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जब सैंतालिस साल पहले ‘सैम बहादुर’ सीडीएस बनते-बनते रह गए थे!

Brajesh Kumar Singh, Group Consulting Editor | News18Hindi
Updated: August 16, 2019, 6:33 PM IST
जब सैंतालिस साल पहले ‘सैम बहादुर’ सीडीएस बनते-बनते रह गए थे!
जनरल मानेकशॉ सीडीएस बनते-बनते रह गए थे.

1947 में देश की आजादी के 72 साल बाद चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ की नियुक्ति होने जा रही है, जिसकी घोषणा पीएम मोदी ने लाल किले की प्राचीर से की है. लेकिन ये बहुत कम लोगों के ध्यान में होगा कि करीब सैंतालिस साल पहले सीडीएस की नियुक्ति होने जा रही थी और फील्ड मार्शल सैम मानेकशॉ को इस पद पर बिठाना तय हो गया था, लेकिन नौकरशाहों की साजिश के कारण ऐसा हो न सका.

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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने दूसरे कार्यकाल में पहली दफा और लगातार छठी बार लाल किले की प्राचीर से स्वतंत्रता दिवस के मौके पर देश को संबोधित करते हुए जो बड़ी घोषणाएं कल कीं, उनमें से एक है चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ का पद सृजित करने की घोषणा. पीएम मोदी के मुताबिक भारतीय सेना देश की शान है और सेना के तीन अंगों के बीच बेहतर तालमेल के लिए चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ के नए पद का सृजन किया जा रहा है.

लाल किले की प्राचीर से हुई इस घोषणा के बाद चर्चा का दौर शुरू हो गया है कि आखिर देश के पहले सीडीएस के तौर पर किसकी नियुक्ति होगी या फिर सीडीएस किसको रिपोर्ट करेगा. सीधे प्रधानमंत्री को या फिर सुरक्षा मामलों की कैबिनेट कमिटि को? ये भी प्रश्न खड़े हो रहे हैं कि चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ की शक्तियां क्या होंगी. क्या वो महज समन्वय का काम करेगा या फिर देश की सामरिक नीति के निर्माण में अग्रणी भूमिका निभाएगा या फिर युद्ध के समय सरकार के लिए रणनीतिक मामलों में सिंगल रेफरेंस पॉइंट होगा कि आखिर युद्ध का संचालन कैसे हो या फिर सेना के तीनों अंगों की कैसे तैनाती हो?

स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर सेना को लेकर पीएम मोदी ने बड़ा ऐलान किया, देश में होगा अब 'चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ'.


जाहिर है, इन तमाम सवालों का जवाब अभी सामने नहीं है और पीएम मोदी के कामकाज का जो तरीका है, उसमें सीडीएस के बारे में पूरी तस्वीर शायद ही किसी और के पास फिलहाल हो. अटकलें इस बात की हैं कि शायद थल सेना अध्यक्ष जनरल बिपिन रावत ही देश के पहले सीडीएस के तौर पर नियुक्त हों.

जनरल मानेकशॉ सीडीएस बनते-बनते रह गए थे

लेकिन ये बहुत कम लोगों को ध्यान में है कि आज से सैंतालिस साल पहले सीडीएस की नियुक्ति होते-होते रह गई थी. 1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध के तुरंत बाद तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने तय कर लिया था कि देश में चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ के तौर पर एक नए पद का निर्माण कर इस पर तत्कालीन थल सेनाध्यक्ष जनरल सैम मानेकशॉ को बिठा दिया जाए. लेकिन ऐसा हो न सका और जनरल मानेकशॉ को आखिरकार देश के पहले फील्ड मार्शल से ही संतोष करना पड़ा. इस तरह वो देश के पहले फाइव स्टार जनरल बने. दरअसल आम तौर पर सेना के तीनों अंगों के प्रमुख ही अपनी गाड़ियों पर चार सितारे यानी फोर स्टार लगाते हैं, जबकि फील्ड मार्शल को अपनी गाड़ियों पर पांच सितारे यानी फाइव स्टार लगाने की इजाजत होती है और इसीलिए फील्ड मार्शल को फाइव स्टार जनरल भी कहा जाता है.

मानेकशॉ के नेतृत्व में भारत ने 1971 में पाकिस्तान के खिलाफ युद्ध में जीत हासिल की थी

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सवाल उठता है कि स्वतंत्र भारत के पहले फील्ड मार्शल बने सैम मानकेशॉ आखिर देश के पहले सीडीएस क्यों नहीं बन पाए, वो भी तब जब इंदिरा गांधी जैसी ताकतवर प्रधानमंत्री उन्हें चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ बनाना चाह रही थीं, 1971 के युद्ध में भारत की पाकिस्तान पर शानदार जीत और बांग्लादेश के निर्माण के बाद.

फील्ड मार्शल सैम मानेकशॉ, जो फौजियों के बीच सैम बहादुर के तौर पर जाने जाते थे, उनके सीडीएस न बन पाने की कहानी फौज में शीर्ष स्तर पर होने वाली आपसी खींचतान और देश की नौकरशाही और बाबुओं की साजिश से किसी बड़ी योजना को किनारे लगाए जाने का बड़ा और सनसनीखेज उदाहरण है. खास बात ये कि ये साजिश उस सैन्य अधिकारी के साथ हुई, जिसने कई शताब्दियों के बाद पहली दफा देश को दुश्मन देश पर निर्णायक जीत दिलाई और चिर शत्रु पाकिस्तान को दो टुकड़ों में कर स्वतंत्र बांग्लादेश के निर्माण में अहम भूमिका निभाई. जिसने पाकिस्तान की इस धारणा को खत्म कर दिया कि महज मजहब किसी देश के एकीकरण का आधार हो सकता है.

किस तरह साजिश का शिकार हुई इंदिरा गांधी की योजना

दिसंबर 1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध और बांग्लादेश के उद्भव के तुरंत बाद तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी सैम मानेकशॉ को न सिर्फ देश का पहला फील्ड मार्शल बल्कि देश का पहला चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ भी बनाना चाह रही थीं. उनकी इस योजना के मुताबिक केंद्र सरकार में फाइल चलनी भी शुरू हुई. लेकिन वरिष्ठ आईएएस अधिकारियों को ये योजना पसंद नहीं आई, जो देश की नौकरशाही की अगुआई करते हैं. उनको ये डर था कि अगर चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ का पद सृजित हो गया और जनरल सैम मानेकाशॉ जैसा सैन्य अधिकारी इस पद पर बैठ गया, तो सुरक्षा मामलों में बाबुओं की चलनी एकदम बंद हो जाएगी और रक्षा मंत्रालय के मामलों में भी जो उनका एकाधिकार है, उसमें कटौती आ जाएगी और रक्षा मंत्रालय से जुड़े ज्यादातर काम सीडीएस के पास चले जाएंगे, क्योंकि वो रक्षा मंत्रालय के अंदर सबसे महत्वपूर्ण अधिकारी बन जाएगा. नौकरशाहों को ये टीस तो हमेशा रहती ही है कि सेना के तीनों अंगों के प्रमुख रक्षा सचिव को रिपोर्ट करने की जगह रक्षा मंत्री को रिपोर्ट करते हैं और ऐसे में सीडीएस अगर मैदान में आ गया, तो उनकी रही-सही पूछ और रक्षा मामले में दखलंदाजी काफी हद तक बंद हो जाएगी.

दिसंबर 1971 तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी सैम मानेकशॉ को देश का पहला फील्ड मार्शल बनाया था


यही वजह रही कि इंदिरा गांधी की योजना के सामने आने के बाद नौकरशाहों ने सेना के तीनों अंगों के प्रमुखों में ही फूट डालनी शुरू कर दी. थल सेना के प्रमुख तो खुद जनरल मानेकशॉ ही थे. ऐसे में तत्कालीन वायुसेना प्रमुख एयर चीफ मार्शल पीसी लाल और नौ सेना प्रमुख एडमिरल एसएम नंदा को नौकरशाहों ने चढ़ाना शुरू कर दिया. पहले तो ये कहकर कि पाकिस्तान के खिलाफ लड़ाई में तीनों ही सेनाओं का बड़ा योगदान रहा है, फिर जनरल मानकेशॉ को ही क्यों फील्ड मार्शल बनाया जाए और दूसरा ये कि अगर मानेकशॉ फील्ड मार्शल के साथ-साथ चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ भी बन गए, तो थल सेना के मुकाबले वायुसेना और नौ सेना का आकार वैसे ही छोटा है, उनकी पूछ भी एकदम कम हो जाएगी और थल सेना का दबदबा और बढ़ जाएगा.

एडमिरल नंदा को इस योजना पर कोई आपत्ति नहीं थी

बाबुओं की इस साजिश में तत्कालीन नौसेना प्रमुख एडमिरल नंदा शामिल नहीं हुए. उन्होंने इस घटना का जिक्र करते हुए अपनी जीवनी The Man Who Bombed Karachi में लिखा है कि जब वे युद्ध की समाप्ति के बाद वेस्टर्न नवल कमांड के दौरे पर थे, तो उनके पास प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के प्रिंसिपल सेक्रेटरी पीएन हक्सर का फोन आया. उन्होंने पूछा कि इंदिरा गांधी सैम मानेकशॉ को फील्ड मार्शल बनाना चाहती है और ऐसे में उनका क्या रुख है. एडमिरल नंदा ने आगे लिखा है कि मैने हक्सर को ये कहा कि मुझे तब तक कोई एतराज नहीं है, जबतक आप मेरे से एक स्टार लेकर मानेकशॉ को नहीं देना चाहते. एडमिरल नंदा का मानना था कि थलसेना बहुत बड़ी फौज थी और उसने 1971 की लड़ाई में निर्णायक भूमिका निभाई थी. ऐसे में भले ही सेना के तीनों अंगों के प्रमुख एक बराबर थे, लेकिन पीएम इंदिरा गांधी सैम मानेकशॉ को फील्ड मार्शल बनाना चाहती थीं, तो उन्हें भला क्या ऐतराज हो सकता था.

The Man Who Bombed Karachi- तत्कालीन नौसेना प्रमुख एडमिरल नंदा की किताब


इस तरह एडमिरल नंदा के मामले में बाबुओं की साजिश तो कामयाब नहीं हुई, लेकिन उन्हें तत्कालीन वायुसेना अध्यक्ष एयर मार्शल पीसी लाल के मामले में कामयाबी हासिल हो गई. इसका उल्लेख रिटायर्ड मेजर जनरल वीके सिंह ने अपनी किताब Leadership in the Indian Army : Biographies of Twelve Soldiers में किया है. जनरल सिंह ने भारतीय थल सेना के बारह प्रसिद्ध अधिकारियों की जो जीवनी लिखी है, उसमें जनरल मानेकशॉ वाले अध्याय में इस घटना का विस्तार से जिक्र किया है. जनरल सिंह के मुताबिक, चूंकि चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ का पद सृजित कर उस पर फील्ड मार्शल के तौर पर जनरल मानेकशॉ को बिठाने का फैसला इंदिरा गांधी ने अपने मन में कर लिया था, इसलिए कोई नौकरशाह उसका खुलकर विरोध करने तो सामने नहीं आया. लेकिन अंदर-अंदर सहमति बनाने के नाम पर इस तरह की चालें चली गई कि इंदिरा गांधी को भी मन मसोस कर रह जाना पड़ा और आखिरकार जनरल मानकेशॉ सिर्फ फील्ड मार्शल बनकर रह गए.

नौकरशाही ने कैसे रचा ‘खेल’

इस बारे में विस्तार से जिक्र करते हुए जनरल सिंह ने लिखा है कि तत्कालीन वित्त मंत्री वाईबी चह्वाण के विरोध के बावजूद जनरल मानेकशॉ का प्रमोशन करते हुए उन्हें फील्ड मार्शल बनाए जाने का निर्णय तो हो गया, लेकिन उन्हें चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ बनाये जाने का मामला ब्यूरोक्रेसी ने डिवाइड एंड रूल की सदियों से आजमाई हुई नीति के तहत ध्वस्त कर दिया. चूंकि सीडीएस का थल, वायु और नौ सेना तीनों पर नियंत्रण रहना था, इसलिए नियुक्ति के पहले सेना के तीनों अंगों में सहमति बनाने का ड्रामा नौकरशाही ने शुरू किया. और जैसी आशंका थी, तत्कालीन वायुसेना अध्यक्ष एयर मार्शल पीसी लाल उनके इस खेल में हिस्सेदार हो गये. उन्होंने जनरल मानेकशॉ को सीडीएस बनाये जाने की जोरदार मुखालफत की.

मेजर जनरल वीके सिंह की किताब- Leadership in the Indian Army


अपनी किताब My years with IAF में खुद लाल ने मानेकशॉ से अपनी नाराजगी प्रकट की है और लिखा है कि 1971 के युद्ध के दौरान जनरल मानेकशॉ जिस तरह से काम कर रहे थे, और उस दौरान या फिर युद्ध के बाद उन्हें जिस तरह से शोहरत मिली, उससे ये धारणा बन रही थी कि वो डिफैक्टो सीडीएस की तरह ही काम कर रहे थे, जबकि चीफ्स ऑफ स्टाफ कमिटि के चेयरमैन के तौर पर वह सेना के बाकी दो अंगों के प्रमुखों की बराबरी पर ही थे.

किताब My years with IAF के कुछ अंश


जाहिर है, एयर चीफ मार्शल लाल की जनरल मानेकशॉ से व्यक्तिगत खुन्नस नौकरशाही के काम आई. जब एडमिरल नंदा की तरह ही एयर चीफ मार्शल पीसी लाल के पास इंदिरा गांधी के प्रिंसिपल सेक्रेटरी पीएन हक्सर का फोन 24 मार्च 1972 को सीडीएस पद के सृजन और सैम मानेकशॉ की इस पद पर नियुक्ति को लेकर लाल की राय जानने के लिए आया, तो लाल ने औपचारिक तौर पर इस पर अपनी नाराजगी और असहमति जताई. एयर चीफ मार्शल लाल ने लिखा कि इस तरह की व्यवस्था में खुल कर किसी मामले पर विचार करना संभव नहीं रहेगा और खास तौर पर तब जब सीडीएस के पद पर कोई ऐसा अधिकारी बिठा दिया जाए, जो अपने विचारों में काफी दबंग हो और दूसरे के विचारों पर ध्यान न दें.

किताब Leadership in the Indian Army के कुछ अंश


एयर चीफ मार्शल लाल ने हालांकि ये विचार बिना वायुसेना के वरिष्ठ अधिकारियों के साथ बातचीत के बगैर दिया था, लेकिन इसे वायुसेना की आधिकारिक राय मानते हुए बाबुओं ने इंदिरा गांध की सीडीएस के तौर पर जनरल मानेकशॉ को नियुक्त करने की योजना को ठंडे बस्ते में डलवा दिया. ये भय खड़ा किया कि ऐसा होने पर वायु सेना और नौ सेना के अधिकारियों के मनोबल पर बुरा असर पड़ेगा और सामरिक निर्णय की प्रक्रिया में गड़बड़ी होगी.

26 जनवरी के दिन घोषणा करना चाहती थीं इंदिरा गांधी

नौकरशाही की इस साजिश का खुलासा फील्ड मार्शल सैम मानेकशॉ के मिलिट्री असिस्टेंट रहे रिटायर्ड सैन्य अधिकारी लेफ्टिनेंट जनरल देपिंदर सिंह ने अपनी किताब Field Marshal Sam Manekshaw : Soldiering with Dignity में किया है. जनरल देपिंदर सिंह, जो अपने करियर के आखिरी दिनों में श्रीलंका भेजी गई भारतीय शांति सेना के 1987 से 1990 के बीच अगुआ रहे, वो जनरल मानेकशॉ के भारतीय थल सेना प्रमुख और बाद में फील्ड मार्शल बनाए जाने के दौरान उनकी परछाईं की तरह काम करते रहे मिलिट्री असिस्टेंट की भूमिका में. जनरल सिंह ने भी अपनी किताब में लिखा है कि इंदिरा गांधी 25 जनवरी 1972 के दिन ही ये तय कर चुकी थीं कि अगले दिन गणतंत्र दिवस की सुबह जनरल मानेकशॉ को फील्ड मार्शल के साथ ही चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ भी बनाने की घोषणा कर दी जाएगी. लेकिन ऐसा हो नहीं सका. जनरल सिंह के मुताबिक, इंदिरा गांधी ने फिर चाहा कि 28 जनवरी 1972 की सुबह ऐसा हो जाए, जिस दोपहर भारतीय सेना के तीनों अंगों के प्रमुखों को 1971 के युद्ध की उनकी उपलब्धियों को लेकर पद्मविभूषण सम्मान दिया जा रहा था. लेकिन उस दिन भी ऐसा नहीं हो पाया.

किताब Field Marshal Sam Manekshaw : Soldiering with Dignity का एक पन्ना


जनरल देपिंदर सिंह ने भी इसके लिए नौकरशाही को ही जिम्मेदार ठहराया है. उनके मुताबिक, नौकरशाही की लटकाने की जो प्रवृति रही है और एक के सामने दूसरे को खड़ा कर फैसले को टालने की जो नीति रही है, उसी का परिणाम ये हुआ कि नौसेना की सहमति के बावजूद सिर्फ वायुसेना प्रमुख की आपत्ति को आगे रखकर चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ की नियुक्ति को ठंडे बस्ते में डाल दिया गया और इंदिरा गांधी चाहकर भी कुछ नहीं कर पाईं.

किताब के कुछ अंश


आखिरकार 31 दिसंबर 1972 को जनरल सैम मानेकशॉ को फील्ड मार्शल बनाने की घोषणा की गई, जो नियुक्ति अगले दिन से प्रभावी थी. जनरल सैम मानेकशॉ 1 जनवरी 1973 से फील्ड मार्शल सैम मानकेशॉ बन गये, वो भी तब जब थल सेनाध्यक्ष के तौर पर उनका कार्यकाल 15 जनवरी 1973 को खत्म हो रहा था. चूंकि सैन्य परंपरा में फील्ड मार्शल कभी रिटायर नहीं होता, इसलिए मानेकशॉ ने 15 जनवरी 1973 को थल सेनाध्यक्ष का पद त्याग दिया और 27 जून 2008 को आखिरी सांस लेने तक देश के पहले फील्ड मार्शल और फाइव स्टार जनरल बने रहे, ये बात अलग कि इंदिरा गांधी जिन्हें 1971 की जीत के बाद दुर्गा का अवतार तक कहा गया, वो बाबुओं की चाल के आगे सैम बहादुर को सीडीएस नहीं बना सकीं. यही कोशिश उनके बेटे राजीव गांधी ने 1987 में की, लेकिन वो भी कामयाब नहीं हो पाए. 1999 के कारगिल युद्ध के बाद जो समीक्षा समिति बनी, उसने भी सीडीएस की नियुक्ति करने का प्रस्ताव रखा, लेकिन वो अनुशंसा भी दो दशक तक फाइल में रह गई.

दिसंबर 1972 को जनरल सैम मानेकशॉ फील्ड मार्शल बने


कारगिल समीक्षा समिति की वो अनुशंसा आखिरकार वास्तविकता के धरातल पर उतरने जा रही है, क्योंकि पीएम नरेंद्र मोदी ने लाल किले की प्राचीर से इसकी घोषणा कर दी है. इस बात की कम से कम अब आशंका नहीं है कि कोई नौकरशाह या फिर कोई और नेता प्रधानमंत्री मोदी की इस घोषणा की राह में आड़े आए. ये दौर पहले का नहीं है, जब नौकरशाह देश के प्रधानमंत्री की इच्छा को भी दबा देते थे. ये वो दौर है, जब प्रधानमंत्री के आदेश का पालन करने से हिचकने में किसी आईएएस अधिकारी की हिम्मत नहीं हो सकती.

इंदिरा गांधी के साथ मानेकशॉ


देश को पहला सीडीएस देने का श्रेय आजादी के करीब 72 साल बाद पीएम मोदी के खाते में जाएगा. भारतीय सेना और उसके अधिकारियों के लिए ये देर आयद दुरुस्त आयद जैसी बात ही होगी. अगर उनके लिए कुछ बचा है तो बस कुछ दिनों का इंतजार, क्योंकि मोदी अपने दूसरे कार्यकाल में फैसले लेने में महीनों का समय नहीं लगा रहे, महज कुछ दिनों में आर्टिकल 370 की समाप्ति से लेकर तीन तलाक जैसे बिल को पास कराने का हौसला दिखा रहे हैं. देहांत के 11 साल बाद सैम बहादुर की आत्मा भी प्रसन्न होगी कि वो न सही, तो कम से कम प्राणों से प्रिय उनकी सेना का कोई अधिकारी आखिरकार सीडीएस की कुर्सी पर बैठने जा रहा है, इस पद के सृजन की चर्चा शुरु होने के सैंतालीस साल बाद.

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First published: August 16, 2019, 3:54 PM IST
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