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जलवायु के लिए किस तरह का खतरा है नॉर्ड स्ट्रीम पाइपलाइन में लीकेज से?

नॉर्ड स्ट्रीम पाइपलाइन लीक से बाल्टिक सागर (Baltic Sea) के जरिए जलवायु को खतरा हो रहा है. (तस्वीर: Wikimedia Commons)

नॉर्ड स्ट्रीम पाइपलाइन लीक से बाल्टिक सागर (Baltic Sea) के जरिए जलवायु को खतरा हो रहा है. (तस्वीर: Wikimedia Commons)

रूस (Russia) से बाल्टिक सागर के जरिए जर्मनी और डेनमार्क को प्राकृतिक गैस सप्लाई करने वाली नॉर्ड स्ट्रीम पाइपलाइ (Nord S ...अधिक पढ़ें

हाइलाइट्स

नॉर्ड स्ट्रीम पाइपलाइन से रूस यूरोप को गैस सप्लाई करता है.
रूस ने इन पाइपलाइन से गैस की आपूर्ति को पहले ही बंद कर दिया था.
इनमें पहले मौजूद बहुत सारी गैस जलवायु के लिए खतरा हो सकती है.

रूस और यूक्रेन युद्ध (Russia- Ukraine War) में रूस की लड़ाई वास्तव में अमेरिका और यूरोप के खिलाफ है. दुनिया का ध्यान इन बातों पर है कि आखिर यह युद्ध कितना लंबा चलेगा और इसमें किसकी जीत होगी. लेकिन इसके कारण पहले ही पर्यावरण (Environment) को काफी नुकसान हो रहा है. इस युद्ध की वजह से रूस यूरोप में चल रहे गतिरोध में एक और समस्या आ गई है. बाल्टिक सागर के अंदर रूस से यूरोप जा रही नॉर्ड स्ट्रीम पाइप लाइन (Nord Stream Pipe Line)  में लीकेज हो गया है जो दोनों पक्षों के बीत विवाद का मुद्दा तो बना ही है लेकिन एक बड़ी पर्यावरणीय समस्या भी बन गया है.

रूस यूक्रेन युद्ध
फिलहाल इस पाइप लाइन की लीकेज रूस यूरोप संघर्ष की एक बड़ी समस्या बना हुआ है यूरोप का कहना है कि यह लीकेज एक जानबूझ कर उठाया गया कदम है, जो रूस ने यूरोप पर छाए ऊर्जा संकट को गहरा करने के लिए उठाया है.रूस यूक्रेन युद्ध के शुरू होने के बाद से ही रूस ने यूरोप और पश्चिमी देशों में यूक्रेन की मदद के खिलाफ चेताया था. जबकि पश्चिमी देश ने सीधे युद्ध में दखल देने की जगह यूक्रेन को युद्ध में मदद  देना जारी रखने की बात की थी. इसके जवाब में रूस ने यूरोप की गैस की आपूर्ति कम कर बंद करना शुरू कर दिया था. इससे यूरोप में ऊर्जा संकट पैदा होने लगा है.

पाइपलाइन मे टूटन
इस नॉर्ड स्ट्रीम पाइपलाइन्स के बाल्टिल सागर वाले हिस्से में तीन संदिग्ध विस्फोटों का असर इनकी एक और दो पाइपलाइऩ में तीन अलग अलग जगह से टूटने की खबर आई है. ये पाइप लाइन रूस से यूरोप को प्राकृतिक गैस की आपूर्ति करने के लिए उपयोग में लाई जाती रही है. लेकिन ये पाइपलाइन पूरी तरह क्रियाशील भी नहीं थी, लेकिन दरार के समय इनमें प्राकृतिक गैस मौजूद थी. इस लीक का सबंध रूस यूक्रेन युद्ध, यूरोप की रूसी तेल पर निर्भरता से बताया जा रहा है.

जलवायु को कितना नुकसान
लेकिन उससे भी बड़ा सवाल यह है कि समुद्र के अंदर इस पाइपलाइन की लीकेज से जलवायु को कितना नुकसान हो सकता है जहां भारी मात्रा में मीथेन पानी में मिल रही है. क्या वाकई यह लीक जलवायु के लिए एक बड़ा खतरा है. इस लीक में रिसने वाली मीथेन, कार्बन डाइऑक्साइड के बाद दुनिया की दूसरे सबसे शक्तिशाली ग्रीन हाउस गैस है.वैज्ञानिक इस बात से तो आस्वस्त हैं कि इससे जलवायु को गहरा नुकासान होगा लेकिन कितना होगा इसका आंकलन करने की स्थिति में वे नहीं हैं.

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नॉर्ड स्ट्रीम पाइपलाइन रूस से बाल्टिक सागर (Baltic Sea) से होते हुए यूरोप में जर्मनी और डेनमार्क की ओर जाती हैं. (तस्वीर: Wikimedia Commons)

आंकलन करना मुश्किल काम
क्लीन एयर टास्क फोर्स नाम की गैर लाभकारी संस्था के वरिष्ठ वैज्ञानिक डेविड मैकेबे का कहना है कि यदि ये पाइपलाइन नाकाम होतीहैं तो उसका जलवायु पर घातक और अप्रत्याशित असर होगा. फिलहाल लीक के आकार तक का अनुमान नहीं लगाया जा सकता है. इसकी वजह गैस के तापमान की जानकारी ना हो, लीकेज  का गति जैसे कई अनिश्चित कारक हैं. इस गैस को सूक्ष्मजीवी कितनी मात्रा में अवशोषित करेंगे यह बताना भी बहुत ही कठिन है जो जलवायु के प्रभाव की मात्रा के बहुत ज्यादा प्रभावित करेगी.

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दिनों से हफ्तों तक की संभावना
फिर भी विशेषज्ञों का अनुमान है कि यह सुधार होने से पहले यह लीकेज काफी दिनों, यहां तक कि हफ्तों तक जारी रह सकता है. विशेषज्ञों की चिंता है कि अभी लीकेज का प्रभाव सागर की सतह के एक किलोमीटर के दायरे में पहले ही पहुंच चुका है, जहाजों के डूबने की संभावना बढ़ जाएगी और गैस के हवा में भी फैलने की संभावना बढ़ सकती है.

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नॉर्ड स्ट्रीम पाइपलाइन (Nord Stream Pipeline) से गैस की आपूर्ति रूस पहले ही बंद कर चुका है. (प्रतीकात्मक तस्वीर: shutterstock)

गैस की लीक की मात्रा का सवाल
जहां इस गैस के लीक से समुद्री जीवन को बड़ी हानि पहुंचेगी इसमें विशेषज्ञों को संदेह है किइससे मछलियो को सांस लेने में परेशानियों का सामना करना पड़ सकता है. रिपोर्ट बताती हैं कि शुरुआती दरार में हर घंटे करीब 500 मैट्रिक टन की गैस रिस रही थी. समय के साथ दबाव और बहाव की दर कम होने लगी. अधिकारियों का कहना है कि नॉर्ड स्ट्रीम 2 पाइप लाइन में 30 करोड़ क्यूबिक मीटर का सप्लाई करने का काम कभी शुरू ही नहीं हो सका था.

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वहीं अगर पूरा का पूरा प्राकृतिक गैस का स्टॉक ही पर्यावरण में चला गया तो वहां दो लाक टन की मीथेन का उत्सर्जन हो जाएगा. विशेषज्ञों का कहना है कि इतनी मात्रा का प्रभाव 100 साल में 60 लाख टन की कार्बन डाइऑक्साड उत्सर्जन के बराबर होगा. यह वाकई एक चिंता का विषय है कि इस लीकेज को लेकर पर्यावरण और जलवायु की प्राथमिकता की जगह युद्ध और ऊर्जा संकट वगैरह अन्य मुद्दे उठाए जा रहे हैं और इस मामले में सही तरह की जिम्मेदार लेने के बारे मे सोचा तक नहीं जा रहा है.

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