चांद के आगे और पीछे के हिस्से में है बहुत फर्क, वैज्ञानिकों ने बताया क्यों

चांद के आगे और पिछले हिस्से में फर्क जानने की ही कोशिश वैज्ञानिकों ने की है.
चांद के आगे और पिछले हिस्से में फर्क जानने की ही कोशिश वैज्ञानिकों ने की है.

बरसों के अवलोकन, प्रयोगों और सिम्यूलेशन के आधार पर वैज्ञानिकों ने चांद (Moon) के अगले और पिछले हिस्से के अंतर (Asymmetry) की वजह का पता लगाया है.

  • Share this:
नई दिल्ली: इंसान चांद (Moon) पर बहुत बार जा चुका है. कई देशों के अंतरिक्ष यान (Space Probe) चांद पर उतर चुके हैं.  कुछ के रोवर (Rovers) वहां घूम रहे हैं, लेकिन फिर भी अभी हम चांद की बहुत सी बातों से अनजान हैं. इनमें से एक रहस्य है उसकी असमानता (Asymmtry) लेकिन हाल में नेचर जियोसाइंस में प्रकाशित एक शोधपत्र ने इस असमानता की सप्रमाण व्याख्या दी है.

दो हिस्सों की असमानता
जब से चंद्रमा पृथ्वी का उपग्रह बना है , तभी से पृथ्वी से चांद का एक ही हिस्सा दिखाई देता है. इस हमें पास का हिस्सा (Near Side) कहते हैं. लेकिन पृथ्वी की ओर यह हिस्सा उसके पिछले हिस्से (Far Side) से बहुत अलग है.

कब पता चला अंतर
पास के हिस्से में जहां कुछ काले हिस्से हैं जिन्हें लूनार मारिया कहा जाता है जो चांद पर दाग की तरह माने जाते हैं. वैज्ञानिकों का माना है कि ये  क्रेटर्स या फिर ज्वालामुखी के हिस्से हो सकते हैं.  पहले वैज्ञानिकों का मानना था का चांद का पिछला हिस्सा भी कुछ आगे के हिस्से की ही तरह होगा.  लेकिन जब सोवियत संघ के अंतरिक्ष यान ने 1950 के दशक के अंत और 1960 के दशक के शुरू में चांद के पिछले हिस्से की तस्वीरें लीं, तो उनसे पता चला कि उस हिस्से में तो मारिया जैसा कुछ नहीं है.



क्या पता चला
वैज्ञानिकों क पता चला कि चांद के पिछले हिस्से में मारिया जैसा भूभाग केवल एक प्रतिशत है जबकि सामने के हिस्से में करीब 31 प्रतिशत है. वैज्ञानिकों को लगा कि चांद के दोनों हिस्सों में इतना बड़ा फर्क यह जानने में मदद कर सकता है कि चांद का निर्माण कैसे हुआ.

Moon
पृथ्वी से हमेशा ही चांद का एक ही हिस्सा दिखाई देता है.


कई सुरागों का निचोड़
टोक्यो इंस्टीट्यूट में अर्थ लाइफ साइंस इंस्टीट्यूट, फ्लोरीडा यूनिवर्सिटी, टोसन यूनिवर्सिटी के कार्नेगी इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस, नासा जॉनसन स्पेस सेंटर और न्यू मैक्सिको यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिकों ने अवलोकन के आंकड़ो, लैबोरेटरी के प्रयोगों और कम्प्यूटर सिम्यूलेशन से मिलाकर इस बात के सुराग हासिल किए है कि चांद के आगे पीछे कि हिस्सों में इतना फर्क कैसे आ गया.

डार्क मैटर के प्रयोग में वैज्ञानिकों को मिले अजीब संकेत, बदल सकती है भौतिकी

क्या था कालेपन का कारण
जब नासा के अपोलो अभियान के जरिए चांद से 382 के पत्थर पृथ्वी पर आए थे, तब वैज्ञानिकों ने पाया था कि चांद के आगे के हिस्सों में कुछ जगहों पर जो कालापन है, वह वहां की भूगर्भीय संचरना की वजह से था. इसका जिम्मेदार वैज्ञानिकों ने चंद्रमा की ज्वालामुखी घटनाओं को माना.  उन्होंने मारिया के एक पत्थर की नई तरह की संरचना पाई जिसे न उन्होंने KREEP नाम दिया. इसमें K का मतलब  पौटेशियम, जबकि REE का मतलब धरती पर बहुत कमा पाए जाने वाले तत्व, और P का मतलब फॉसफोरस था.

लेकिन कहानी तो रेडियोधर्मिता ने बताई
इसमें यूरोनियम और थोरियम भी था जिसकी रोडियोधर्मिता की वजह से गर्मी निकलती थी. थर्मल मॉडलिंग से पता चला कि चांद के पास वाले हिस्से में  रेडियोधर्मिता की वजह से अरबों साल तक गर्मी मिलती रही और इसी वजह से वहां ज्वालामुखी सक्रिय रहे होंगे.  यही दोनों तरफ के बीच में इतने बड़े अंतर की वजह रहा होगा.

Moon
चांद के अगले हिस्से पर ज्वालामुखी गतिविधियां ज्यादा हुई हैं.


अब भी काफी कुछ पता करना बाकी
वैज्ञानिकों के लिए अभी यह पता करना बाकी है कि पृथ्वी के पास वाले हिस्से में इतनी ज्यादा ज्वालामुखी गतिविधि क्यों रही और KREEP सिग्नेचर का इतना असमान वितरण क्यों हैं.  माना जाता है कि मंगल के आकार का एक पिंड जिसे थिया (Theia) कहा जाता है, पृथ्वी से टकराया था. इस घटना की वजह से  ही बहुत से टुकड़े, धूल अंतरिक्ष में उड़े थे. बाद इनके मिलने से ही चंद्रमा का निर्माण हुआ था. लेकिन वे सारे पदार्थ समान रूप से नहीं मिले थे. यह घटना 4.5 अरब साल पुरानी है. वही असमानता आज चांद के अगले और पिछले हिस्से की वजह है.

जानिए कैसे 12 अरब साल पुराने संकेत से पता लगी डार्क युग की रोचक कहानी

वैज्ञानिकों को चंद्रमा के निर्माण के बाद वहां की घटनाओं का क्रम नहीं पता लग पाया है. इसके अलावा वहां हवा के न होने से अपरदन की घटना भी नहीं होती है. जिससे उन्हें घटनाक्रम में मदद नहीं मिल पा रही है. लेकिन वैज्ञानिकों को लगता है कि यह हाल अंतरिक्ष में दूसरे चंद्रमाओं का भी हुआ होगा.
अगली ख़बर

फोटो

टॉप स्टोरीज