भारतीय मूल के वैज्ञानिकों ने नासा के लिए बनाई खास और बेहतर तरह की बैटरियां

भारतीय मूल के वैज्ञानिकों ने नासा के लिए बनाई खास और बेहतर तरह की बैटरियां
इन बैटरियों (Batteries) की खास बात ये है कि ये जल्दी तो जार्च (Charge) होती ही हैं, ये बहुत हल्की (Lighter) भी हैं. (तस्वीर: Pixabay)

नासा (NASA) के अनुदान से भारतीय मूल के वैज्ञानिकों ने हल्की और तेजी से चार्ज होने वाली बैटरियां (Batteries) विकसित की हैं जो अंतरिक्ष यात्रियों (Astronauts) के लिए बहुत काम की साबित होंगी.

  • News18Hindi
  • Last Updated: September 3, 2020, 5:14 PM IST
  • Share this:
नासा (NASA) के लिए भारतीय मूल के वैज्ञानिकों की एक टीम ने अमेरिका में हल्की और तेजी (Light and Quick) से चार्ज होने वाली बैटरी (Batteries) विकसित की है. इन बैटरियों की खास बात यह है कि ये स्पेससूट के लिए बहुत ही ज्यादा उपयुक्त हैं और यहां तक कि ये मंगल को रोवर के लिए भी उपयुक्त हैं और से चार्ज कर सकती हैं.

किसने किया यह शोध
साउथ कैरोलीना की क्लेम्सन यूनिवर्सिटी में क्लेमसन नैनोमटेरियल्स इंस्टीट्यूट के शैलेंद्र चिलूवाल, नवराज सापकोता, अप्पाराव एम राव और रामकृष्ण पोडिला उस टीम का सदस्य थे जिन्होंने यह बैटरियां बनाई हैं.

सैटेलाइट्स में होगा जल्द ही उपयोग
इस खोज से उत्साहित कॉलेज ऑफ साइंस के फिजिक्स और एस्ट्रोनॉमी विभाग के असिस्टेंट प्रोफेसर पोडिला का कहना है कि ये नई क्रांतिकारी बैटरियां जल्द ही अमेरिका के सैटेलाइट्स में उपयोग में लाई जा सकती हैं. ज्यादातर सैटेलाइट सूर्य से अपनी ऊर्जा लेते हैं लेकिन सैटेलाइट्स में भी ऊर्जा संरक्षित करने की जरूरत होती है जब वे पृथ्वी की छाया से गुजरते हैं और उस समय सूर्य से ऊर्जा लेने में सक्षम नहीं होते.



क्यों हल्की बैटरियां
पोडिला ने बताया, “हमें जितनी ज्यादा हल्की बैटरीयां हो सके बनानी थीं क्योंकि सैटेलाइट का वजन बढ़ने से अभियान की लागत भी बढ़ जाती है.” इस शोध के लिए नासा ने आर्थिक सहायता दी थी, यह शोध अमेरिकन केमिकल सोसाइटी डर्नस एप्लाइट मेटरियल्स एंट इंटरफेसेस में प्रकाशित हुआ है.

NASA, Batteries
इस पूरे शोध (Research) के लिए नासा (NASA) ने अनुदान दिया था. (तस्वीर: NASA)


ताश के पत्तों की तरह
पोडिला ने कहा कि इस खोज को समझने के लिए लीथियन बैटरी में ग्रेफाइट एनोट की ताश के पत्तों की तरह कल्पना करनी होगी जिसमें हर कार्ड एक ग्रेफाइट की परत को प्रदर्शित करता है जो आवेश को तब तक सहेज कर रखता है जबकि विद्युत की जरूरत नहीं होती है. पोडिला ने बताया कि समस्या ये है कि ग्रेफाइट ज्यादा आवेश जमा करके नहीं रख सकता है.

सौर उर्जा को अवेशोषित और सहेजने वाला अणु खोजा स्वीडन के वैज्ञानिक ने

सिलिकॉन को चुनने का फायदा
इसके लिए टीम ने अपने काम के लिए सिलिकॉन का चुनाव किया जो ज्यादा आवेश जमा करके रख सकता है. इसका मतलब यह था कि और ज्यादा ऊर्जा को हलके सेल्स में जमा करके रखा जा सकता है. बजाए ग्रेफाइट के कार्ड्स के, शोधकर्ताओं ने नई बैटरियों में बकीपेपर नाम के कार्बन नैनोट्यूब पदार्थ की परतों का उपयोग किया जिसके बीच में सिलिकॉन नैनोपार्टिकल्स को रखा गया.

क्या हुआ नतीजा
CNI के ग्रेजुएट छात्र और इस शोध के प्रथम लेखक शैंलेंद्र ने बताया कि कार्बन नैनोट्यूब्स की फ्रीस्टैंडिंग शीट्स सिलिकॉन के नैनोपार्टिकल को विद्युत रूप से जोड़े रखती हैं. इस तरह से सिलिकॉन और दूसरे नैनोमटेरियल के उपयोग से न केवल बैटरी की क्षमता बढ़ी बल्कि इससे बैटरियों को ज्यादा बिजली से चार्ज करने की क्षमता भी मिली जिसका मतलब यह था कि बैटरी जल्दी से चार्ज हो सकती है.

Astronauts, Research
इस शोध (Research) से अंतरिक्ष यात्रियों (Astronauts) को बहुत फायदा होगा. (प्रतीकात्मक तस्वीर)


सेलफोन से लेकर अंतरिक्ष यात्रियों तक
शोधकर्ताओं का कहना है कि जिसने भी अपने फोनकॉल के बीच में अपना सेलफोन बंद होते देखा है वह बैटरी तकनीक के लिए इस फीचर की अहमियत पता होगी. तेजी से चार्ज करने वाली हल्की बैटरी न केवल बैटरी से चलने वाले सूट पहनने वाले अंतरिक्ष यात्रियों के लिए वरदान साबित होंगी, बल्कि उन वैज्ञानिक और इंजीनियरों के लिए भी बहुत काम की होंगी जो इन्हें अंतरिक्ष तक पहुंचाते हैं.

जानिए नासा क्यों शनिग्रह के उपग्रह टाइटन पर भेजना चाहता है पनडुब्बी

CNI के निदेशक और नासा के अनुदान के प्रमुख अन्वेषणकर्ता राव का कहना है कि सिलिकॉन का लीथियम आयन बैटरी में सिलिकॉन का एनोड के रूप में होना शोधकर्ताओं के लिए ‘पवित्र अमृत के प्याले’ की तरह है. राव ने बताया कि नई बैटरियां जल्दी इलेक्ट्रिक वाहनों में लगाई जाएंगी. पोडिला का कहना है कि उनकी टीम का अगला लक्ष्य औद्योगिक साझेदारों से मिल कर इस लैब आधारित तकनीक को बाजार उपयोगी तकनीक में बदलना है.
अगली ख़बर

फोटो

टॉप स्टोरीज