Doctors Day 2020 : रुक्माबाई, जिन्होंने डॉक्टरी की पढ़ाई के लिए पति का घर छोड़ा, पूरे देश में चर्चित हुआ था उनका मुकदमा

Doctors Day 2020 : रुक्माबाई, जिन्होंने डॉक्टरी की पढ़ाई के लिए पति का घर छोड़ा, पूरे देश में चर्चित हुआ था उनका मुकदमा
देश की पहली प्रैक्टिसिंग डॉक्टर रुक्मा बाई

रुक्मा बाई वो शख्स थीं, जिनका मुकदमा 1884 के आसपास पूरे देश में चर्चित हुआ. उनके पति ने उन्हें घर बुलाने के लिए अदालत की शरण ली लेकिन उन्होंने उसकी बजाए डॉक्टरी की पढ़ाई करने का फैसला किया. देश की पहली प्रैक्टिसिंग डॉक्टर भी बनीं

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01 जुलाई को नेशनल डॉक्टर्स डे है. हम इस मौके पर ऐसे डॉक्टर्स को याद कर रहे हैं, जिन्होंने प्रतिकूल परिस्थितियों से जूझने के बाद भी समाज और लोगों को स्वस्थ बनाए रखने में मदद की. आज से 100 साल पहले के समय की कल्पना करिए, तब महिलाओं का घर से निकलना भी मुश्किल था. पढाई-लिखाई तो दूर की बात है. ऐसे में अगर आनंदी बाई जोशी देश की पहली डॉक्टर बनीं तो रुक्मा बाई उनके बाद ऐसी महिला डॉक्टर थीं, जिन्होंने मेडिकल प्रैक्टिसिंग करके धाक जमाई  उन्होंने पति के घर जाने की बजाए विदेश जाकर डॉक्टरी की पढ़ाई करना ज्यादा उचित समझा.

रुक्मा बाई की मां का नाम जयंती बाई था. जब वो 15 साल की थीं तब रुक्मा बाई का जन्म हुआ. इसके दो साल बाद ही वो विधवा हो गईं. तब उन्होंने सखाराम अर्जुन से दूसरी शादी की. इस शादी पर बहुत बवाल हुआ. इसके बाद भी उन्होंने बगैर टस-मस हुए शादी की.

सखाराम अर्जुन मुंबई के ग्रांट मेडिकल कॉलेज में वनस्पति विज्ञान के प्रोफेसर और समाज सुधारक थे. उन्होंने रुक्मा बाई को बेटी से कहीं प्यार दिया. हमेशा ये कोशिश की कि वो पढ़ाई के जरिए अपने पैरों पर खड़ी हो.



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पति ने घर बुलाने के लिए मुकदमा किया
वैसे रुक्मा बाई की शादी 11 साल की उम्र में आठ साल बड़े भीकाजी से हो गई थी. शादी के बाद भी वह अपने माता-पिता के साथ रहती थीं. 1884 में भीकाजी ने बॉम्बे हाईकोर्ट में पति का पत्नी के ऊपर वैवाहिक अधिकार का हवाला देते हुए याचिका दायर की, जिसके बाद हाईकोर्ट ने उन्हें पति के साथ रहने या जेल जाने का आदेश दिया.

रुक्मा बाई का मुकदमा देशभर में चर्चित भी हुआ था. पति ने उनको घर बुलाने के लिए मुकदमा किया. अदालत ने भी उन्हें पति के घर जाने का आदेश दिया लेकिन उनके तर्क ऐसे थे कि अदालत को भी मानना पड़ा


देशभर में चर्चित हुआ था रुक्मा बाई का मुकदमा
ये मुकदमा देशभर में चर्चित हो गया. हर किसी की दिलचस्पी इस मुकदमे में बढ़ गई. लोगों की दिलचस्पी ये थी कि रुक्मा बाई अब क्या करेंगी. अदालत का आदेश मानते हुए क्या पति के घर जाना पसंद करेंगी. अदालत में रुक्मा बाई ने तर्क दिया कि उन्हें उस विवाह में रहने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता जो तब हुआ जब वह इसके लिए सहमति देने में असमर्थ थीं. इस तर्क ने बाल विवाह और महिलाओं के अधिकारों पर लोगों का ध्यान खींचा.

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अदालत ने रुक्मा के हक में दिया फैसला
रुक्मा पति के घर नहीं गईं. अदालत ने उन्हें अपने मर्जी से फैसला करने का हक दे दिया. 1889 में रुक्मा बाई लंदन स्कूल ऑफ मेडिसिन फॉर विमेन में अध्ययन करने इंग्लैंड गईं. शिक्षा पूरी होने के बाद 1894 में वह वापस भारत लौटीं. सूरत में बतौर चीफ मेडिकल अधिकारी पदभार संभाला.

कभी शादी नहीं की
उन्होंने डॉक्टर के पेशे में तकरीबन 35 साल बिताए. दोबारा शादी नहीं की. जीवन में आखिरी समय तक समाज सुधारक के तौर पर काम करती रहीं. 25 सितंबर 1955 में 91 साल की उम्र में उनका निधन हो गया.

आनंदी पहली डॉक्टर थीं और रुक्मा पहली पैक्टिसिंग डॉक्टर
रुक्मा बाई भारत की पहली प्रैक्टिसिंग महिला डॉक्टर थीं, लेकिन आनंदी गोपाल जोशी डॉक्टर के रूप में शिक्षा प्राप्त करने वाली पहली भारतीय महिला थीं. लेकिन कहना चाहिए कि ये दोनों ही महिलाएं समय से बहुत आगे थीं. उन्होंने बाद में तमाम महिलाओं को चिकित्सा क्षेत्र में आने के लिए प्रेरित किया.
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