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चीन ही नहीं, दुनियाभर की इन लैब में चल रहा है जानलेवा वायरस पर प्रयोग

चीन ही नहीं, दुनियाभर की इन लैब में चल रहा है जानलेवा वायरस पर प्रयोग

दुनिया के कई देशों में ऐसे लैब हैं जहां जानलेवा और लाइलाज वायरस रहते हैं

दुनिया के कई देशों में ऐसे लैब हैं जहां जानलेवा और लाइलाज वायरस रहते हैं

कोरोना (coronavirus) से दुनियाभर में बढ़ती मौतों के बीच चीन की एक लैब (lab in China) का जिक्र आ रहा है. बयानबाजी हो रही है कि ये वायरस चीनी लैब से निकला है. लेकिन चीन अकेला नहीं, दुनिया के कई देशों में ऐसे लैब हैं जहां लाइलाज वायरस रहते हैं.

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    बायोसेफ्टी लेवल (BSL) वो सावधानी या तैयारी है जिसमें खतरनाक रोगाणुओं (वायरस, बैक्टीरिया) को लैब के भीतर रखा जाता है. इसमें पैथोजन्स के खतरे के आधार पर तय किया गया है कि किस तरह की लैब में क्या रखा जा सकता है. Centers for Disease Control and Prevention (CDC) ने इन लैबों को 1 से 4 तक की श्रेणी में रखा है. कनाडा में इन चारों श्रेणियों को कंटेनमेंट लेवल कहा जाता है. जानिए, क्या है ये 4 लैब और यहां किस स्तर पर काम होता है.

    ये है पहले स्तर का लैब
    सबसे पहले आता है BSL–1. ये लैब की 4 श्रेणियों में सबसे शुरुआती लैब है, जहां ऐसे पैथोजन होते हैं, जिनसे बहुत कम खतरा होता है. यहां पर रखी जाने वाली सावधानियों में प्रयोग के बाद सतह को संक्रमण मुक्त करना, हाथ धोना और Personal protective equipment पहनना शामिल है, जैसे मास्क, ग्लास और ग्लव्स. यहां पर कुछ खाना-पीने की भी मनाही होती है. यहां ई कोलई जैसे सैंपल ऑर्गेनिज्म होते हैं.

    यहां से बढ़ता है खतरा
    BSL–2 को दूसरे स्तर की लैब मानते हैं. यहां पर ऐसे पैथोजन होते हैं जिनके संक्रमण से वे बीमारियां हो सकती हैं, जिनका इलाज खोजा जा चुका है. हालांकि ये भी अपने-आप में खतरनाक होते हैं, जैसे HIV के पैथोजन या फिर staph infections जो कि खासे संक्रमाक होते हैं. यहां पर काम करने वाले भी लैब 1 की तरह ही सावधानी रखते हैं लेकिन यहां पर सावधानियों का स्तर थोड़ा बढ़ जाता है. अगर रिसर्चर की त्वचा पर छोटा सा कट या खरोंच भी काम के दौरान आ जाए तो ये खतरनाक हो सकता है. यही वजह है कि इस लैब में बाहरी लोगों के आने की मनाही होती है.

    पैथोजन्स के खतरे के आधार पर तय किया गया है कि किस तरह की लैब में क्या रखा जा सकता है


    तीसरी श्रेणी BSL-3 कहलाती है
    यहां दूसरे देशों से आए या फिर नए पैथोजन पर काम होता है. कोरोना वायरस भी इसी लैब की श्रेणी में आता है, जो सांस के जरिए फैल सकता है और जानलेवा भी हो सकता है. इस लैब में यलो फीवर, वेस्ट नाइल वायरस और टीबी के बैक्टीरिया भी पलते हैं. यहां पर काम इतना खतरनाक होता है कि ये लैब ज्यादातर देशों में सरकारी एजेंसी की तरह रजिस्टर्ड होते हैं. हमारे यहां भारतीय वायरोलॉजी संस्थान पुणे इसी श्रेणी में आता है.

    यहां पलते हैं सबसे खतरनाक वायरस
    लैब की आखिरी और दुर्लभ श्रेणी है BSL-4. यहां पर दुनिया के सबसे खतरनाक पैथोजन होते हैं और उनपर लगातार प्रयोग भी चलता रहता है. आमतौर पर यहां वही वायरस या बैक्टीरिया होते हैं, जो लाइलाज हों और जानलेवा भी. यही वजह है कि ये लैब आबादी से काफी दूर होते हैं ताकि कोई दुर्घटना हो भी जाए तो आबादी पर उसका असर न हो. इस लैब की इमारत में पानी से लेकर हवा की सप्लाई भी अलग होती है और संक्रमण मुक्त करने का सिस्टम भी अलग होता है.

    BSL-4 लैब में दुनिया के सबसे खतरनाक पैथोजन होते हैं


    कहां-कहां है लैब 4
    अमेरिका के Government Accountability Office (GAO) के अनुसार अकेले अमेरिका में ही 15 लेवल 4 लैब हैं, जहां जानलेवा बीमारी फैलाने वाले पैथोजन पर प्रयोग चलता रहता है. हालांकि अब भी दुनिया में कुछेक लैब्स के नाम ही लिए जाते हैं. इनमें कनाडा का National Microbiology Lab (NML) मुख्य है. ये कनाडा का अकेला लेवल 4 लैब है, जहां COVID-19 की जांच को कन्फर्म किया जा सकता है. हालांकि अब इस ग्राउंड जीरो के 3 वैज्ञानिक भी कोरोना पॉजिटिव आ चुके हैं.

    टैक्सास का Texas Biomedical Research Institute भी इसी श्रेणी का लैब है. साल 1941 में बने इस लैब में लगातार पैथोजन्स पर काम चल रहा है. इसके लिए यहां 60 वैज्ञानिक, 18 रिसर्चर और लगभग 400 स्टाफ है. ये अमेरिका की इकलौती निजी लैब है, जहां लेवल-4 पैथोजन पर काम होता है.

    ये लैब काफी दूर होते हैं ताकि कोई दुर्घटना हो जाए तो आबादी पर असर न हो


    फिलहाल कंस्पिरेसी थ्योरी के तहत सुर्खियों में आया Wuhan Institute of Virology भी लेवल-4 लैब है. माना जा रहा है कि Chinese Academy of Sciences (CAS) के तहत आने वाले इसी लैब में SARS coronavirus पर लंबे वक्त से रिसर्च चल रही थी और यहीं से दुर्घटनावश ये वायरस लीक हो गया. हालांकि अभी तक इसके कोई प्रमाण नहीं मिले हैं.

    रूस में State Research Center of Virology and Biotechnology VECTOR में भी लाइलाज बीमारियां फैलाने वाले वायरस और बैक्टीरिया पर लगातार काम होता आया है. 1974 में बने इस लैब में स्मॉलपॉक्स और हेपेटाइटिस पर काफी काम हुआ था. हालांकि यहां दुर्घटनाएं भी होती रही हैं, जैसे साल 2004 में एक रिसर्चर ने गलती से खुद को इबोला वायरस का इंजेक्शन लगा लिया और 2 हफ्ते के भीतर उसकी मौत हो गई. साल 2019 के सितंबर में वेक्टर में गैस धमाका हुआ था, जिसमें कई लोगों में थर्ड डिग्री बर्न हुआ था, हालांकि रूस ने दुनिया को धमाके के तुरंत बाद आश्वस्त किया कि धमाके से किसी तरह का कोई पैथोजन नहीं फैला है.

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    Tags: Corona, Corona epidemic, Corona positive, Corona Suspect, Coronavirus Epidemic, Coronavirus in India

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