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बढ़ता CO2 पर्यावरण ही नहीं, इंसान के सोचने की क्षमता को भी पहुंचाएगा नुकसान

बढ़ता CO2 पर्यावरण ही नहीं, इंसान के सोचने की क्षमता को भी पहुंचाएगा नुकसान

बढता कार्बन उत्सर्जन इंसान के शरीर पर सीधा असर करने लगेगा.

बढता कार्बन उत्सर्जन इंसान के शरीर पर सीधा असर करने लगेगा.

ताजा शोध से पता चला है कि कार्बन डाइ ऑक्साइड (CO2) का बढ़ता स्तर जलवायु (Climate Change) ही नहीं हमारे सोचने की क्षमता को भी बहुत नकुसान पहुंचाएगा.

नई दिल्ली:  दुनिया में बढ़ते प्रदूषण (Pollution) के खतरे को नजरअंदाज करने के नतीजे हम देखने लगे हैं. जलवायु परिवर्तन (Climate Change) का विकराल रूप हमें दुनिया के कई इलाकों में दिखाई दे रहा है. ध्रुवों पर ग्लेशियर का पिघलना हो, याकि ऑस्ट्रेलिया और ब्राजील के जंगलों में लगी भीषण आग, हमारे बढ़ते कार्बन उत्सर्जन (Carbon Emission) के खतरे अब हमें बार बार चेताने लगे हैं. इसी बीच एक शोध से पता चला है कि कार्बन डाइ ऑक्साइड (CO2) का बढ़ता स्तर जलवायु ही नहीं हमारे सोचने की क्षमता को भी बहुत नकुसान पहुंचा सकता है.

खतरनाक स्तर पर जा सकता है CO2 का स्तर
नए शोध से पता चला है कि कार्बन डाइ ऑक्साइट का स्तर जिस तरह से हमारे वायुमंडल में बढ़ रहा है, उससे लगता है कि आने वाले समय में यह उम्मीद से ज्यादा नुकसानदायक हो सकता है. यह स्तर घर के अंदर और बाहर दोनों ही मामलों में तेजी से बढ़ रहा है. साइंस डेली के लेख के अनुसार इसका प्रभाव हमारे निर्णय लेने की क्षमता पर भी बुरा पड़ेगा.

कितना बढ़ जाएगा यह स्तर
इस अध्ययन से पता चला है कि सदी के अंत तक हमारे घर के अंदर का कार्बन डाइऑक्साइड का स्तर 1400 पीपीएम ( Parts per Million) तक चला जाएगा. यह आज के घर के बाहर के स्तर से तीन गुना ज्यादा है और ऐसा इंसानों ने अब तक अनुभव ही नहीं किया है.

Pollution
बढ़ते प्रदाूषण से कई बार अब भी सांसलेने में तकलीफ होने लगती है.


घर के अंदर ज्यादा नुकसानदायक होगा यह
सीयू बोल्डर के एसोसिएट प्रोफेसर और अध्ययन के प्रमुख लेखक क्रिस कार्नोस्कस का मानना है कि यह हैरान करने  वाली बात है कि कैसे यह कार्बन डाइऑक्साइड स्तर घर के अंदर इतना ज्यादा हो सका है. यह शोध पत्र जियो हेल्थ में प्रकाशित हुआ है. क्रिस का कहना ह कि यह सभी को प्रभावित करता है.  वैज्ञानिकों, व्यापारी से लेकर कमरे में बंद बच्चों तक को.

क्या है ऐसा होने की वजह
वहीं इस अध्ययन में सहलेखिका शैली मिलर का कहना है कि एक इमारत में वेंटीलेशन CO2 स्तर को बदलने में अहम भूमिका निभाते हैं, लेकिन कई बार हालात ऐसे हो जाते हैं कि ताजी हवा इतनी ज्यादा नहीं होती कि वह CO2 को घोल कर उसे हलका कर दे. कई बार वेंटीलेशन सही न होने पर CO2 की मात्रा भी बढ़ने लगती है. “

क्या होता है ऐसे में हमारे शरीर पर असर
जब हम ज्यादा CO2 के माहौल सांस लेते हैं तो हमारे खून में भी CO2 का स्तर भी बढ़ जाता है जिससे शरीर में ऑक्सीजन की मात्रा कम हो जाती है और हमारे दिमाग में भी कम ऑकसीजन पहुंचतीहै. शोध के मुताबिक इससे नींद आने लगना, बेचैनी, और चीजों को समझने की क्षमता में कमी हो सकती है.

Micro pollution
कार्बन उत्सर्जन रोकने के लिए वैज्ञानिक पेरिस समझौते को लागू करने की वकालत कर रहे हैं. (फोटो-प्रतीकात्मक)


हम आज ही कर सकते हैं इस तरह माहौल को महसूस
जब हम सही भीड़भाड़ वाले इलाके जैसे बंद लैक्चर हॉल आदि में बैठते हैं तो हमें इसका एहसास होने लगता है. आमतौर पर घर के अंतर CO2 का स्तर बाहर के मुकाबले काफी ज्यादा होता है. ऐसा शहरी इलाकों में ज्यादा होता है.

क्या स्तर होगा CO2 का साल 2100 में
इंटर गवर्नमेंटल पैन ऑन क्लाइमेट चेंज (IPCC)  के मुताबिक साल 2100 में घर के बाहर का CO2 स्तर 930 ppm तक पहुंच जाएगा. वहीं शहरी इलाकों में वह 100 PPM अधिक होगा. क्रिस की टीम ने ऐसा माहौल में CO2 का प्रभाव जानने की कोशिश की. इस अध्ययन में उन्होंने सबसे ज्यादा ध्यान इंसान की सोचने और समझने की क्षमता पर दिया.

सोचने की क्षमता पर होगा बुरा असर
शोध में पाया गया कि उस समय तक घर के अंदर का CO2  स्तर 1400 ppm तक पहुंच जाएगा जो बहुत ही ज्यादा हानिकारक होगा. यह हमारे सोचने और समझने की क्षमताओं को बुरी तरह से प्रभावित करेगा. इस अध्ययन में सारे नतीजे इसी तरफ इशारा करें ऐसा भी नहीं है, लेकिन शोधर्ताओं का कहना है कि अभी इसमें और शोध किए जाने की जरूरत तो है, लेकिन इस अध्ययन को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता.

जलवायु परिवर्तन के इंसान पर अप्रत्यक्ष प्रभाव पड़ेंगे.


क्या होगी परेशानी
अध्ययन के मुताबिक 1400 ppm का CO2 स्तर हमारे निर्णय लेने की क्षमता को 25 प्रतिशत तक कम कर सकता है. जटिल रणनीति बनाने की क्षमता को 50 प्रतिशत तक कम कर सकता है. शोधकर्ताओं का कहना है कि यह CO2 मनुष्यों पर सीधा प्रभाव है. जब कि ग्लोबल वार्मिंग जैसे प्रभाव अप्रत्यक्ष हैं.

क्या है समाधान
इससे निपटने के लिए सबसे अच्छा यही होगा कि जीवाश्म ईंधन उत्सर्जन (Fossil Fuel Emissions) को कम किया जाए. इसके लिए वैश्विक स्तर पर काम करना होगा. जैसा कि जलवायु परिवर्तन पर क्लाइमेट चेंज ने रणनीति अनुशंसित की है.

गंभीर विषय है यह
फिलहाल तो लोगों का ध्यान केवल वायु प्रदुषण और जलवायु प्रदूषण पर ही है, लेकिन शोधकर्ताओं के अनुसार इस अध्ययन का उद्देश्य भविष्य में CO2 स्तर का अनुमान लगाना नहीं है. हमें इस मामले में व्यापक और गहन शोध की भी जरूरत है क्योंकि यह बहुत ही गंभीर विषय है.

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Tags: Climate Change, Pollution, Research, Science

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