आखिर कैसे उड़ पाते हैं ये Flying Snakes, वैज्ञानिकों ने लगा लिया पता

आखिर कैसे उड़ पाते हैं ये Flying Snakes, वैज्ञानिकों ने लगा लिया पता
उड़ने वाले सांप हवा में तैरने के लिए खास तरह की गतिविधियों का सहारा लेते हैं. (प्रतीकात्मक तस्वीर)

शोधकर्ताओं ने पता लगाया है कि उड़ने वाले सांप (Flying snake) एक खास तरह की प्रक्रिया Undulation का उपयोग कर हवा में उड़ पाते हैं.

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आमतौर पर उड़ने वाले सांप (Flying snake) बहुत कम देखे जाते हैं. हैरानी की बात लगती है कि बहुत ज्यादा जहरीले (vemonous) न होने पर भी इन सांपों का खौफ बहुत ज्यादा रहता है. इनके पंख न होने के बाद भी ये उड़ कैसे लेते हैं इस बात का पता वैज्ञानिकों ने लगा लिया है. ताजा शोध के मुताबिक ये सांप एक खास गतिविधि (Movement) के जरिए उड़ पाते हैं.

इस प्रजाति पर किया गया अध्ययन
पैराडाइस ट्री स्नेक या क्रिसोपेलिया पाराडिसी प्रजाति का यह सांप पेड़ की एक शाखा से दूसरे  शाखा तक उड़ जाता है औरकई बार वह उड़कर जमीन पर भी उतर आता है. इस उड़ान के लिए वह खास तरीके से हिलते हुए हवा में तैरता है. वह हवा में अंग्रेजी भाषा के अक्षर एस ‘S’ आकार बनाता है. इस प्रक्रिया को अनड्यूलेशन कहा जाता है. यह गतिविधि ही उसके एक उड़ने वाला सांप बना देती है. जिसकी वजह से उन्हें ग्लाइडिंग स्नेक (Gliding snake) भी कहा जाता है.

कैसे किया अध्ययन



शोधकर्ताओं ने इस प्रजाति के सात सांपों का अध्ययन किया. इसके लिए उन्होंने उनकी गतिविधियों को हाई स्पीड कैमरों में रिकॉर्ड  किया. “अड्यूलेशन एनएबल्स ग्लाइडिंग इन फ्लाइंग स्नेक्स” नाम से यह शोध नेचर फिजिक्स जर्नल में प्रकाशित हुआ है.



क्यों तैरते लगते हैं हवा में ये सांप
इस अध्ययन के एक शोधकर्ता और वर्जीनिया टेक् में बायोकैमिकल इंजीनियरिंग एंड मैकेनिक्स के प्रोफेसर जैक सोचा का कहना है कि अपने शरीर को सीधा करना इन उड़ने वाले सांपों की उड़ान का हिस्सा है. लेकिन वे लहराने वाली गतिविधि भी करते हैं. सोचा ने कहा, “ऐसा लगता है कि सांप हवा में तैरते हैं. और जब वे तैरते हैं तो वह अनड्यूलेशन की गतिविधि होती है.

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उड़ने वाले सांप उतने जहरीले नहीं होते जितने के समझे जाते हैं. (प्रतीकात्मक तस्वीर)


दो अलग-अलग तरह की गतिविधियां
इस अध्ययन के मुताबिक सांप दो अलग तरह की लहराने वाली गतिविधियां करते हैं. वे एक बड़े आयाम (Amplitude) वाली चौड़ाई वाली लहर (Horizontal wave)  बनाते हैं और इसके साथ ही वे  एक छोटे आयाम (Amplitude) वाली एक लंबाई वाली लहर (Vertical wave) भी बनाते हैं. दोनों ही काम एक साथ सिर से लेकर पूंछ के सिरे तक समन्वय के साथ होते हैं. जॉन होपकिंस यूनिवर्सिटी के मैकेनिकल इंजीनियर इसाक येटोन ने बताया. “यह बहुत तेजी से होता है. और यह आंखों से पूरी तरह से देख पाना मुमकिन नहीं होता. इसीलिए हमें हाई स्पीड मोशन को पकड़ने के लिए हाई स्पीड कैमरे की जरूरत पड़ी.”

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उड़ने और गिरने से बचने के लिए
शोधकर्ताओं ने यह भी पता लगाया कि इन सांपो के शरीर का पीछे का हिस्सा एक तरह के ऊपर नीचे होने वाली मुड़ने की गतिविधि करता है. उनका कहना है कि बिना अनड्यूलेशन के उनकी उड़ना अस्थिर हो सकती है जिसकी वजह से अचानक गिर सकते हैं. येटोन का कहना कि आमतौर पर सांप आगे बढ़ने के लिए अनड्यूलेशन करते हैं लेकिन उड़ने वाले सांप स्थायित्व के लिए ऐसा करते हैं.

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इस तरह के सांप दक्षिण पूर्व एशिया, भारत और श्रीलंका जैसे देशों में पाए जाते हैं. (प्रतीकात्मक तस्वीर))


कहां पाए जाते हैं ये उड़ने वाले सांप
क्रिसोपेलिया प्रजाति के सांपों को आमतौर पर उड़ने वाला सांप कहा जाता है. दक्षिणपूर्व एशिया के अलावा भारत, श्रीलंका, दक्षिण चीन और फिलीपींस में भी पाए जाते हैं. इनका जहर जानलेवा नहीं माना जाता है यानि वे उन जहरीले सांपों की श्रेणी में नहीं आते हैं जिनका जहर इंसान की जान ले लेता है. आमतौर पर ये भोजन के लिए छिपकली, कुतरने वाले जीव, चमगादड़, कुछ पंछी तक का शिकार करते हैं.

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इनमें से जिस खास प्रजाति का अध्ययन किया गया वह पैराडाइस ट्री स्नेक कहलाता है. यह उड़ने वाले सांपों में सबसे छोटी प्रजाति है. इसकी लंबाई करीब 3 फीट तक होती है. काले रंग के इस सांप पर हरी धारियां होती हैं.
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