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रूस में वैज्ञानिक कर रहे हैं 'ग्रहों पर इंसानों के अकेलेपन' पर शोध- जानिए क्यों

रूस में वैज्ञानिक कर रहे हैं 'ग्रहों पर इंसानों के अकेलेपन' पर शोध- जानिए क्यों

रूस में चल रहे इस साइरस -21 अभियान (SIRIUS-21 mission) में अंतरराष्ट्रीय वैज्ञानिकों की एक टीम भाग ले रही है. (तस्वीर: @ANI_multimedia)

रूस में चल रहे इस साइरस -21 अभियान (SIRIUS-21 mission) में अंतरराष्ट्रीय वैज्ञानिकों की एक टीम भाग ले रही है. (तस्वीर: @ANI_multimedia)

लंबे अंतरिक्ष अभियानों (Long Space Missions) पर चल रहे शोधों में एक खास शोध किया जा रहा है. रूस (Russia) के वैज्ञानिक इस बात का अध्ययन कर रहे हैं कि जब अंतरिक्ष यात्री बहुत लंबे समय तक अंतरिक्ष या फिर किसी ग्रह पर अकेले रहेंगे तो उस अकेलेपन का उन पर क्या असर होगा और वे उससे कैसे निपटेंगे. रूस में एक बड़े अभियान में प्रतिभागी चार चेंबरों में 240 दिन के लिए बंद हैं.

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    अब यह कोरी कल्पना नहीं रह सकेगी कि पृथ्वी (Earth) से बाहर चंद्रमा मंगल जैसे ग्रहों पर इंसान जाकर रहने लगेंगे. इस तरह के अभियानों पर अरबों डॉलर खर्च हो रहे हैं. इतना ही नहीं अब इससे आगे भी इंसानों को भेजने पर शोध होने लगे हैं. लंबे अभियानों के लिए बड़ी तादाद में शोधकार्य चल रहे हैं जो उनसे संबंधित चुनौतियों का हल खोज रहे हैं. इन्हीं से कुछ चुनौतियां लंबी दूरी की यात्रा के दौरान  स्वास्थ्य संबंधी चुनौतियां प्रमुख है जिन पर अध्ययन हो रहा है. इनमें लंबे समय तक यात्री अकेले रहेंगे और इससे अकेलेपन (Interplanetary Isolatiion) एक बड़ी समस्या  हो सकती है. अब रूस (Russia) में वैज्ञानिक इस पर एक बड़ा अध्ययन कर रहे हैं.

    240 दिन तक बंद
    रूस में नवंबर 2021 से शुरू हुए इस शोध में अंतरराष्ट्रीय शोधकर्ताओं की टीम चार स्वेच्छिक  प्रतिभागी 240 दिन के लिए आइसोलेशन चैंबर में बंद हैं. साइरस 21 (SIRIUS-21) नाम का यह प्रयोगात्मक अभियान रूस के इंस्टीट्यूट ऑफ बायोमेडिकल प्रोब्लम्स (IBMP) में चल रहा है. जिसमें कई देशों की अंतरिक्ष एजेंसियों का सहयोग है.

    बड़ा आइसोलेशन प्रोजेक्ट
    साइरस-21 परियोजना  साइंटिफिक इंटरनेशनल रिसर्च इन यूनीक टेरेस्ट्रियल स्टेशन प्रोजेक्ट कार्यक्रम है. यह बड़े पैमाने पर इंटरनेशनल आइसोलेशन प्रोजेक्ट है जो नासा के मानव शोध कार्यक्रम और आईपीएमपी मिल कर पांच साल के लिए कर रहे हैं. इसमें बहुत सारे संयुक्त वैज्ञानिक प्रतिमान प्रयोग किए जा रहे हैं.

    अलग अलग प्रयोग
    इन प्रयोगों में 17, 120, 24 और 360 दिनों के प्रयोगों की शृंखलाएं है, जहां वैज्ञानिक अंतरिक्ष यात्रियों पर लंबे समय तक अकेले रहने के प्रभावों का अध्ययन करेंगे जिसके लिए उन्होंने पांच प्रतिभागों को चार चेंबरों में अकेला छोड़ा हुआ है. वे पड़ताल करेंगे कि दूसरे ग्रहों पर लंबी यात्राओं के लिए इंसान कितना काबिल है.

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    इस अभियान में प्रतिभागीयों को बहुत लंबे समय तक अंतरिक्ष (Space) के वातावरण में रखा जा रहा है. (प्रतीकात्मक तस्वीर: Pixabay)

    वातावरण भी होगा खास
    यह अभियान दो महीने पहले शुरू हुआ था और कुल 5 प्रतिभागियों पर सिम्यूलेटेड वातावरण में परखा जाएगा यानि वे केवल चेंबर में बंद ही नहीं रहेंगे, बल्कि उन्हें उन चेंबरों में वही वातारण मिलेगा जो अंतरिक्ष यात्रा के दौरान यात्रियों को मिलता है. इसमें चंद्रमा पर उतरने और मून वाक करने का अनुभव भी शामिल होगा.

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    एक अवसर है यह समय
    यूरोपीय स्पेस एजेंसी के एंजेलीक वैन ओमबर्गन, जो इस शोध के संयोजक हैं, का कहना है कि इन दिनों हर कोई लंबे समय तक अकेलेपन को झेल रहा है. यह यूरोपीय शोधकर्ताओं के लिए मानव बर्ताव के साथ अकेलेपन का उनके स्वास्थ्य और कार्यनिष्पादन पर प्रभावों को समझने का एक बहुत बड़ा अवसर है.

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    इस दौरान उन्हें चंद्रमा पर मूनवॉक (Moonwalk) करने के सिम्यूलेटेड वातावरण के अनुभव से भी गुजारा जाएगा. (प्रतीकात्मक तस्वीर: Pixabay)

    कई तरह के वैज्ञानिक प्रयोग
    यूरोपीय स्पेस एजेंसी ने खुलासा किया है कि पांच क्रू सदस्य दर्जनों शोध अध्ययन  कर रहे हैं जिनमें न्यूरोसाइंस, मनोविज्ञान और इम्यूनोलॉजी के बहुत सारे प्रयोग शामिल हैं. क्रू के सदस्यों पर टीम डायनामिक्स, कार्यनिष्पादन और स्वास्थ्य आदि प्रभावों को समझने के लिए एथलीट (ATHLETE) प्रयोग चल रहा है जिसमें मिशन के दौरान और उसके बाद प्रतिभागियों पर हुए भौतिक और मनोसामाजिक बदलावों का अवलोकन किया जाएगा.

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    इसके अलावा दिमाग की संज्ञानात्मक और अन्य क्रियाओं में बदलाव भी ब्रेव (BRAIVE) प्रयोग द्वारा समझने के प्रयास किए जाएं. इसमें क्रू सदस्यों द्वारा अंतरिक्षयान के संचालन क्षमताओं को भी परखा जाएगा. प्रतिभागियों को स्पेसक्राफ्ट सिम्यूलेटर के द्वारा चंद्रमा के लिए विभिन्न उड़ानों का अनुभव दिया जाएगा.

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