आंध्र प्रदेश: क्या प्राइवेट नौकरियों में आरक्षण देने का फैसला सही है?

प्राइवेट सेक्टर में लोकल युवाओं को रिजर्वेशन देने वाला आंध्र प्रदेश ने नया कानून बनाया है. विधानसभा ने एक एक्ट पारित कर स्थानीय युवाओं के लिए आरक्षण उपलब्ध करवाने का रास्ता तो बना दिया है लेकिन इसे लागू करवा पाना आसान नहीं है.

Vivek Anand | News18Hindi
Updated: July 23, 2019, 2:03 PM IST
आंध्र प्रदेश: क्या प्राइवेट नौकरियों में आरक्षण देने का फैसला सही है?
आंध्र प्रदेश ने प्राइवेट सेक्टर में स्थानीय नागरिकों को आरक्षण देने का कानून पास किया है
Vivek Anand | News18Hindi
Updated: July 23, 2019, 2:03 PM IST
आंध्र प्रदेश ऐसा पहला राज्य बन गया है, जिसने अपने 75 फीसदी प्राइवेट जॉब्स लोकल युवाओं के लिए रिजर्व कर दिए हैं. इस दिशा में आंध्र प्रदेश की विधानसभा ने आंध्र प्रदेश एमप्लॉयमेंट ऑफ लोकल कैंडिडेट्स इन इंडस्ट्रीज-फैक्ट्रीज़ एक्ट 2019 पास किया है. इस एक्ट के मुताबिक आंध्र प्रदेश के इंडिस्ट्रियल यूनिट्स, फैक्ट्रीज और पब्लिक प्राइवेट पार्टनरशिप वाले प्रोजेक्ट्स को अपने 75 फीसदी रोजगार स्थानीय नागरिकों को देने होंगे.

ये अपने तरह का नया कानून है. लेकिन इस एक्ट के पारित होने के बाद कई तरह के सवाल उठ रहे हैं. सवाल है कि क्या कोई राज्य अपने नागरिकों के हितों की रक्षा के लिए इस तरह के आरक्षण देने वाला कानून बना सकती है? क्या ऐसा कानून बनाना संवैधानिक तौर पर सही है? क्या इससे आंध्र प्रदेश के नागरिकों को सही मायने में फायदा मिल पाएगा? अब तक जातीय भेदभाव आधारित आरक्षण देने की संवैधानिक व्यवस्था से अलग रिजर्वेशन देने के इस नए कानून को किस तरह से देखा जाए?

क्या संवैधानिक व्यवस्था के मुताबिक है रिजर्वेशन की ये पॉलिसी?

इन सवालों को बारीकी से समझने की जरूरत है. सबसे पहली बात कि संवैधानिक व्यवस्था के मुताबिक रिजर्वेशन देने वाला इस तरह का कानून ठीक नहीं है. दिल्ली विश्वविद्यालय के समाजशास्त्र के एसोसिएट प्रोफेसर सुबोध कुमार कहते हैं कि ‘ये ना तो संवैधानिक तौर पर सही है ना ही व्यावहारिक तौर पर. संविधान में जाति आधारित आरक्षण की व्यवस्था है. इसमें क्षेत्र आधारित आरक्षण का कोई प्रावधान नहीं है. इसलिए संविधान की कसौटी पर ये खरा नहीं उतरेगा.

दूसरी बात है कि ग्लोबलाइजेशन के इस दौर में इस तरह का कानून किसी मायने में सही नहीं है. आज पूरी दुनिया के लोग एकदूसरे से लिंक्ड हैं. ऐसे में ये कानून अलग-थलग करने वाला है. इससे आंध्र प्रदेश को फायदा नहीं मिलने वाला है. उलटे इंडस्ट्रियलिस्ट अब वहां इंडस्ट्री लगाने से हिचकेंगे. जो कंपनियां वहां है वो भी भागना चाहेंगी.’

reservation in private sector in andhra pradesh state passed act to provide 75 percent private jobs to local youth but is it feasible
सीएम जगनमोहन रेड्डी ने अपनी पदयात्रा में प्राइवेट जॉब्स में आरक्षण देने का वादा किया था


फैक्ट्रीज़ और इंडस्ट्रीज़ को कम कीमत में स्किल्ड लेबर चाहिए. कोटा लागू करने पर ये मुमकिन नहीं होगा. इसलिए इसे प्राइवेट सेक्टर के फैक्ट्रीज़ और इंडस्ट्रीज़ में लागू करवा पाना आसान नहीं है. हालांकि आंध्र प्रदेश की सरकार ने इसका भी एक रास्ता खोज निकाला है. नए कानून के मुताबिक कंपनियां या फैक्ट्रियां स्किल्ड लेबर के नाम पर स्थानीयों को आरक्षण देने से बच नहीं सकती हैं. अगर स्थानीय नागरिकों में स्किल्ड लेबर नहीं मिल पाते हैं तो राज्य सरकार की मदद से कंपनियों को स्थानीय नागरिकों को ट्रेनिंग देकर रोजगार मुहैया करवाना पड़ेगा. अब सवाल है कि क्या आंध्र की कंपनियां इतनी शर्ते मानने को आसानी से तैयार होंगी.
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अगर सभी राज्य ऐसे कानून बनाने लग जाएं तो क्या होगा?

दूसरा एक अहम मुद्दा है भारत के संघीय ढांचे का. फेडरल स्ट्रक्चर में भारत कई राज्यों का समूह है. ऐसे में कोई राज्य अगर सिर्फ अपने क्षेत्र के हित के लिए कोई व्यापक कानून बनाती है, जिसका पूरे देश में असर पड़ता हो, वो ठीक नहीं है. इस तरह से अगर सभी राज्य अपने-अपने यहां कानून बनाने लग गए तो भारत के संघीय ढांचे का क्या होगा? इस लिहाज से भी ये कानून सही नहीं है.

अब सवाल उठता है कि इस कानून को बनाने की जरूरत क्यों पड़ी? दरअसल ये एक राजनीतिक मसला है. आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री जगनमोहन रेड्डी का ये चुनावी वादा था. जगनमोहन रेड्डी ने अपनी पदयात्रा के दौरान लोगों से वादा किया था कि राज्य की कंपनियों की नौकरियों में स्थानीय नागरिकों को आरक्षण दिया जाएगा. सरकार ने 1.33 लाख ग्रामीण बेरोजगारों को रोजगार देने का वादा किया है. अगले तीन साल में वो कोटा लागू करने की बात कर रहे हैं. सरकार को लगता है कि वो इसके लिए इंडस्ट्रीज़ और फैक्ट्री मालिकों को मना लेगी. लेकिन ये आसान नहीं है.

 reservation in private sector in andhra pradesh state passed act to provide 75 percent private jobs to local youth but is it feasible
मध्य प्रदेश सरकार ने भी प्राइवेट जॉब्स में आरक्षण देने का वादा किया है


एक्ट बना लेकिन ये लागू हो पाएगा?

एक सवाल ये भी है कि अगर इस एक्ट को चुनौती दी गई तो ये कोर्ट में किस आधार पर टिकेगी?
दिल्ली यूनिवर्सिटी के समाजशास्त्र के प्रोफेसर सुबोध कुमार कहते हैं कि 'दरअसल दक्षिण और पश्चिम के राज्यों की कुछ वाजिब शिकायतें हैं. इन राज्यों ने देश के बाकी हिस्सों की तुलना में सरकार के सामाजिक और कल्याणकारी योजनाओं को बहुत ही अच्छे तरीके से लागू किया है. लेकिन इसके बावजूद उन्हें केंद्र सरकार से उतनी आर्थिक सहायता प्राप्त नहीं होती, जितनी बिहार और यूपी जैसे देश के पिछड़े राज्य उठा ले जाते हैं. कुछ वर्ष पहले इन राज्यों ने एक लॉबी बनाकर फायनेंसियल ऑटोनॉमी की बात भी की थी. इनकी शिकायत होती है कि अच्छे प्रदर्शन के बावजूद वो केंद्र से फायनेंसियल असिस्टेंस हासिल नहीं कर पाते. इसलिए अब वो अपने राज्य के लोगों के हितों के लिए ऐसे कदम उठा रहे हैं. लेकिन इसे भी वाजिब कदम नहीं ठहराया जा सकता.'

मध्य प्रदेश सरकार ने भी पिछले दिनों कुछ इसी तरह की घोषणा की थी. मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री कमलनाथ ने कहा है कि वो प्राइवेट जॉब्स में स्थानीयों को 70 फीसदी आरक्षण देने वाला कानून लेकर आएंगे. मध्य प्रदेश के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस पार्टी ने प्राइवेट जॉब्स में कोटा दिलवाने का वादा किया था. इस मुद्दे को कांग्रेस ने अपने घोषणापत्र में भी शामिल किया था. राजनीतिक दल चुनाव जीतने के लिए वायदे तो कर जाता हैं. लेकिन उन्हें अमलीजामा पहनाना आसान नहीं हैं. आंध्र प्रदेश ने एक्ट पास करके कानून तो बना दिया है. लेकिन देखना होगा कि ये लागू हो भी पाता है या नहीं.

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First published: July 23, 2019, 2:03 PM IST
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