डेनमार्क के 300 साल पुराने घर, जिन्हें अब भविष्य का घर माना जा रहा है

डेनमार्क के 300 साल पुराने घर, जिन्हें अब भविष्य का घर माना जा रहा है
ये समुद्री शैवाल है जो काफी टिकाऊ और तापमान को नियंत्रित करने वाले हैं

डेनमार्क (Denmark) में घरों की छत जिस तरह से बनती है, उसमें न तो आग का डर रहता है और न ही भारी बारिश में पानी रिसने का.

  • News18Hindi
  • Last Updated: August 7, 2020, 3:59 PM IST
  • Share this:
डेनमार्क के द्वीप लइसो में घरों की छत काफी मोटी होती है. ध्यान से देखें तो ये किसी घासनुमा चीज से बनी दिखती है. ये समुद्री शैवाल है. ये काफी टिकाऊ और तापमान को नियंत्रित करने वाले हैं. माना जा रहा है कि भविष्य में काफी सारे घर इसी तरह से बनाए जा सकते हैं.

यूरोपियन देश डेनमार्क तब काफी चर्चा में आया था, जब इसे साल 2016 में दुनिया का सबसे खुशहाल देश कहा गया था. दुनिया के सबसे कम भ्रष्ट देशों में एक होना भी इसकी खुशहाली की एक वजह माना गया. वैसे डेनमार्क में यही नहीं, बल्कि कई बातें इसे सबसे अनोखा देश बनाती हैं. जैसे यहां के लइसो द्वीप में बने घरों पर समुद्री सेवार या शैवाल की छत. बीबीसी की रिपोर्ट के मुताबिक 17वीं सदी में इस द्वीप पर ये अनोखी शुरुआत हुई थी. असल में यहां पर समुद्र से नमक बनाने का उद्योग काफी फला-फूला. तब उद्योग धंधों के लिए तेजी से पेड़ काटे गए. ऐसे में घर बनाने के लिए लकड़ियों की आपूर्ति मुश्किल होने लगी. तभी ये तरीका निकाला गया.

द्वीप के रहनेवाले खुद ही इस तकनीक को दोबारा लाने की कोशिश में हैं (Photo-twitter)




समुद्र के बीचोंबीच बसा होने का एक फायदा इस द्वीप को मिला. बहुत बार जहाज या पोत समुद्र में किसी दुर्घटना का शिकार हो जाते और टूट-फूटकर द्वीप के तट से लग जाते. ऐसे में लोग इन लकड़ियों को जमा करके इनसे अपना घर बनाने लगे और छतों के लिए समुद्री शैवाल का इस्तेमाल करते. हालांकि साल 1920 के करीब समुद्री घास में लगे एक फंगल संक्रमण के कारण लोग इसका इस्तेमाल बंद करने लगे. धीरे-धीरे ये घर इतने कम हो गए कि आज 1800 लोगों की आबादी वाले द्वीप पर सिर्फ 36 ऐसे घर हैं, जिनकी छतें शैवालों से बनी हैं.
ये भी पढ़ें: लेबनान पर क्यों एक के बाद एक मुसीबतें आ रही हैं?

द्वीप में साल 2012 से दोबारा इस तकनीक को जिंदा किया जा रहा है. इस बारे में बीबीसी की एक रिपोर्ट में विस्तार से बताया गया है. द्वीप के रहनेवाले खुद ही इस तकनीक को दोबारा लाने की कोशिश में हैं. वे घूम-घूमकर लोगों को बताते और अगर पक्की छत न बनी हो तो उसे समुद्री शैवाल की तकनीक से बनाने की बात करते हैं.

समुद्री शैवाल की एक खास किस्म का इसमें इस्तेमाल होता है, जिसे ईलग्रास कहते हैं


वैसे इस आविष्कार के लिए द्वीप की महिलाओं श्रेय दिया जाता है. नाविक जहाज लेकर समुद्र में निकला करते, वहीं महिलाएं घरों को टिकाऊ बनाने के तरीके खोजा करती थीं. उसी दौरान 17वीं सदी में इस छत का निर्माण हुआ. एक साथ 40 से 50 महिलाएं छत बनाने के काम में लगती थीं. सबसे पहले वे समुद्री तूफान के बाद किनारे आई शैवाल जमा करतीं. इसके बाद एक अहम काम था शैवाल को सुखाना. इकट्ठा किए शैवाल को लगभग 6 महीनों के लिए मैदान में सुखाया जाता था. इससे शैवाल ज्यादा मजबूत हो जाती थी. तब इसे छत पर बिछाया जाता था. एक छत 35 से 40 टन तक वजनी होती थी.

ये भी पढ़ें: क्यों पेड़ लगाने के कारण लेबनान पर भड़का हुआ है इजरायल? 

समुद्री शैवाल की एक खास किस्म का इसमें इस्तेमाल होता है, जिसे ईलग्रास कहते हैं. सारी दुनिया के समुद्री तटों पर जमा हो जाने वाली ये शैवाल काफी खास मानी जा रही है. इसकी वजह ये है कि ये आग नहीं पकड़ती, न ही इसमें जंग लग सकती है और न ही इनमें किसी तरह के कीड़े लगने का डर रहता है. ये कार्बन डाइऑक्साइड को अवशोषित कर लेती है, इस तरह से घरों में रहने वालों को किसी एयर प्यूरिफायर की जरूरत नहीं होती है.

लइसो की ये खूबी अब कई देशों का ध्यान खींच रही है


ये इतनी मोटी होती हैं कि पूरी तरह से वाटरपप्रूफ हैं, जबकि सीमेंट या लोहे से बने अच्छे से अच्छे घरों में भी ज्यादा बारिश में सीलन या पानी रिसने की समस्या हो जाती है. समुद्री शैवाल से बनी इन छतों की एक और खासियत है- ये 100 या उससे भी ज्यादा सालों तक चलते हैं. द्वीप पर जितने भी घरों में ये शैवाल हैं, वे 300 साल से भी ज्यादा पुराने हैं, जबकि कंक्रीट से बनी छतों को 50 सालों बाद मेंटेनेंस की जरूरत पड़ ही जाती है.

ये भी पढ़ें: क्या है कन्फ्यूशियस संस्थान, जो भारत में चीन का एजेंट बना हुआ है 

लइसो की ये खूबी अब कई देशों का ध्यान खींच रही है. मिसाल के तौर पर अमेरिकी वास्तुविद कैथरीन लार्सन अब शैवाल से बनी इन छतों पर रिसर्च कर रही हैं. उनका मानना है कि अगर ये तकनीक इस्तेमाल की जाए तो न केवल ग्लोबल वार्मिंग जैसी समस्या कम होगी, बल्कि रहनेवालों को भी काफी फायदा होगा.
अगली ख़बर

फोटो

टॉप स्टोरीज