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क्या है राइट टू रिपेयर कैंपेन, जो यूरोप से लेकर अमेरिका तक छाया हुआ है

News18Hindi
Updated: October 1, 2019, 5:06 PM IST
क्या है राइट टू रिपेयर कैंपेन, जो यूरोप से लेकर अमेरिका तक छाया हुआ है
मैन्युफैक्चरिंग कंपनियों पर सख्ती बरतने की शुरुआत होने जा रही है (फोटो- प्रतीकात्मक)

अब प्रोडक्ट बेचने पर उसके साथ ही स्पेयर पार्ट्स भी देने होंगे ताकि मशीन लगभग 10 सालों तक बिना किसी परेशानी के चले.

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  • Last Updated: October 1, 2019, 5:06 PM IST
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यूरोपियन यूनियन ने हाल ही में राइट टू रिपेयर नियम लागू किया है. इसके तहत साल 2021 से कंपनियों को ऐसे उत्पाद बनाने होंगे जो ज्यादा टिकाऊ हों. प्रोडक्ट बेचने पर उसके साथ ही स्पेयर पार्ट्स भी देने होंगे ताकि मशीन कम से कम 10 सालों तक बिना किसी परेशानी के काम कर सके. बिजली के उत्पाद, वॉशिंग मशीन और फ्रिज इसी नियम के तहत आएंगे. इस नियम को लागू करने की वजह है राइट टू रिपेयर कैंपेन. इसकी शुरुआत उन तंग हो चुके ग्राहकों ने की, जो महंगे उत्पादों के बार-बार बिगड़ने से परेशान थे. ऐसे में ग्राहक नया उत्पाद खरीदने पर मजबूर थे.

ग्राहकों के साथ पर्यावरण को भी नुकसान
आप योजना बनाकर और काफी पैसे लगाकर कोई सामान खरीदते हैं लेकिन वारंटी खत्म होते ही सामान जवाब देने लगता है और जल्द ही फेंकने की नौबत आ जाती है. आप इसे बनवा नहीं सकते और न ही बेच सकते हैं. ये इलेक्ट्रॉनिक जंक का हिस्सा बन जाएगा. यानी आपके नुकसान के साथ ये पर्यावरण को भी नुकसान पहुंचा रहा है. इसी को देखते हुए यूरोपीय देशों और अमेरिका में राइट टू रिपेयर मुहिम चल पड़ी है. नीतियों में बदलाव के जरिए मैन्युफैक्चरिंग कंपनियों पर सख्ती बरतने की शुरुआत होने जा रही है.

क्यों पड़ी मुहिम की जरूरत



पिछले कुछ सालों में निर्माता कंपनियों के प्रोडक्ट्स की क्वालिटी लगातार गिरी है. एक शोध के अनुसार 2004 से 2012 के दौरान होम अप्लायंसेस की क्वालिटी में तेजी से गिरावट आई. 2004 में इलेक्ट्रॉनिक मशीनें पांच सालों तक ठीक से चला करतीं और इसके बाद भी लगभग 3.5 फीसदी मशीनें खराब हो रही थीं. साल 2012 में ये प्रतिशत बढ़कर 8.3 हो गया. इसके बाद आ रही मशीनें पांच साल भी ठीक से नहीं चल पा रही हैं.

इसकी शुरुआत तंग हो चुके ग्राहकों ने की (फोटो- प्रतीकात्मक)


यूरोप में ही कई ऐसे लैंप हैं जिनका बल्ब खराब होने के बाद दोबारा नहीं बदला जा सकता, बल्कि पूरा का पूरा लैंप फेंकना होता है. ऐसे इलेक्ट्रॉनिक सामानों की वजह से निकलने वाली जहरीली गैस वातावरण को प्रदूषित कर रही है. जल्दी खराब होने के बाद ये ई-जंक या इलेक्ट्रॉनिक कबाड़ में बदल जाती है, जिसे रिसाइकल करना भी काफी मुश्किल है.

ग्राहकों के भरोसे का इस्तेमाल कर रही कंपनियां
हाल ही में एक प्रतिष्ठित अखबार The Guardian ने एक खबर के जरिए बताया कि कैसे एक ग्राहक के जूते खुद जूते रिपेयर करने वाली कंपनी ने नष्ट कर दिए. चर्च ब्रांड के इन जूते की शुरुआती रेंज ही लगभग 35 हजार रुपए है. जूतों में टूटफूट होने पर ग्राहक ने उसे मरम्मत के लिए निर्माता कंपनी के पास भेजा. कुछ दिनों बाद वहां से फोन आया कि आपके जूते नष्ट किए जा रहे हैं. भौंचक्के ग्राहक ने वजह पूछी तो जवाब मिला कि उस खास ब्रांड के जूते कुल 2 बार ही रिपेयर किए जाते हैं. इसके बाद उन्हें फेंक दिया जाता है. यहां तक कि जूतों के कागजों पर भी इसका जिक्र है लेकिन इतने छोटे अक्षरों में कि शायद ही कोई उन्हें पढ़ता हो.

इन्हीं बातों को देखते हुए EU ने राइट टू रिपेयर नियम लागू किया. अब कंपनियों पर ये दबाव है कि वे ज्यादा से ज्यादा टिकाऊ उत्पाद बनाएं जो ग्राहकों के हित में हो. ऐसा न होने की स्थिति में ग्राहक कंपनी पर बड़ा दावा ठोंक सकते हैं.

इलेक्ट्रॉनिक कंपनियों की मनमानी के खिलाफ खुले मोर्चे का कंपनियों ने भारी विरोध किया (फोटो- प्रतीकात्मक)


करनी पड़ी काफी जद्दोजहद
ग्राहकों और पर्यावरण के हित में शुरू हुई मुहिम को कानून तक पहुंचाने के लिए काफी जोर लगाना पड़ा. पर्यावरण से जुड़ी सस्थाएं और पीड़ित ग्राहकों ने मांग की कि मैन्युफैक्चरिंग कंपनियां ऐसी चीजें बनाएं जो टिकाऊ हों. वे ये भी चाहते ते कि वारंटी खत्म होने के बाद कंपनी सर्विसिंग के अलावा लोकल मैकेनिकों को भी किसी खास सर्वस की ट्रेनिंग मिले. इससे ग्राहकों के पास विकल्प होंगे और कम लागत में काम हो सकेगा. वरना फिलहाल तक ये होता है कि प्रोडक्ट खराब होने पर ग्राहकों को कंपनी के पास जाकर बड़ी कीमत देते हुए रिपेयर करवाना होता है. कन्ज्यूमर रिपोर्ट्स और आईफिक्सिट ने इसपर खूब काम किया. नियम का ड्राफ्ट भी इन कंपनियों ने ही तैयार किया.

कंपनियों ने किया विरोध
इलेक्ट्रॉनिक कंपनियों की मनमानी के खिलाफ खुले मोर्चे का कंपनियों ने भारी विरोध किया. इसके पीछे उनका बड़ा तर्क ये था कि एक ही बार में ज्यादा लंबा चलने वाले प्रोडक्ट बनाने पर नई खोजों को बढ़ावा नहीं मिल सकेगा. रिपेयरिंग से जुड़े कानूनों का काफी सख्त होना भी एक बड़ी वजह था कि कंपनियों अपनी मनमानी करती रहीं. यहां तक कि शुरुआत में यूरोपियन यूनियन ने भी कंपनियों के लिए ही सहानुभूति दिखाई. उनका कहना था कि निर्माता कंपनियां अपनी तरफ से सबसे बेहतर ही कर रही हैं.

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First published: October 1, 2019, 5:06 PM IST
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