2 साल में क्यों दोगुने हो गए देशद्रोह के मामले

इस मामले में 13 जनवरी की तिथि फैसले की निर्धारित की गई है. (File Photo)

देशद्रोह के मामलों (Sedition Cases) की संख्या हर साल बढ़ती जा रही है. 2016 में देशद्रोह के 35 मामले दर्ज किए गए. 2017 में ये बढ़कर 51 हो गए. वहीं 2018 में इनकी संख्या बढ़कर 70 हो गई..

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    पिछले 2 वर्षों में देशद्रोह के मामले (Sedition Cases) दोगुने हो गए हैं. नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो  (NCRB) के नए आंकड़ों के मुताबिक 2016 में देशद्रोह के 35 मामले दर्ज किए गए थे, जो 2018 में बढ़कर 70 हो गए. जम्मू-कश्मीर में देशद्रोह के मामलों में तेजी आई है. 2017 में जम्मू कश्मीर में देशद्रोह का सिर्फ एक मामला दर्ज हुआ था, जबकि 2018 में ऐसे 12 मामले दर्ज किए गए.

    देशद्रोह के मामले में झारखंड नंबर 1
    देशद्रोह के मामलों में झारखंड पहले नंबर पर है. एनसीआरबी के डाटा के मुताबिक यहां देशद्रोह के 18 मामले दर्ज हुए हैं. असम देशद्रोह के आरोपियों की संख्या के मामले में नंबर वन है. यहां दर्ज 17 मामलों में 27 लोगों को आरोपी बनाया गया. झारखंड और असम के अलावा जम्मू-कश्मीर, केरल और मणिपुर देशद्रोह के मामलों में टॉप 5 राज्यों में हैं.

    हर साल बढ़ते जा रहे हैं देशद्रोह के मामले
    देशद्रोह के मामलों की संख्या हर साल बढ़ती जा रही है. 2016 में देशद्रोह के 35 मामले दर्ज किए गए. 2017 में ये बढ़कर 51 हो गए. वहीं 2018 में इनकी संख्या बढ़कर 70 हो गई. देशद्रोह के मामलों में तेजी आई है लेकिन ‘राज्यों के खिलाफ अपराध’ जैसे दूसरे सेक्शन के मामलों में कमी आई है. 2016 में ऐसे मामलों की संख्या 178 थी. 2017 में ऐसे 160 मामले दर्ज किए गए जबकि 2018 में इनकी संख्या घटकर 149 रह गई.

    देशद्रोह के मामलों में सजा की दर काफी कम
    देशद्रोह के मामले दर्ज जरूर किए जाते हैं. लेकिन कम ही मामलों में अपराध साबित होता है. 2014 से 2016 के बीच देशद्रोह के 112 मामले दर्ज किए गए. लेकिन सिर्फ 2 आरोपियों को ही दोषी ठहराया जा सका. इसी तरह से 2017 में देशद्रोह के 51 मामले दर्ज किए गए लेकिन सिर्फ 4 आरोपियों को ही दोषी ठहराया जा सका.

    ऐसे मामलों में पुलिस के चार्जशीट दायर करने की दर तक कम है. 2014 में एनसीआरबी ने पहली बार देशद्रोह के मामलों को अलग से रजिस्टर करना शुरू किया. 2015 में पुलिस देशद्रोह के सिर्फ 4 मामलों में चार्जशीट दाखिल कर पाई. वहीं 2016 में 16 मामलों में पुलिस ने चार्जशीट दाखिल की.

    देशद्रोह के कानून को खत्म करने पर बहस
    देशद्रोह के कानून को खत्म करने पर बहस चलती रही है. खासकर पिछले कुछ वर्षों में जब देशद्रोह के मामलों में तेजी आई है तो विपक्षी दलों ने इसे खत्म करने की बहस छेड़ दी है. 2018 में लॉ कमीशन ने अपनी रिपोर्ट में इस पर विचार करने की बात कही थी. हालांकि राज्यसभा में इस पर जवाब देते हुए सरकार ने कहा कि देशद्रोह के कानून को खत्म करने की कोई आवश्यकता नहीं है. एंटी नेशनल, घृणा फैलाने वाले और आतंकी विचारधारा वाले लोगों से निपटने के लिए ये कानून जरूरी है.

    2019 के लोकसभा चुनाव में देशद्रोह चुनावी मुद्दा भी बना. कांग्रेस ने अपने घोषणापत्र में वादा किया कि अगर उनकी सरकार आती है तो देश से देशद्रोह का कानून खत्म कर दिया जाएगा. बीजेपी ने कांग्रेस के इस वादे की तीखी आलोचना की थी.

    sedition cases in india ncrb new data shows number of cases doubled in two years
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    क्या होता है देशद्रोह?
    इंडियन पीनल कोड के सेक्शन 124ए में देशद्रोह को परिभाषित किया गया है. सेक्शन 124ए के मुताबिक अगर कोई आदमी शब्दों से, बोलकर, लिखित या फिर किसी तरह के निशान के जरिए घृणा फैलाता है या घृणा फैलाने की कोशिश करता है और भारत में कानून द्वारा स्थापित सरकार के खिलाफ विद्रोह या उत्तेजना फैलाने की कोशिश करता है, तो इसे देशद्रोह का मामला माना जाएगा. हालांकि अगर बिना घृणा फैलाए या घृणा फैलाने की कोशिश किए, सिर्फ विरोध में बयान दिया जाता है, तो ये देशद्रोह के दायरे में नहीं आएगा.

    देशद्रोह में कितनी सजा का है प्रावधान
    देशद्रोह गैरजमानती अपराध है. दोषी पाए जाने पर आईपीसी के सेक्शन 124ए के तहत तीन साल की कैद से लेकर आजीवन कारावास की सजा सुनाई जा सकती है. अगर कोई शख्स देशद्रोह का दोषी घोषित होता है तो उसे सरकारी नौकरी करने का अधिकार नहीं होगा. उसका पासपोर्ट जब्त कर लिया जाएगा. उसे जब भी जरूरत होगी कोर्ट के सामने प्रस्तुत होना पड़ेगा.

    कैसे आया देशद्रोह का कानून
    ये अंग्रेजों के जमाने का कानून है. सबसे पहले ब्रिटिश शासन में थॉमस मैकाले ने इस कानून को ड्राफ्ट किया था. हालांकि 1860 में आईपीसी आने के बाद इसे हटा दिया गया. 1870 में इसे आईपीसी में फिर शामिल किया गया. सर जेम्स स्टीफन ने संशोधन करके देशद्रोह के सेक्शन को आईपीसी में जोड़ा. उस वक्त इसे अंग्रेज सरकार का काला कानून कहा जाता था. इस कानून को आधार मानकर ब्रिटिश सरकार ने भारतीय नागरिकों पर बेइंतिहा अत्याचार किए.

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