डायनासोर के विनाश में नहीं थी ज्वालामुखियों की भूमिका- शोध

डायनासोर के महाविनाश (Mass Extinction) में ज्वालामुखियों की भूमिका पर सवालिया निशान था. (प्रतीकात्मक तस्वीर: Pixabay)

डायनासोर के महाविनाश (Mass Extinction) में ज्वालामुखियों की भूमिका पर सवालिया निशान था. (प्रतीकात्मक तस्वीर: Pixabay)

डायनासोर (Dinosaurs) का सफाया करने वाला महाविनाश (Mass Extinction) को लेकर हुए अध्ययन में पाया गया है कि उसका कारण ज्वालामुखी (Volcanos) के कारण होने वाला कार्बन डाइऑक्साइड का उत्सर्जन (CO2 Emission) नहीं था.

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  • Last Updated: March 31, 2021, 7:06 PM IST
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पृथ्वी (Earth पर हुई महाविनाश (Mass Extinction) की घटनाओं में से सबसे ताजा घटना 6.6 करोड़ साल पहले  हुई थी. उस समय आए इस महाविनाश के समय के बारे में हमारे वैज्ञानिकों ने कुछ अहम प्रमाण हासिल किए हैं. इनके मुताबिक इस महाविनाश का ज्वालामुखी कार्बन उत्सर्जन (Volcanic Carbon Emission) प्रमुख कारण नहीं था. शोध में पाया गया है कि महाविनाश के काल में पर्याप्त मात्रा में कार्बन उत्सर्जन नहीं हो सका था.

6.6 करोड़ साल पहले आया था ये महाविनाश

पृथ्वी पर पिछले 50 करोड़ सालों में अब तक कुल पांच महाविनाश की घटनाएं हो चुकी हैं. माना जाता है कि 6.6 करोड़ साल पहले पृथ्वी से एक क्षुद्रग्रह के टकराने के बाद यहां ऐसी घटनाएं हुई थी जिससे भयानक किस्म का जलवायु परिवर्तन हुआ था. इस परिवर्तन की वजह से डायनासोर सहित पृथ्वी का तीन चौथाई जीवन खत्म हो गया था.

ज्लावामुखी उत्सर्जन की भूमिका
अभी तक यह माना जाता है कि पांच महाविनाशों में से अब तक कम से कम तीन का कारण बड़े पैमाने पर हुए ज्वालामुखी  उत्सर्जन थे. अब तक यह बहस का विषय रहा था कि डायनासोर के विनाश का प्रमुख कारण क्या था. क्या भारत के दक्कन ट्रैप से निकलने लावा में सारे डायनासोर नष्ट हो गए या फिर एक विशालकाय क्षुद्रग्रह इनके विनाश का कारण बना. या फिर दोनों घटनाओं ने मिलकर यह काम किया.

ज्वालामुखी और जलवायु परिवर्तन

अब बहुल संस्थागत शोध टीम, जिसमें सिटी यूनिवर्सिटी ऑफ न्यूयॉर्क और यूनिवर्सिटी ऑफ कैम्ब्रिज के वैज्ञानिक शामिल हैं, ने पहली बार दक्कन ट्रैप के ज्वालामुखी क्षेत्रों के कार्बन उत्सर्जन के सटीक समय और मात्रा की जानकारी हासिल की  है. नए आंकड़ों का मतलब है कि वैज्ञानिक अब क्रिटेशियस काल के अंत में हुए जलवायु परिवर्तन के कारण हुए महाविनाश में ज्वालामुखी की भूमिका का आंकलन कर सकते हैं.



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शोधकर्ताओं ने इस बात की पड़ताल पर जोर दिया कि क्रिटेशियस काल के अंत में महाविनाश (Mass Extinction) के समय आए ज्वालामुखियों से कार्बन उत्सर्जन कितना हुआ था. (प्रतीकात्मक तस्वीर: Pixabay)


पहले गर्म हो गई थी पूरी पृथ्वी लेकिन

टीम के आंकड़ों से पता चला कि दक्कन ट्रैप के मैग्मा से बाहर निकलने वाले कार्बन डाइऑक्साइड इस बात की व्याख्या कर सकती है कि पृथ्वी पर दक्कन ज्वालामुखियों के शुरुआती दौर में वैश्विक तापमान तीन डिग्री गर्म हो गया था. लेकिन जब तक महाविनाश की घटना शुरू हुई थी तब तक तापमान कम हो गया था.

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ज्यादा कार्बन उत्सर्जन नहीं

इस पड़ताल के नतीजे इस मत का समर्थन करते हैं कि बाद में दक्कन मैग्मा ज्यादा मात्रा में कार्बन डाइऑक्साइड का उत्सर्जन नहीं कर रहे थे. इससे यह साबित होता है कि ज्वालामुखी कार्बन उत्सर्जन की डायनासोर के विनाश में प्रमुख भूमिका नहीं थी.

केवल सतह से ही नहीं निकलता कार्बन

इस अध्ययन की सहलेखिका सैली गिब्सन का कहना है कि ये नतीजे अहम हैं क्योंकि ये दर्शाते हैं कि बड़ी ज्वालामुखी घटनाओं से केवल सतह से ही कार्बन डाइऑक्साइड नहीं निकला बल्कि एक पूरा सिस्टम बन जाता है जाता है जिससे उत्सर्जन होता है. वहीं केवल ज्वालामुखी कार्बन उत्सर्जन ने महाविनाश की शुरुआत नहीं की होगी.

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शोधकर्ताओं ने पाया कि महाविनाश (Mass Extinction) के समय पर्याप्त मात्रा में कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जन नहीं हुआ था. (प्रतीकात्मक तस्वीर: Pixabay)


कार्बन डाइऑक्साइड का जमा होना

गिब्सन कैम्ब्रिज के अर्थ साइंस विभाग की प्रोफेसर है. उन्होंने आगे बताया कि उनकी टीम के आंकड़े उस  समय हमारे ग्रह की जलवायु और आवासीयता को रेखांकित करते हैं. टीम ने सैंकड़ों दक्कन ट्रैप लावा नमूनों और उनमें जमे कार्बन डाइऑक्साइड की मात्रा का अध्ययन किया. गिब्सन ने बताया कि आज के ज्वालामुखी के तेजी से ठंडे होते मैग्मा के क्रिस्टल में CO2 जमा होते हैं लेकिन दक्कन ट्रैप के मैग्मा नाजुक थे.

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हाल के एक शोध ने पता लगाया था कि क्रिटेशियस महाविनाश के एक लाख साल पहले ग्लोबल वार्मिंग की घटना हुई थी. कुछ वैज्ञानिकों ने दक्कन ट्रैप के उत्सर्जन को इस घटना से जोड़ा था. लेकिन बहस इस बात पर होती रही कि इनसे निकले लावा ने क्या वायुमंडल में इतनी कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जित की थी जिससे महाविनाश हो सका था. हैरानी की बात यह है कि इस दौरान निकला लावा बाद के निकले लावा से कम मात्रा का था, लेकिन बाद के लावा में कार्बन डाइऑक्साइड नहीं निकला था.
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