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क्या वाकई मर चुके व्यक्तियों की आवाज सुन सकते हैं कुछ लोग?

बहुत से लोगों को लगता है कि वे मरे हुए लोगों (Dead People) की आवाज सुनते हैं. इसी की वजह जानने की कोशिश की गई.  (प्रतीकात्मक तस्वीर: Pixabay)
बहुत से लोगों को लगता है कि वे मरे हुए लोगों (Dead People) की आवाज सुनते हैं. इसी की वजह जानने की कोशिश की गई. (प्रतीकात्मक तस्वीर: Pixabay)

मरे हुए लोगों (Dead People) से बात करने का दावा करने वालों (clairaudience) पर हुए अध्ययन में शोधकर्ताओं ने यह जानने का प्रयास किया कि ऐसे लोगों का विश्वास किस तरह से विकसित होता है.

  • News18Hindi
  • Last Updated: January 21, 2021, 6:53 AM IST
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क्या मरे हुए लोगों (Dead People) से बात की जा सकती है. दुनिया में बहुत से लोग यह दावा करते हैं कि उनके पास एक आध्यात्मिक माध्यम (Spiritual Mediums) है जिसके जरिए वे मर चुके लोगों से बात करते हैं. ऐसे लोगों को विश्वास होता है कि वे लोगों की आत्मा (Spirits) से बात कर सकते हैं. अब वैज्ञानिक इस बात की व्याख्या करने का प्रयास कर रहे हैं कि आखिर कुछ लोग क्यों अतींद्रीय श्रवण (clairaudience) में विश्वास कर सकते हैं.

यह जानने का प्रयास
डरहम यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं ने पता लगाया है कि क्यों कुछ लोग आध्यात्मवादी (spiritualist) विश्वास अपना लेते हैं. जिसकी वजह से कुछ लोग मृत लोगों से बात करने का दावा करते हैं जबकि बाकी ऐसा नहीं कर पाते. इसका संबंध महसूस करने और सुनने की सक्रिय संवेनशीलता से है.

कौन होते हैं ऐसे लोग
अतींद्रीयदर्शी (Clairvoyant) वे लोग होते हैं जो दावा करते हैं के वे मरे हुए लोगों को देख सकते हैं और कुछ लोग मरे हुए लोगों को महसूस भी कर सकते हैं. इस अध्ययन में शोधकर्ताओं का ध्यान इस तरह के लोगों पर नहीं था. लेकिन शोधकर्ता की टीम उन लोगों के बारे में अध्ययन करना चाहती थी जो मरे हुए लोगों से बात करते हैं.



कितने लोगों पर अध्ययन
शोधकर्ताओं ने स्पिरिचुअलिस्ट नेशनल यूनियन के ऐसे 65 लोगों का सर्वे किया जो ऐसा दावा करते हैं वे आत्माओं या मरे हुए लोगों से बात कर सकते हैं. एक दूसरे समूह में 143 लोगों को अध्ययन में शामिल किया गया जिन्होंने कभी इस तरह के दावे नहीं किए. पहले समूह के लोगो अक्सर कहते रहे थे कि उन्हें असामान्य श्रवण अनुभव होते हैं जिनमें अजीब सी आवाजें शामिल हैं. और ऐसा वे बचपन में भी अनुभव करते थे.

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शोध के मुताबिक कुछ लोग आध्यात्मवादी (spiritualist) विश्वास के प्रति झुकाव विकसित कर लेते हैं. (प्रतीकात्मक तस्वीर: Pixabay)


यह रुझान दिखा
अध्ययन के अवलोकनों से एक थीम सामने आई. आध्यात्मवादी समूह के बारे में पाया गया कि उनमें अवलोकन करने का रूझान था. इसे वह “गुण कहा जाता है जिसका चेतना की बदली हुई अवस्थाओं के मानसिक या काल्पनिक गतिविधि या अनुभव में डूब जाने संबंध है.”

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ये झुकाव पैदा कर लेते हैं
शोधकर्ताओं के मुताबिक जब इस तरह के लोग इन अजीब सी आवाजों का अर्थ खोजने लगते हैं तो वे आध्यात्मिकता की ओर रुझान पैदा कर लेते हैं. आध्यात्मवाद विश्वास का वह तंत्र है जिसमें कहा जाता है कि इंसान का अस्तित्व उसकी मृत्यु के बाद भी खत्म नहीं होता बल्कि आत्माओं के स्वरूपों में जारी रहता है.

सीखना या ललक
इस अध्ययन के प्रमुख लेखक डॉ एडम पावेल  ने बताया यह बचपन के चरम अनुभवों को हल करने का तरीका है. मरे हुए लोगों से बात कर पाने के माध्यम होने की नैसर्गिक प्रतिभा वास्तव में केवल चरम संवेदी भावना की नैसर्गिक प्रतिभा है. यह सीखने और ललक के बीच प्रतिस्पर्धा की मिसाल है. बचपने के अजीब सी प्रक्रियाएं विश्वास में बदल जाते हैं जब वे इस कला का अभ्यास करना शुरू कर देते हैं.

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शोध में पाया गया कि मरे हुए लोगों (Dead People) की आवाज सुनने का दावा करने वालों में कुछ खास मानवीय गुणों को पाया जाता है. (प्रतीकात्मक तस्वीर: Pixabay)


कैसे होता है अनुभव
इस अध्ययन में शोधकर्ताओं ने यह विश्लेषण करने का प्रयास किया कि इन माध्यमों से आत्मा की आवाज का अनुभव होता कैसे है. इसके बाद उन्होंने इसे मतिभ्रम के प्रति झुकाव, अवशोषण केस्तर, पहचान के पहलुओं और परासामान्य में विश्वास से तुलना की.

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शोध में पाया गयाकि 44 प्रतिशत लोगों को मरे हुए लोगों की रोज आवाज आती है. जबकि  33 प्रतिशत ने कहा कि उन्हें आखिरी दिन आवाज कम सुनाई दी. वहीं 79 प्रतिशत लोगों ने बताया कि इस तरह की आवाज सुनना उनकी जिंदगी में आम बात हो गई है. 65 प्रतिशत लोगों ने माना कि आवाज उनके अंदर से आती लगती है. शोधकर्ताओं ने पाया कि उच्च ग्रहणशीलता, ऐसी प्रक्रियाओं के प्रति झुकाव और विश्वास का सिस्टम इस तरह के संचार के अनुभवों का अहसास कराते हैं.
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