पर्यावरण को कैसे नुकसान पहुंचा रहीं आपकी बेवजह की सेल्फियां

मज़े में सेल्फी खींचना आपके लिए आसान बात होगी लेकिन पर्यावरण को ये छोटी-छोटी सेल्फी बड़ा नुकसान पहुंचा रही हैं, ये आप नहीं जानते. पढ़िए कैसे दुगनी-तिगुनी रफ्तार से बढ़ता डाटा पर्यावरण के लिए खतरनाक है.

Samarth Saraswat
Updated: July 8, 2019, 2:35 PM IST
पर्यावरण को कैसे नुकसान पहुंचा रहीं आपकी बेवजह की सेल्फियां
मज़े में सेल्फी खींचना आपके लिए आसान बात होगी लेकिन पर्यावरण को ये छोटी-छोटी सेल्फी बड़ा नुकसान पहुंचा रही हैं, ये आप नहीं जानते. पढ़िए कैसे दुगनी-तिगुनी रफ्तार से बढ़ता डाटा पर्यावरण के लिए खतरनाक है.
Samarth Saraswat
Updated: July 8, 2019, 2:35 PM IST
सेल्फी को लेकर दीवानगी का आलम ये हैं कि भारत में पहली बार इससे बीमार होने के मामले सामने आने लगे हैं. हालिया सालों में ऐसे कई केस सामने आए हैं. सेल्फी से जुड़ी बीमारी को ऑब्सेसिव कंप्लसिव डिसऑर्डर नाम दिया गया है. लेकिन क्या आप जानते हैं कि आपकी बेवजह खींची गईं ये सेल्फियां आपके साथ-साथ पर्यावरण पर भारी पड़ रही है. इन सेल्फियों के चलते कार्बन उत्सर्जन बढ़ रहा है और इसके चलते कई दुनिया को कई समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है.

स्मार्टफोन आने के बाद से लोगों में फोटो खींचने क्रेज बढ़ गया है. एक रिपोर्ट के मुताबिक साल 2000 तक दुनिया में 85 अरब फोटो खींचे गए. लेकिन एक दशक के अंदर ये तादाद कई गुना बढ़ गई. 2013 में दुनियाभर में 3.5 लाख करोड़ फोटो खींचे गए. अनुमान के मुताबिक आने वाले समय में ये तादाद दोगुनी बढ़कर 7 लाख करोड़ तक पहुंच जाएगी.





2 अरब से ज्यादा स्मार्टफोन यूजर्स

ताजा रिपोर्ट्स के मुताबिक दुनियाभर में 2 अरब से ज्यादा स्मार्टफोन यूजर्स हैं. जबकि 2014 की रिपोर्ट के मुताबिक 4.4 अरब लोगों के पास साधारण कैमरे वाले फोन हैं. 90% लोग अपने मोबाइल से फोटो लेते हैं. इससे अंदाज़ा लगाया जा सकता है कितनी बड़ी संख्या में लोग अपनी इस तस्वीरों को सोशल मीडिया पर अपलोड करते होंगे.

कहां सेव होते हैं फोटो?
सोशल मीडिया पर अपलोड होने वाली सेल्फियों और दूसरी तस्वीरों से बड़ी तादाद में डाटा जनरेट हो रहा है. फेसबुक, इंस्टाग्राम, स्नैपचैट जैसी साइटों पर अपलोड होने वाले डाटा को स्टोर करने की डाटा सेंटर की ज़रूरत पड़ती है.
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लाखों की संख्या में हर रोज़ सोशल मीडिया साइट्स पर फोटो अपलोड होते हैं और भले ही कुछ देर बाद ही यूजर्स टाइमलाइन से गायब होते हैं. लेकिन कहीं न कहीं ये डाटा सेव होता है. एनालिटिक्स मैगज़ीन की 2012 की रिपोर्ट के मुताबिक सभी सेंटर में स्टोर होने वाला 80% डाटा फोटो-वीडियो के रूप में होता है.

डाटा सेंटर से बढ़ती बिजली खपत
सिएना के मुताबिक दुनियाभर में करीब 7500 डाटा सेंटर हैं. 2018 तक 21% ग्रोथ के साथ और डाटा सेंटर खुलेंगे. इन्हीं डाटा सेंटरों में फेसबुक, गूगल, अमेज़न और माइक्रोसॉफ्ट जैसी बड़ी-बड़ी कंपनियों का डाटा सेव होता है. हालांकि ये कंपनियां पूरे डाटा का सिर्फ 1% हिस्से का प्रतिनिधित्व करती हैं.



इन डाटा सेंटरों की बात करें तो यहां दुनिया के कुल बिजली उत्पादन के 3% हिस्सा की खपत होती है. साल 2020 तक इन डाटा सेंटरों को करीब 140 अरब किलोवॉट प्रतिघंटे सालाना बिजली चाहिए होगी. इतनी बिजली के लिए 50 पॉवर प्लांट की ज़रूरत होगी.

बढ़ता कार्बन उत्सर्जन
डाटा सेंटरों के लिए 24*7 घंटे बिजली की आवश्यकता होती है. 2020 तक डाटा सेंटरों को सालाना 140 अरब किलोवॉट चाहिए होगा. इसका मतलब 50 पॉवर प्लांट्स की ज़रूरत. इतने पावर प्लांट कुल 100मी. मैट्रिक टन कार्बन का उत्सर्जन करेंगे, जो पर्यावरण के लिए बेहद नुकसानदायक है. फोटो और वीडियो बनाना आपको बेशक मज़ेदार लगे लेकिन आने वाले वक्त में ये हम इंसानों के लिए ही ख़तरनाक साबित होता जा रहा है.
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