JNU में रोमिला थापर से सीवी मांगने पर इसलिए मचा है इतना बवाल

रोमिला थापर (Romila Thapar) का सीवी (CV) विवाद थमता नहीं दिख रहा है. जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (JNU) प्रशासन ने उनसे सीवी की मांग की थी. इसे इतिहासकारों और बुद्धिजीवियों के एक वर्ग ने उनका अपमान माना है. जानिए इसके पीछे असल वजह क्या है...

News18Hindi
Updated: September 3, 2019, 1:35 PM IST
JNU में रोमिला थापर से सीवी मांगने पर इसलिए मचा है इतना बवाल
रोमिला थापर ने जेएनयू प्रशासन को अपना सीवी देने से मना कर दिया है
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Updated: September 3, 2019, 1:35 PM IST
इरम आग़ा
नई दिल्ली :
मशहूर इतिहासकार रोमिला थापर (Romila Thapar) ने जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (JNU) प्रशासन को अपना सीवी (CV) देने से मना कर दिया है. उन्होंने कहा है कि वो जेएनयू से अपना सीवी साझा करने में रुचि नहीं रखती हैं. जेएनयू प्रशासन ने रोमिला थापर से उनका सीवी मांगा था. ताकि इमेरिटस प्रोफेसर के तौर पर उनके दर्जे को रिव्यू किया जा सके. कई इतिहासकारों और बुद्धिजीवियों ने इसे रोमिला थापर जैसी मशहूर शख्सियत का अपमान माना था.

दरअसल रोमिला थापर जिस विचारधारा से आती हैं, वो वर्तमान सत्ता की विचारधारा से मेल नहीं खाती है. रोमिला थापर के भारत की दक्षिणपंथी विचारधारा से मतभेद जगजाहिर हैं. ऐसे कई मौके आए हैं, जब रोमिला थापर दक्षिणपंथी विचारधारा को पुष्ट करने वाली ऐतिहासिक मान्यताओं के खिलाफ गई हैं.

भारत में आर्यों के दक्षिणपंथी सिद्धांत पर विरोध जता चुकी हैं रोमिला थापर

दक्षिणपंथी विचारधारा का मानना है कि भारत में हिंदुओं की वंशावली की शुरुआत आर्यों से होती है. वो इतिहास की अपने तरह से व्याख्या कर इस बात को पुष्ट करते हैं कि हिंदुस्तान में हिंदुओं का आगमन आर्यों के आने से होता है, जबकि रोमिला थापर हिंदुओं के आगमन की ऐसी ऐतिहासिक व्याख्या को चैलेंज करती रही हैं.

राइट विंग स्कॉलर हड़प्पा की सभ्यता और वैदिक काल को एक मानते हैं. ईसापूर्व 5वीं शताब्दी को इसका काल माना जाता है. इस विचारधारा के मुताबिक आर्य भारत के मूल निवासी हैं. इन्होंने ही हिंदू सभ्यता का विस्तार पश्चिम भारत तक किया. रोमिला थापर इतिहास की ऐसी व्याख्या से अलग विचार रखती हैं. वो हड़प्पा और वैदिक काल को एक नहीं मानतीं, न ही वो आर्यों को भारत का मूल निवासी मानती हैं.

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रोमिला थापर के दक्षिणपंथी विचारधारा से मतभेद जगजाहिर हैं

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प्राचीन भारत में गोमांस का जिक्र
रोमिला थापर ने 2004 में एनसीआरटी की पाठ्यपुस्तकों में बदलाव की आलोचना की थी. इतिहास की किताबों में बीफ को लेकर कुछ जानकारी दी गई थी. सीबीएसई ने पाठ्यपुस्तकों के लेखकों से हुए करार का हवाला देकर उस जानकारी को हटा दिया था. छठी क्लास की प्राचीन भारत का इतिहास पाठ्यपुस्तक 1966 से पढ़ाई जा रही थी. 1987 में रोमिला थापर ने इसमें फेरबदल किया था. थापर ने हिंदू परंपरा में बीफ खाने के कुछ उदाहरण दिए थे.

पाठ्यपुस्तक में इस जानकारी को हटाने का रोमिला थापर ने विरोध किया था. उन्होंने कहा था कि ये ऐतिहासिक तथ्य है, जिसे महत्वपूर्ण दस्तावेजों से लिया गया था. रोमिला थापर ने एक कॉलम लिखकर इसे इतिहास का सांप्रदायीकरण करार दिया था. उन्होंने शतपथ ब्राह्मण और वशिष्ठ धर्मसूत्र का हवाला देकर लिखा था कि प्राचीन काल में मेहमानों को बीफ सर्व करने का प्रचलन था. उन्होंने लिखा था कि बृहदरण्यका उपनिषद में इस बात का जिक्र है कि लंबी उम्र और तेजतर्रार संतान की प्राप्ति के लिए चावल के साथ बछड़े का मांस या गौमांस खाना चाहिए.

सुप्रीम कोर्ट में याचिका
रोमिला थापर ने महाराष्ट्र में माओवादियों से लिंक रखने के आरोप में लेफ्ट विंग के एक्टिविस्ट की गिरफ्तारी का विरोध किया था. रोमिला थापर ने इस बारे में सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल की थी. याचिका दाखिल करने वालों में रोमिला थापर के साथ प्रभात पटनायक, देवकी जैन, सतीश देशपांडे और माजा दारूवाला भी शामिल थे.

उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के तत्कालीन चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा की अगुआई वाली 5 जजों की बेंच के सामने याचिका की तुरंत सुनवाई की अपील की थी. याचिका में भीमा कोरेगांव मामले में गिरफ्तार किए गए लोगों को मानवाधिकार कार्यकर्ता बताते हुए मामले की स्वतंत्र जांच करवाने की अपील की गई थी. उन्होंने आरोप लगाया था कि सरकार विरोध की आवाज को तानाशाही से कुचल रही है.

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रोमिला थापर कई मौकों पर दक्षिणपंथी विचारधारा के खिलाफ गईं हैं


न्यूयॉर्क टाइम्स में लेख
मई 2019 में रोमिला थापर ने केंद्र सरकार की इतिहास की समझ पर सवाल उठाते हुए न्यूयॉर्क टाइम्स में लेख लिखा था. ये मान्यता और ऐतिहासिक तथ्य को रेखांकित करता हुआ लेख था. इसमें रोमिला थापर ने लिखा था कि पता नहीं क्यों हिंदू राष्ट्रवादियों के लिए इतिहास इतना महत्वपूर्ण हो गया है? राष्ट्रवादी एक स्वीकार्य इतिहास का निर्माण करते हैं ताकि वे दावा करें कि वे राष्ट्र का गठन करते हैं. जबकि चरम राष्ट्रवादियों के अपने ऐतिहासिक तथ्य होते हैं, ताकि वर्तमान के अपने कदम को वो वैधता प्रदान कर सकें.

भारतीय इतिहास को फिर से लिखना और उनके संस्करण को सिखाना, हिंदू राष्ट्रवादियों की विचारधारा को सही ठहराने के लिए उठाया जा रहा अहम कदम है.

रोमिला थापर ने आरोप लगाए थे कि ये लोग मान्यताओं के आधार पर इतिहास की व्याख्या कर रहे हैं और यही सब मोदी की पार्टी की मातृसंगठन आरएसएस और उसके स्कूलों में लिखाया-पढ़ाया जाता है.

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First published: September 3, 2019, 11:51 AM IST
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