉसिप करने से हम अधिक स्वस्थ, प्रसन्न और इंसान जैसा महसूस करते हैं. किसी के बारे में उसके पीठ पीछे बात करने की हमारी आदत हमें दूसरी प्रजातियों से अलग करती है. इससे जुड़ाव या लगाव की फीलिंग आती है. हमें ये भी पता लगता है कि कौन-कौन भरोसे के लायक हैं.

गॉसिप करने से हम अधिक स्वस्थ, प्रसन्न और इंसान जैसा महसूस करते हैं. किसी के बारे में उसके पीठ पीछे बात करने की हमारी आदत हमें दूसरी प्रजातियों से अलग करती है.

फील गुड करने लगते हैं
ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी के इवोल्यूशनरी साइक्लॉजी डिपार्टमेंट के प्रोफेसर रॉबिन डनबर के नेतृत्व गॉसिप संबंधी एक रिसर्च कुछ महिलाओं के ग्रुप पर की गई. ये देखा गया कि जब दो महिलाएं आपस में चुगली या गॉसिप करती थीं तो उनके दिमाग में उस हारमोन का स्तर बढ़ जाता था, जिसे आक्सीटोसिन कहते हैं, इसे लव हार्मोन भी कहते हैं, ये अलग ही खुशी का पूरे शरीर फील कराने लगती है.

हर संस्कृति में गॉसिप कैरेक्टर रहे हैं
रिसर्च कहती है, गॉसिप संचार का ऐसा साधन है. जिससे आयु बढ़ती है, जिंदा रखने के लिए ये जरूरी है. वैसे दुनिया की हर संस्कृति गॉसिप को लेकर मजेदार पौराणिक चरित्र रहे हैं. लेकिन मजेदार ये भी है कि इन सारे चरित्रों ने सकारात्मकता को ज्यादा गति दी है. भारत के ही पुराणों में नारद के तौर पर जिक्र किए जाने चरित्र यही हैं. उनके पास दुनिया की हर जानकारी होती थी. और वो इससे अपने अंदाज में जो गॉसिपिंग करते थे, उसका जो भी असर हुआ हो लेकिन अंतोगत्वा जो परिणाम सामने आए, वो मानवता और समाज के लिए बहुत सकारात्मक रहे.

गॉसिपिंग ने विकासक्रम में मदद की
गॉसिपिंग ने मानव के विकास क्रम में अगर अलग ग्रुप, परिवार, कबीले और धर्म बनाने में मदद की तो अलग अलग विचार और राय वाले लोगों को एक पाले में आने में मदद की, इसने भाषा के विकास में मदद की. किस्सागोई और कहानियों के साथ चरित्रों को गढ़ने और समझने में मदद की.

मानव की फितरत ही ऐसी होती है कि इस पृथ्वी पर हर शख्स गॉसिप करता है. हर शख्स इससे जुड़ता है, बगैर इसके वो रह ही नहीं सकता. (ShutterStock)

दुनिया में हर कोई ऐसा करता है
रिसर्च का लब्बोलुआब ये है कि मानव की फितरत ही ऐसी होती है कि इस पृथ्वी पर हर शख्स गॉसिप करता है. हर शख्स इससे जुड़ता है, बगैर इसके वो रह ही नहीं सकता. इसलिए आपको इस बात पर कतई शर्मिंदा होने की जरूरत नहीं है कि कोई अगर आपको गॉसिपबाज कह रहा हो. गॉसिपिंग दरअसल एक ओपिनियन भी है, जो हम लोगों, घटनाओं और चीजों को लेकर बनाते हैं.

80 फीसदी हिस्सा गॉसिप होता है
अक्सर जब दो लोग बात करते हैं तो उनकी बातचीत का 80 फीसदी हिस्सा दूसरों को लेकर होता है. मनोविज्ञान कहता है बिचिंग या बैकबाइटिंग खुद को अजीब तरीके से हल्का और खुश फील कराता है. चाहे भावनात्मक तौर पर कराए या फिर मानसिक तौर पर.

ये बांडिंग भी बनाता है
रिसर्च और विज्ञान कहता है कि जब हम गॉसिपिंग करते हैं तो हमारी बांडिंग आपस में बेहतर होती है, विश्वास जमता है. शरीर में इसके बाद फील गुड हार्मोन रिलीज होने लगते हैं. ये सेरोटोनिन की तरह होते हैं. हमारे ब्रेन की संरचना है ही ऐसी हम तर्क-विर्तक पर किसी चीज को कसौटी पर कसेंगे तो उसके बारे में एक राय बनाएंगे और फिर उस पर गॉसिप करेंगे. ये प्रक्रिया बांडिंग भी बनाती है. लोगों को समझने में भी मददगार साबित होती है.

ब हम गॉसिपिंग करते हैं तो हमारी बांडिंग आपस में बेहतर होती है, विश्वास जमता है. शरीर में इसके बाद फील गुड हार्मोन रिलीज होने लगते हैं. (ShutterStock)

तनाव दूर करता है
अक्सर जब आप बहुत तनाव में हों, फोन उठाइए और अपने विश्वास या भरोसेमंद दोस्त से उसकी गॉसपिंग शुरू कर दीजिए, थोड़ी ही देर में आप खुद को रिलैक्स पाएंगे. तनाव दूर हो चुका होगा. जाहिर सी बात है कि इसके बाद आपका पूरा मूड लाइट हो जाता है. खुद को बेहतर महसूस करने लगते हैं. यानि इस काम ने पॉजिटीव यानि सकारात्मक काम किया.

लेकिन ज्यादा गॉसिपिंग भी ठीक नहीं 
सीमित मात्रा में तो गॉसिपिंग तो ठीक है लेकिन जरूरत से ज्यादा होने पर ये नुकसान भी करती है. गॉसिपिंग करते समय भी मापदंडों को बनाए रखिए. गॉसिपिंग और चरित्रहनन और किसी के बारे में बुरे विचार और उसका नुकसान करने के विचार दरअसल गॉसिपिंग नहीं कहे जाएंगे बल्कि अलग ही होते हैं और उनका रिजल्ट कई बार बहुत खराब भी होता है. लिहाजा गॉसिपिंग करिए लेकिन हल्की फुल्की. लेकिन असल बात ये भी है कि जब हम गॉसिपिंग करते हैं तो ये भूल ही जाते हैं कि उसमें हमें कहा तक जाना है और कहां तक नहीं.

ऑक्सीटोसिन बनने लगता है
इटली की पाविया यूनिवर्सिटी में 22 महिलाओं के एक ग्रुप पर अध्ययन किया गया. इस अध्ययन की अगुवा थीं डॉ. नतासिया बोंडिनो. उन्होंने पाया कि जब गॉसिपिंग होती है तो आक्सीटोसिन बनना शुरू होता है और ये रिलीज होकर खून और ब्रेन में पहुंचने लगता है. सामाजिक तौर व्यवहार करने वाले हर शख्स में ये होता है. मनुष्य के साथ स्तनपायी प्राणियों में भी इस तरह का हार्मोन बनता है. कई बार गॉसिपिंग सामाजिक तौर पर असर डालती है. ग्रुप बनाती है.

हालांकि मानव विकास क्रम पर नजर रखने वाले वैज्ञानिकों का कहना है कि मोटे तौर पर गॉसिपिंग समाज और मनुष्य के लिए अच्छी ही रही है.

मानव प्रजाति के बचे रहने के पीछे भी है गॉसिपिंग
इसके अपने सामाजिक मूल्य भी हैं. लेखक युवाल हरारी ने अपनी किताब सेपियंस – ए ब्रीफ हिस्ट्री ऑफ ह्यूमनकाइंड में लिखा है कि गॉसिपिंग हमारी प्रजातियों के बचे रहने का एक बड़ा कारण भी रही है.इसने हमें सिखाया कि किससे हमें बचकर रहना है, कौन हमें चीट कर रहा है, कौन किसके साथ संबंध बना रहा है. किसके ऊपर विश्वास किया जा सकता है.

मोटे तौर पर गॉसिप ने शुरुआती मानव को ना केवल जिंदा रहना और बचना सिखाया बल्कि अपने कबीले के विस्तार का तौरतरीका भी तय किया. तब लंबे समय तक चलने वाली गॉसिपिंग ने शुरुआती मानव को ये बताया कि उसे किन लोगों के साथ रहना है और किनसे दूर. इसने ही हमारे सामाजिक ढांचे और उत्तरोतर सहयोग को जन्म दिया, इसी ने हमें जानवरों से अलग बनाया.

Tags: Research, Women

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