कश्मीर पर आखिर क्या चाहते थे नेहरू और क्या सोचते थे पटेल!

कश्मीर पर तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू आखिर क्या चाहते थे और गृह मंत्री वल्लभ भाई पटेल का इस बारे में क्या विचार था, जानते हैं इस बारे में

Sanjay Srivastava | News18Hindi
Updated: June 28, 2019, 4:57 PM IST
Sanjay Srivastava
Sanjay Srivastava | News18Hindi
Updated: June 28, 2019, 4:57 PM IST
कश्मीर समस्या के संबंध में अक्सर सरदार वल्लभ भाई पटेल और जवाहरलाल नेहरू को लेकर अलग-अलग तरह की बातें होती हैं. आमतौर पर पटेल के बारे में माना जाता है कि वो कश्मीर को लेकर न तो बहुत मुखर थे और न ही उन्होंने इस पर कुछ ज्यादा बोला है. लेकिन ये एक बड़ा सवाल बनता जा रहा है कि वो कश्मीर को लेकर वाकई क्या सोचते थे. उन्होंने इसे लेकर कुछ ख़त लिखे थे, जिससे अंदाज लग सकता है कि इस बारे में वो खुद क्या सोचते थे.


कश्मीर को लेकर फरवरी के पहले हफ्ते में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कांग्रेस और तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू पर हमला किया. उन्होंने कहा, "अगर सरदार पटेल देश के पहले प्रधानमंत्री होते तो कश्मीर का एक हिस्सा पाकिस्तान के पास नहीं होता."



आखिर पटेल कश्मीर के बारे में क्या सोचते थे. उन्होंने कहा था कि ये ऐसी समस्या है, जिसने उन्हें सिरदर्द दिया है. इस बारे में उन्होंने कभी ज्यादा नहीं बोला. आजादी के दौरान मीटिंग या लोगों से मुलाकात में उन्होंने कश्मीर पर क्या कहा, वो कई किताबों में उद्धृत किया जा चुका है. इसके साथ ही उनके वो आधिकारिक और अनाधिकारिक खतो-किताबत भी है, जिसमें अक्सर उन्होंने इस पर अपने विचार जाहिर किए हैं.


माउंटबेटन ने हरी सिंह से कहा था

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आजादी से दो महीने पहले 18 जून से 23 जून 1947 के बीच कश्मीर का दौरा करते हुए लार्ड माउंटबेटन ने महाराजा हरी सिंह से कहा, "अगर कश्मीर पाकिस्तान में जाता है, तो भारत सरकार इसे गैरदोस्ताना नहीं मानेगी."


वायसराय ने आगे कहा, "उन्हें इस बारे में सरदार पटेल ने खुद दृढ भरोसा दिया है." ये बात माउंटबेटन के पूर्व राजनीतिक सलाहकार वीपी मेनन ने अपनी किताब "मेननः इटीग्रेशन ऑफ द इंडियन स्टेट" में पेज नंबर 395 पर लिखी. मेनन वो शख्स थे, जिन्होंने इंडियन इंडिपेंडेंस बिल का मसौदा तैयार करने के साथ पटेल के साथ मिलकर रियासतों के विलय में मुख्य भूमिका अदा की थी.




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नेहरू, गांधी और सरदार पटेल (फाइल फोटो)


उस समय महात्मा गांधी को उम्मीद थी कि कश्मीर भारत के साथ आएगा और दो राष्ट्रों की थ्योरी नकार देगा. ये बात पटेल के राजनीतिक सचिव वी शंकर ने लिखी. उन्होंने लिखा, "पटेल ने फैसला जम्मू-कश्मीर के शासक पर छोड़ दिया." उनकी किताब "माई रिमिंसेस ऑफ सरदार पटेल" के पृष्ठ 127 में लिखा गया, "सरदार पटेल चाहते थे कि ये फैसला हरी सिंह ही करें कि अगर वो महसूस करते हैं कि उनके राज्य का हित पाकिस्तान के साथ जाने में है तो वो वैसा ही करें."

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इतिहासकार राजमोहन गांधी ने "गांधी, पटेल, ए लाइफ 1991" के पेज 439 पर लिखा, "वल्लभभाई कश्मीर को लेकर 13 सितंबर 1947 तक अनमयस्क थे. उसी दिन सुबह उन्होंने भारत के पहले रक्षा मंत्री बलदेव सिंह को खत लिखा, जिसमें संकेत दिया, अगर वो (कश्मीर) दूसरे राष्ट्र में जाना चाहेंगे तो वो इसे स्वीकार करेंगे."


हालांकि गांधी लिखते हैं, "पटेल का रुख उसी दिन बदल गया था जब उन्होंने सुना कि पाकिस्तान ने जूनागढ़ की पाकिस्तान में विलय की दलील मान ली है." वो आगे लिखते हैं, पटेल ने कहा कि अगर जिन्ना हिंदू बाहुल्य वाले ऐसे राज्य को पाकिस्तान में मिलाने की इच्छा रखते हैं, जिसका शासक मुसलमान हो तो सरकार को क्यों दिलचस्पी नहीं लेनी चाहिए कि वो ऐसे राज्य पर दावा करे, जहां का शासक हिंदू हो और बहुसंख्य आबादी मुस्लिमों की हो." उसी दिन से जूनागढ़ और कश्मीर को लेकर एक जैसी चिंता बन गई.


"सरदार पटेल: सेंटेनरी वाल्यूम एक" के पेज 74 पर पटेल के हवाले से लिखा है, " जिन्ना को हैदराबाद और जूनागढ़ के भारत में विलय को मान जाना चाहिए, इसके बदले कश्मीर को ले लेना चाहिए." हालांकि जिन्ना ने इस डील को खारिज कर दिया.



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सरदार वल्लभ भाई पटेल और जवाहर लाल नेहरू (फाइल फोटो)


पटेल का जूनागढ़ का वो भाषण
राजमोहन गांधी ने जूनागढ़ में पटेल के भाषण को उद्धृत  करते हुए "हिंदुस्तान टाइम्स" में 14 नवंबर 1947 को लिखा, "अगर हैदराबाद के निजाम को हालात समझ में नहीं आ रहे तो वो भी उसी रास्ते चल देंगे, जिस रास्ते जूनागढ़ चल दिया. पाकिस्तान ने जूनागढ़ के लिए कश्मीर को भी किनारे रख दिया है. जबकि हम लोकतांत्रिक तरीके से चीजों को सुलझाने में लगे हैं, उन्होंने भाषण में जिन्ना का नाम लेकर कहा कि एक बार उन्होंने हमसे कहा था कि अगर हम कश्मीर को लेने की कोशिश करेंगे तो वो ऐसा ही जूनागढ़ और हैदराबाद के साथ करेंगे. हमारा जवाब ये है कि हम कश्मीर देने पर सहमत हैं अगर वो हैदराबाद देने पर सहमत हैं (सरदार पटेल सेंटेनरी वाल्यूम 2, जीएम नांदुरकर द्वारा संपादित)




नेहरू ने पटेल को भेजीं खुफिया रिपोर्ट्स  

सितंबर 1947 के आखिरी हफ्ते में नेहरू ने पटेल को खुफिया रिपोर्ट्स भेजीं कि पाकिस्तान कश्मीर में घुसपैठ के लिए बड़े पैमाने पर तैयारी कर रहा है. 26 अक्टूबर को नेहरू के घर पर मीटिंग हुई, जिसमें कश्मीर के महाराजा हरी सिंह के प्रधानमंत्री मेहर चंद महाजन भी मौजूद थे. उन्होंने कहा कि श्रीनगर में अगर फौरन भारतीय फौजों को नहीं भेजा गया तो दिक्कत हो जाएगी. उन्होंने साथ ही कहा, "अगर भारत प्रतिक्रिया नहीं दिखाता तो फिर कश्मीर को जिन्ना की शर्तें माननी होंगी." नेहरू नाराज हुए. उन्होंने महाजन से मीटिंग से जाने के लिए कह दिया, तब पटेल ने टोका, "बिल्कुल महाजन. क्या आप पाकिस्तान नहीं जा रहे." (राजमोहन गांधी, 1991, पेज 442). राजमोहन के मुताबिक, "पटेल कश्मीर में भारत द्वारा उठाये जा रहे तमाम कदमों से खुश नहीं थे, इसमें यूएन की मौजूदगी में जनमत संग्रह प्रस्ताव भी था. (पेज 518)


पटेल का कश्मीर पर पत्राचार 

यहां पर वो पत्राचार हैं, जो नेहरू और पटेल ने कश्मीर को लेकर किया था. इस पर नेशनल बुक ट्रस्ट ने वर्ष 2010 में एक किताब भी प्रकाशित की थी, इसका नाम है "नेहरू-पटेल एग्रीमेंट विदइन डिफरेंसेस सेलेक्ट डाक्यूमेंट एंड करेसपोंडेंस 1933-1950".



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सरदार वल्लभ भाई पटेल और जवाहर लाल नेहरू (फाइल फोटो)


राजनीतिक आंदोलन को जहां तक संभव हो, सांप्रदायिक सवालों से अलग रखा जाना चाहिए. दोनों को साथ नहीं रखा जाना चाहिए... मैं समझता हूं कि पंडित जवाहरलाल नेहरू स्वयं इस कष्टप्रद सवाल के सम्मानीय निपटान के लिए शांतिदूत के रूप में कश्मीर आ रहे हैं.  वह भी एक हिंदू हैं, ऊपर से एक कश्मीरी हिंदू. वह हमारे सबसे बड़े देशभक्तों और आधुनिक भारत के महानतम नेताओं में एक हैं. सभी इंसानों की तरह वो भी गलती कर सकते हैं और उसके लिए उत्तरदायी भी हैं लेकिन उनके सभी काम सर्वोच्च देशभक्ति के विचारों से शासित होते हैं. आपको उनसे या उनके कार्यों से डरने की ज़रूरत नहीं है. हमें उम्मीद है कि कश्मीर में यह दुर्भाग्यपूर्ण मुसीबत जल्द खत्म हो जाएगी और इससे कोई कड़वाहट नहीं होगी। "(पटेल पेपर्स: पंडित जियाललाल कौट जलाली, सेवानिवृत्त सहायक जनरल, जम्मू और कश्मीर, 16 जून, 1 9 46)


  "... मुझे नहीं लगता कि कश्मीर के लिए जो कुछ भी किया जा सकता था, वह मैंने छोड़ा है और न ही मैं कश्मीर से संबंधित नीति के मामलों पर आपके और मेरे बीच कोई मतभेद से अवगत हूं. फिर भी यह सबसे दुर्भाग्यपूर्ण है कि लोगों को ये लगे कि हमारे बीच वैचारिक मतभेद है. ये मेरे लिए परेशानी का विषय है. "(पटेल पेपर: नेहरू का द्वारकानाथ काटजू को पत्र, 8 अक्टूबर 1 9 47 को)




   '' कश्मीर का भारत की तस्वीर में बड़ा महत्व है. कश्मीर में जो कुछ भी होता है शेष भारत पर उसका असर पड़ेगा, इसलिए हमारे लिए, कश्मीर का दोहरा महत्व है. मैं किसी भी तरह नहीं चाहता कि कश्मीर विदेशी हितों की कॉलोनी बन जाए. मुझे डर है कि पाकिस्तान कहीं वही न बन जाए, अगर वो जीवित रह पाया तो. ये हो सकता है कि पाकिस्तान के लोग कश्मीर को एक ऐसे देश के रूप में देखते हैं, जो उन्हें लाभ पहुंचा सकता है. मुझे लगता है कि विदेशी निहित स्वार्थों को पर्याप्त विचार के लिए सीधे कश्मीर का फायदा उठाने की इजाजत देकर ऐसा किया जा सकता है... "(एनएमएमएल में जे एन पेपर्स: नेहरू, शेख अब्दुल्ला, 10 अक्टूबर, 1947)


   "आरएसएस और साथ ही हिंदुओं और पश्चिम पंजाब के सिख शरणार्थी जो जम्मू गए हैं, कांग्रेस सरकार, शेख अब्दुल्ला और जम्मू प्रांत के मुस्लिम निवासियों के खिलाफ प्रचार के लिए इस्तेमाल हो रहे हैं. फ्रंटियर प्रांत और पश्चिम पंजाब सीमा जिलों में फैलाया जा रहा प्रचार ये है कि भारत सरकार ने कश्मीर में मुस्लिमों का विनाश करने के लिए सिख सैनिकों को भेज दिया है. शेख अब्दुल्ला को इस सबमें शामिल समझ कर हमला किया जाता है ... "(जम्मू एन कलेक्शन: जम्मू में 30 अक्टूबर 1947 को आरएसएस द्वारा बढ़ाए जा रहे सांप्रदायिक तनाव पर नेहरू का पटेल को खत) *


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 "कश्मीर के संबंध में हम कहते हैं कि छिपकर लड़ने की तुलना में खुली लड़ाई करना बेहतर है. इसी कारण से हमने संयुक्त राष्ट्र संघ का दरवाजा खटखटाया. यदि कश्मीर को तलवार से बचाते हैं तो जनमत के लिए रास्ता कहां बचता है? हम कश्मीर क्षेत्र के एक इंच का भी आत्मसमर्पण नहीं करेंगे." (कलकत्ता में नेहरू का भाषण, 3 जनवरी 1948)


 * "यहां हम मौसम और समस्याओं, दोनों से जूझ रहे है.  कश्मीर, विशेष रूप से, हमें एक सिरदर्द दे रहा है. "(पटेल का खत जीडी बिड़ला को, मई 1949, रामचंद्र गुहा की किताब - गांधी के बाद भारत से उद्धृत)


 "कश्मीर का भी हल हो गया होता लेकिन जवाहरलाल ने सैनिकों को बारामुला से डोमेल नहीं जाने दिया. (1947-48 के पहले कश्मीर युद्ध के दौरान) उन्होंने उन्हें पुंछ की ओर भेजा. "(पटेल का देहरादून में डॉ. राजेंद्र प्रसाद को खत , 29 जून 194 9)


 "कश्मीर में जो घटनाएं हो रही हैं वे आपके उस विचार को दर्शाती हैं जो आपने दिसंबर 1947 में हमारे सामने रखा था. लेकिन हमने उन विचारों को स्वीकार नहीं किया, जिसका कारण आप जानते हैं." (पटेल का 16 मार्च, 1950 को माउंटबेटन को पत्र)


  "मैं छह महीने में कश्मीर समस्या हल कर सकता हूं. मैं सिखों को घाटी में भेजूंगा. "(पटेल का खत भारतीय सोशलिस्ट पार्टी के संस्थापक अच्युत पटवर्धन को) ये बात पटवर्धन ने राजमोहन गांधी को 24 मार्च 1987 को मद्रास में कही)




 "कश्मीर में हम करोड़ों खर्च कर रहे हैं, (फिर भी) यदि घाटी में जनमत संग्रह होता है, तो हम हारेंगे ही" (पटेल का खत पहले योजना आयोग के सदस्य आरबीआई पाटिल को, 28 सितंबर 1950)


तब जेपी ने क्या कहा था 

राजमोहन गांधी ने पटेल की इस टिप्पणी को "बगैर सोची समझी और विरोधाभासी" कहा.  उन्होंने याद दिलाया कि 1950 में पटेल ने जयप्रकाश नारायण से कहा था कि "कश्मीर अविलय है". पटेल का निधन हो जाने के बाद जेपी ने यहां तक कहा कि जो भी उनके करीब थे, उन्हें भी बिल्कुल नहीं पता था कि उन्होंने कश्मीर समस्या का कैसे सामना किया होता.


जेपी ने कहा, "हो सकता है कि "सरदार" ने जो भी उनके दिमाग में चल रहा था उसका खुलासा न किया हो या उन्होंने सोचा हो सकता है कि इस समस्या पर दिमाग लगाने का मतलब नहीं है जब तक कि उन्हें कुछ संभालने के लिए बुलाया नहीं जाए"। (नंदुरकर: सरदार पटेल शताब्दी खंड 1, पी 314)


राजमोहन लिखते हैं: "कश्मीर नेहरू के बच्चे की तरह था, जिसके लिए वल्लभभाई ने कोई कदम नहीं उठाया।" इंडियन एक्सप्रेस से बात करते हुए राजमोहन ने स्पष्ट रूप से कहा, "व्यापक रूप से, नेहरू और पटेल कश्मीर सहित अधिकांश मुद्दों पर एकजुट थे. "


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First published: June 28, 2019, 4:27 PM IST
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