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साल 2074... जब गंगा पर बना बांध भरभराकर टूटेगा और जाएंगी हज़ारों जानें

इंसानी वजहों से कभी भी आ सकने को तैयार एक आपदा की कहानी (सांकेतिक तस्वीर)

इंसानी वजहों से कभी भी आ सकने को तैयार एक आपदा की कहानी (सांकेतिक तस्वीर)

पुस्तक समीक्षा : वेंटिलेटर पर ज़िंदा एक महान नदी की कहानी... किताब के कवर पेज पर लिखी ये पंक्ति आपको 'बूझो तो जानें' खेलने से रोक देती है. सामान्य ज्ञान की मामूली-सी जानकारी रखने वाले बूझ जाएंगे कि ये जिक्र गंगा का है.

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    माटी...मानुष...चून शीर्षक वाली इस किताब की शुरुआत होती है साल 2074 के आखिरी महीने से. और फिर फ्लैश बैक और फास्ट फॉरवर्ड के इर्द-गिर्द आपदा की एक कहानी आकार लेती है.

    हड्डियां जमा देने वाला जाड़ा अपने साथ भीषण बारिश लेकर आता है. और एकाएक फरक्का बैराज ढह जाता है. गंगा नदी पर बना ये वही बैराज है जो बांग्लादेश से महज कुछ किलोमीटर की दूरी पर है. 'भविष्य की कहानी' कहने वाली किताब में इसे फरक्का त्रासदी का नाम दिया गया है, जिसमें हजारों बांग्लादेशियों की जान चली जाती है.

    यहां से शुरू होती है नायिका की कहानी. साक्षी नाम की महिला त्रासदी की जांच के लिए भारत आती है. साक्षी का देश आने का मकसद त्रासदी की वजहों की जांच के अलावा थोड़ा निजी भी है. भारतीय मूल की साक्षी दरअसल अपनी गुमुशुदा जड़ों की तलाश में लौटी हैं.

    इसके बाद सारी कहानी साक्षी और दूसरे पात्रों की बातचीत के इर्द-गिर्द घूमती और आकार लेती जाती है.



    इंसानों की खुद की आमंत्रित की हुई आपदा पर आधारित इस कहानी में उन तमाम बातों का जिक्र है जो असल में होता है.

    मिसाल के तौर पर बाढ़ राहत के नाम पर ठेठ सरकारी बहसें जिसका कोई ओर है, न छोर. पढ़ने वाला देख पाता है कि कैसे हजारों जानों को देशों और कायदों के बीच झुलाया जाता है. एक सरकारी मीटिंग दिलचस्प मोड़ ले लेती है, जब साक्षी एक सरकारी अफसर से सहज सवाल करती हैं-

    "आपको क्या लगता है- बांग्लादेश पहले बना या गंगा पहले आयी- साक्षी पहली बार बोलीं.
    इस अजीब से सवाल पर अधिकारी भी अचकचा गया.
    साक्षी ने दोबारा कहा- आपने जवाब नहीं दिया, पहले बांग्लादेश बना या पहले गंगा धरती पर आयी.
    जी गंगा. मतलब गंगा पहले आयी.
    तो आगे से याद रखिएगा. गंगा का पानी बांग्लादेश चला नहीं जाता. गंगा बांग्लादेश में बहती है, जैसे भारत में बहती है."

    सैकड़ों-हजारों सालों से इंसानों या यूं कहें कि तमाम तरह की संस्कृतियों को सींच रही आपदाग्रस्त नदी गंगा के आसपास घूमती किताब में कई मोहक पंक्तियां हैं, जो आज और कल को जोड़े रखती हैं. मसलन- फरक्का भारत का नया समुद्र है... या फिर- हिलसा अब कुलीन वर्ग के त्योहारों की सजावट है...!

    नदी और विस्थापन के बारे में जानने-पढ़ने वाले किताब के कई हिस्सों से खुद को जुड़ा महसूस कर पाएंगे. खासकर जब पर्यावरणीय विस्थापितों का जिक्र चलता है. आमतौर पर सधी बात करने वाली साक्षी एकाएक कह उठती हैं- "जाने कितने गिरमिटिया बनकर गए और कभी वापस नहीं लौट सके. गंगा की धारा पर सपने सजाते लोग समुद्र के हवाले हो गए."

    दरअसल ये साक्षी का अपना दर्द है जो हर सुबह नींद से उन्हें झकझोरकर जगा देता है. वो जानती हैं कि उनके पुरखे कहां से थे लेकिन वो ये नहीं जानती हैं कि उस जगह का अस्तित्व है भी या नहीं.



    आपदा के शिकार घरों की कशमकश भी दिखलाने की कोशिश है.

    जल आपदा में अमूमन कितने ही लोग मारे जाते हैं. हमेशा के लिए जा चुके लोगों के घरवाले तो फिर भी थक-हारकर जिंदगी से जुड़ ही जाते हैं लेकिन उनका क्या, जिनका कोई अपना पानी में लापता हो चुका हो! ऐसे परिवारों की व्यथा भी किताब में झलक जाती है. जब एक मां अपने बेटे की तस्वीर की तरफ इशारा करते हुए कहती है- "एक महीने से ज्यादा हो गया लेकिन हम तय नहीं कर पाते कि अभि (पानी में लापता बेटा) की फोटो पर माला चढ़ाएं या नहीं!"

    बेहद गंभीर मुद्दे की ओर इशारा करती पुस्तक में कुछ हल्के-फुल्के पल भी हैं जैसे- गरम चाय दिमाग को ठंडा कर देती है.

    पानी और खासकर गंगा के इर्द-गिर्द घूमती माटी...मानुष...चून में कई चैप्टर्स हैं, जो फ्लैशबैक और फास्ट फॉरवर्ड में बंटे हुए हैं. इसमें गंगा महज एक नदी नहीं, बल्कि एक इंसान है, जिसकी ज्यादती पर नाराज दूसरा इंसान शिकायती लहजे में मानो खुद से ही बुदबुदाता है- गंगा को हमारे घर ही नजर आए! किताब में हालांकि मानवीय संवेदनाओं के एक्सट्रीम का न होना अखरता है. खासकर तब जबकि ये पूरी तरह से आपदाओं पर आधारित किताब है.

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