भारत के लिए अंतरराष्ट्रीय मंचों पर तिब्बत का मुद्दा उठाकर चीन को घेरने का सही समय

भारत के लिए अंतरराष्ट्रीय मंचों पर तिब्बत का मुद्दा उठाकर चीन को घेरने का सही समय
ऐसे समय में जब दुनिया में चीन के खिलाफ एक जनमत बन रहा है, उसमें तिब्बत का मुद्दा उठाकर चीन को और घेरा जा सकता है

50 के दशक में चीन ने गलत तरीके से दुनिया को झांसे में डालकर एक आजाद और संप्रभु देश तिब्बत पर कब्जा कर लिया था. दलाई लामा समेत लाखों शरणार्थियों ने भारत में आकर शरण ली. अब भारत के लिए सही मौका है कि तिब्बत के मुद्दे पर अंतरराष्ट्रीय मंचों पर उठाकर चीन को दबाव में लाने की कोशिश करे. उसे इसमें समर्थन भी मिलेगा

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भारत-चीन सीमा पर तनाव है. भारत में चीन से आने वाले सामानों को रोका जा रहा है. सरकार ने 59 चाइनीज एप्स पर बैन लगा दिया है. अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चीन की आक्रामकता ने तमाम देशों को नाराज ही किया है. कुल मिलाकर वैश्विक स्तर चीन के खिलाफ नाराजगी का माहौल है. ऐसे में भारत में तिब्बत के मुद्दे को आगे लाकर चीन पर ना केवल बड़ी चोट करनी चाहिए बल्कि उसे इसके जरिए दबाव में लाना चाहिए.

तिब्बत एक ऐसा मसला है, जो जब भी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उठाया जाता है, तब चीन इसे अंदरूनी मसला कहकर बंद कराने की कोशिश करता है. हकीकत में तिब्बत चीन का अंदरूनी मसला है ही. सच्चाई ये ही तिब्बत एक संप्रभु देश था.
ऐतिहासिक और प्राचीन दस्तावेज इसकी तस्दीक करते हैं कि तिब्बत हमेशा से चीन से अलग भी रहा है और आजाद भी. चीन ने नाजायज तरीके से दुनिया के सामने अलग तस्वीर रखते हुए उस पर कब्जा कर लिया. अब वहां बड़े पैमाने पर धार्मिक स्वतंत्रता और मानवाधिकार का हनन कर रहा है.

चीन कभी नहीं चाहता कि तिब्बत का मसला उठाया जाए



50 के दशक में संयुक्त राष्ट्र संघ में ब्रिटेन और कई अन्य देशों ने जोर-शोर से तिब्बत पर चीन के गलत कब्जे का मसला उठाया था. लेकिन चीन ने सुरक्षा परिषद का स्थायी सदस्य होने के नाते इस मुद्दे को कभी उठने नहीं दिया. उसने हमेशा कोशिश की कि किसी भी तरह तिब्बत का मसला संयुक्त राष्ट्र की सुरक्षा परिषद के सामने ही नहीं आए.



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भारत को मिल सकता है समर्थन 
अगर इस समय तिब्बत की फिर से आजादी और मानवाधिकार हनन का मसला अंतरराष्ट्रीय स्तर और दोपक्षीय स्तर पर भारत उठाए तो उसे ना केवल अंतरराष्ट्रीय समर्थन मिल सकता है बल्कि चीन पर एक दबाव भी डाला जा सकता है. तिब्बत का मसला वो मुद्दा भी है, जो चीन का असली साजिशी चेहरा सामने लाता है.

जब तिब्बत खुशहाल और स्वतंत्र था. तिब्बत का इतिहास बताता है कि वो आजाद और संप्रभु देश था, जिसका इतिहास ईसा से पहले का है


भारत से काम करती है तिब्बत की निर्वासित सरकार 
भारत में तिब्बत की निर्वासित सरकार कई दशकों से काम कर रही है. इसको चलाने के लिए सबसे बड़ा फंड खुद अमेरिकी सरकार देती है. दो साल पहले जब अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इस मदद को रोकने की कोशिश की तो अमेरिकी कांग्रेस में इसका प्रबल विरोध हुआ. नतीजतन अमेरिकी मदद अबाध तरीके से जारी रही. इसके अलावा भारत और अन्य निजी स्रोतों से भी तिब्बत की निर्वासित सरकार की मदद की जाती है. इस समय इस सरकार के मुखिया लोबगांग सांगे हैं.

सांगे ने दो दिन पहले एक प्रेस कांफ्रेंस करके ये बात कही भी कि ये उचित समय है जबकि तिब्बत में मानवाधिकार हनन का मुद्दा जोरशोर से संयुक्त राष्ट्र में उठाया जाना चाहिए. ये बात अपनी जगह एकदम सही लगती है.

तिब्बत की निर्वासित सरकार के प्रधानमंत्री लोबसांग सांगेय (फाइल फोटो, AP)


तब चीन ने धोखे से हड़पा था तिब्बत
हकीकत में ये वो समय भी है जब दुनिया तिब्बत पर नाजायक कब्जे की बात ज्यादा ध्यान से सुन सकती है. सारे दस्तावेजों पर गौर कर सकती है. अगर 50 के दशक को देखा जाए तो जाहिर है कि चीन ने धोखे से एक इतने बड़े देश पर आसानी से कब्जा कर लिया, जो अगर आज होता तो वो ना केवल क्षेत्रफल के लिहाज से दुनिया का 10वां बड़ा देश होता बल्कि भारत और चीन के बीच बफर स्टेट का भी काम करता.

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अगर तिब्बत होता तो चीन नहीं कर पाता ये सब
अगर तिब्बत आज एक आजाद देश के तौर पर मौजूद रहता तो भारत और चीन के बीच सीमा विवाद की स्थिति ही पैदा नहीं होती.चीन ने ये मनमाने दावे ही नहीं कर पाता कि ये जमीन उसकी होती. चीन अरुणाचल प्रदेश, सिक्किम से लेकर लद्दाख तक के सीमावर्ती इलाकों पर कुछ कुछ समय बाद नए दावे करने लगता है और उस जमीन को हड़पने की कोशिश करता है.

चीन को कठघरे में खड़ा किया जा सकेगा
अगर भारत इस समय तिब्बत के मसले को उठाए तो अमरिका से तो उसे इस पर पूरा समर्थन मिलेगा ही बल्कि दुनिया के तमाम देश इस मुद्दे पर उसका साथ देंगे, ये चीन पर अपने आप में एक बड़े दबाव का काम करेंगे. चीन के आगे बढ़ते पैरों को इससे रोका ही नहीं जा सकेगा बल्कि उसको कठघरे में खड़ा किया जा सकेगा. तिब्बत में मानवाधिकार हनन के मामले सामने आने के साथ उसकी और किरकिरी होगी.

चीन की निर्वासित सरकार अपने नक्शे में तिब्बत को कुछ यूं दिखाती है, अगर आज तिब्बत आजाद मुल्क होता तो दुनिया को 10वां बड़ा देश होता. समझा जा सकता है कि चीन ने कितना बड़ा भू-भाग पूरी दुनिया को धोखे में रहकर हड़प लिया


तिब्बत हमेशा से आजाद और अलग देश था
यूं भी चीन को ये बात लगातार चुभती रही है कि हमने क्यों दलाई लामा और उनके समर्थकों को अपने यहां शरण दे रखी है. साथ ही भारत से ही तिब्बत की निर्वासित सरकार काम करने का दावा करती है. तिब्बत और दलाई लामा के पास आज भी वो दस्तावेज और ग्रंथ हैं, जो साबित करते हैं कि तिब्बत का इतिहास ईसा पूर्व से रहा है. चीन और तिब्बत दो अलग राष्ट्र थे.

चीन के दो चेहरे हैं 
मौजूदा समय ये कहता है कि चीन के इरादे दुनिया के लिए ठीक नहीं हैं. वो पूरी दुनिया में फैलना चाहता है. तमाम देशों को वो अपना जो चेहरा दिखाता है, वो मददगार और अपने मोटे निवेश से उनका उद्धार करने वाले देश का दिखता है. अपने मोटे कर्ज के जाल में फंसाने के बाद वो उन देशों की नीतियां अपने फायदे के लिहाज से बनवाने लगता है.

इंदिरा गांधी ने क्यों नहीं रखे कभी चीन से संबंध?

हमारे पास अधिकार है कि तिब्बत के मसले को उठाएं
1970 में जब पूर्वी पाकिस्तान से बड़े पैमाने पर शरणार्थी भारत आए थे तो इंदिरा गांधी ने इसे एक बड़ा मुद्दा बनाते हुए कहा था कि भारत पर भी इसका असर पड़ रहा है, हम चुप नहीं रह सकते. इसी बिना पर भारतीय फौजों ने पाकिस्तान की सेनाओं को परास्त कर एक नए देश बांग्लादेश का निर्माण किया. बेशक पाकिस्तान और चीन की ताकत में बहुत अंतर है लेकिन तिब्बती शरणार्थियों के जरिए भारत उनकी आवाज को बेशक दुनिया के सामने रख सकता है. उनके पक्ष से दुनिया को रू-ब-रू कर सकता है.

तिब्बत का आजाद होना निश्चित तौर पर बहुत कठिन लगता है. लेकिन ये तो हो ही सकता है कि उसके आजादी को एक मुद्दा दुनिया के सामने बनाया जाए. चीन को घेरने की दिशा में ये एक बड़ा मुद्दा बन सकता है.
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