अपने सूर्य के बिना ब्रह्माण्ड में तैर रहे हैं तारों से भी ज्यादा ‘दुष्ट’ ग्रह

अपने सूर्य के बिना ब्रह्माण्ड में तैर रहे हैं तारों से भी ज्यादा ‘दुष्ट’ ग्रह
निष्कासित या दुष्ट ग्रहों के बारे में पता करना खगोलविदों के लिए आसान नहीं है, इसीलिए नासा इसके लिए एक अभियान भेजने वाला है. (तस्वीर- @NASAExoplanets )

नासा (NASA) एक अभियान चलाने वाला है जिसमें वह ‘निष्कासित’ या ‘दुष्ट’ (Rouge) ग्रहों को खोजेगा जिनका अपना सूर्य (Sun) नहीं होता. ताजा शोध कहता है कि ऐसे ग्रह तारों से भी ज्यादा हो सकते हैं.

  • News18Hindi
  • Last Updated: August 23, 2020, 1:09 PM IST
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बहुत से लोगों को लगता है कि ब्रह्माण्ड (Universe) में ग्रहों (Planets)का उनके तारे (Sun) के बिना अस्तित्व नहीं हैं. वास्तव में ऐसा है नहीं. कोई हैरानी की बात नहीं होनी चाहिए कि ब्रह्माण्ड में ऐसे ‘निष्कासित’ (Rogue) ग्रहों की संख्या तारों से भी कहीं ज्यादा हो जिनका अपना कोई सूर्य नहीं हैं. अब नासा (NASA)  हमारी ही गैलेक्सी (Galaxy) मिल्की वे (Milky Way) में इन ‘निष्कासित’ ग्रहों की खोज के लिए एक अभियान (Mission) चलाने वाला है.

और भी नाम हैं ऐसे ग्रहों के
नए अध्ययन के मुताबिक नासा का यह अभियान यह भी पता लगा सकता है कि ऐसे ‘निष्कासित’ ग्रहों की संख्या हमारी गैलेक्सी के तारों से ज्यादा होगी जो अपने सूर्य के बिना ही ब्रह्माण्ड में तैर रहे हैं. इन निष्कासित’ (Rogue) ग्रहों को दुष्ट ग्रह, लावारिस ग्रह, या अनाथ ग्रह भी कहा जाता है.

इस अभियान से मिलेगी मदद
 इस शोध के प्रमुख लेखक और ओहियो स्टेट यूनिवर्सिटी में एस्ट्रोनॉमी के स्नातक छात्र सैमसन जॉनसन  कहना है, “इससे हमें इन संसारों में झांकने का मौका मिल सकेगा जो किसी दूसरे तरीके से संभव नहीं हैं. सोचिए, अगर हमारा छोटा सा पथरीला ग्रह अंतरिक्ष में खुला तैर रहा होता- हमारा अभियान ऐसे ही पिंडों को खोजने में मदद करेगा.”



क्या होते हैं ये ग्रह
हाल ही में एस्ट्रोनॉमिकल जर्नल में प्रकाशित इस अध्ययन में इस बात की गणना की है कि नासा का आने वाला नैन्सी ग्रेस रोमन स्पेस टेलीस्कोप हमारे मिल्की वे में सैंकड़ो ‘निष्कासित’ (Rogue) ग्रहों का पता लगा सकता है. जॉनसन ने बताया कि इन ग्रहों की पहचान से वैज्ञानिकों हमारी गैलेक्सी में इनकी संख्या के बारे में चल सकेगा. ये ‘निष्कासित’ (Rogue) ग्रह  अलग थलग ग्रह होते हैं जो किसी तारे का चक्कर नहीं लगाते, लेकिन वे ग्रहों के जैसे ही होते हैं. इनकी उत्पत्ति के बारे में अभी कोई स्पष्ट जानकारी नहीं है. लेकिन एक संभावना यह भी है कि वे कभी किसी तारे से बंधे रहे होंगे.
बहुत बड़ी संख्या में हो सकते हैं ऐसे ग्रहइस अध्ययन के अन्य शोधकर्ता स्कॉट गौडी का कहना है, “ब्रह्माण्ड ऐसे ग्रहों से भरा पड़ा हो सकता है और शायद हमें कभी पता भी न चले. बिना विस्तार से माइक्रोलेंसिंग सर्वे किए बिना जैसे कि रोमन टेलीस्कोप करने जा रहा है, हम कभी इनके बारे में पता नहीं कर सकेंगे.”गोली की तरह निकला हमारे मिल्की वे के केंद्र से रहस्यमयी बादल- शोधकर्ता हैरानइन ग्रहों को कहां कहां खोजेगा यह अभियानजॉनसन के शोध के अनुसार यह अभियान इससे पहले किए गए प्रयासों से 10 गुना ज्यादा संवेदनशील हो सकता है. अभी तक केवल पृथ्वी पर लगे टेलीस्कोप से ही इनके अध्ययन की कोशिश होती थी.  लेकिन रोमन टेलीस्कोप पृथ्वी और मिल्की वे के केंद्र के बीच स्थित इन ग्रहों की पड़ताल करेगा जो कि 24 हजार प्रकाशवर्ष की दूरी है.क्या पहले खोजे जा सके थे ऐसे ग्रहइससे पहले भी कुछ इस तरह के ग्रहों की खोज हो चुकी है. लेकिन रोमन टेलीस्कोप अब तक का सबसे बढ़िया प्रयास होगा. 1990 के दशक से खगोलविदों ने हमारे सौरमंडल के कई ग्रह खोजे हैं, इनमें से ज्यादातक बाह्यग्रह हैं जो अपने सूर्य का चक्कर लगा रहे हैं. लेकिन कुछ ऐसा नहीं भी कर रहे होंगे. अभी तक इनके विस्तार से अध्ययन के लिए कोई अभियान नहीं भेजा गया है.


यह तकनीक करेगी मदद
यह अभियान अब से पांच साल बाद प्रक्षेपित किया जाएगा और इन ‘निष्कासित’ ग्रहों की खोज ग्रैविटेशनल माइक्रोलेंसिंग (gravitational microlensing) तकनीक से करेगा.  इस तकनीक में तारों और ग्रहों के गुरुत्व से प्रकाश के मुड़ने और वृद्धि होने का पता चला है. यह प्रकाश इन पिंडों के पीछे से आते हुए हमारे टेलीस्कोप की ओर आ रहा होता है.

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क्या है इस तकनीक के साथ समस्या
माइक्रोलेंसिंग का प्रभाव अलबर्ट आइंसटीन क सापेक्षता के सामान्य सिद्धांत से संबंधित प्रभाव है. इससे टेलीस्कोप से हजारों प्रकाश वर्ष दूर स्थित ग्रहों के बारे में पता चल सकता है. माइक्रोलेंसिंग तभी काम करती है जब उसके पास से किसी तारे का प्रकाश गुजर रहा हो, यह असर बहुत ही कम समय के लिए देखने को मिलता है जो कि कुछ लाखों सालों में एक बार हो सकता है. लेकिन ‘निष्कासित’ ग्रहों के साथ समस्या यह होती है कि ये अंतरिक्ष में बहुत अलग से स्थित होते हैं और इनके आसपास भी कोई तारा नहीं होता. इसलिए इनकी पहचान के लिए टेलीस्कोप को बहुत संवेदनशील होना पड़ेगा. इसीलिए शोधकर्ताओं को रोमन टेलीस्कोप से बहुत अपेक्षाएं हैं.
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