कांग्रेस नेता मणिशंकर अय्यर ने बताया, क्यों नहीं मिला पायलट और सिंधिया को सीएम का पद

कांग्रेस नेता मणिशंकर अय्यर ने बताया, क्यों नहीं मिला पायलट और सिंधिया को सीएम का पद
सचिन पायलट और ज्योतिरादित्य सिंधिया

कांग्रेस (Congress Party) के अनुभवी नेता और केंद्रीय मंत्री रह चुके मणिशंकर अय्यर (Mani Shankar Aiyar) ने एक लेख में जाहिर किया है कि सचिन पायलट (Sachin Pilot) और ज्योतिरादित्य सिंधिया (Jyotiraditya Scindia) का जाना कांग्रेस के लिए कैसा झटका रहा है. लेकिन उन्होंने ये भी बताया कि कि पार्टी ने उन दोनों को कैसे तैयार किया और वो यहां तक पहुंचे और क्या वजह थी कि वो मुख्यमंत्री का पद नहीं पा सके.

  • Share this:
मणिशंकर अय्यर सीनियर कांग्रेस लीडर हैं. उन्होंने सचिन पायलट और उससे ज्योतिरादित्य सिंधिया को लेकर एक लेख में खुलकर अपने विचार जाहिर किए हैं. उनका कहना है कि कांग्रेस ने सिंधिया और पायलट को तब तैयार किया, जब वो उम्र के दूसरे दशक में पार्टी में आए थे. तब से पार्टी ने उन्हें लगातार आगे बढ़ाया. उन्हें पद दिए. उन्हें सींचा. उनका पार्टी छोड़कर जाना क्यों ठीक नहीं है. उन्होंने ये भी बताया कि आखिर क्यों सचिन पायलट और ज्योतिरादित्य सिंधिया को मुख्यमंत्री का पद नहीं मिल सका.

अय्यर ने अंग्रेजी के राष्ट्रीय दैनिक इंडियन एक्सप्रेस में एक लेख लिखा है. जिसमें उन्होंने सचिन पायलट के विद्रोही तेवर अपनाने पर लिखा है. बकौल उनके, सचिन को पार्टी ने हमेशा आगे बढ़ाया है. नए मौके दिए हैं. यकीनन उनमें योग्यता की कोई कमी नहीं लेकिन उनको कुछ इंतजार करना चाहिए था. कम से कम वो पार्टी की मंशा पर सवाल नहीं खड़ा कर सकते.

वो लेख की शुरुआत इन शब्दों से करते हैं, "ये राहुल गांधी के लिए एक त्रासदी है. जिन लोगों को उन्होंने पसंद किया वो अब उन्हें धोखा दे रहे हैं. जिन लोगों को उन्होंने कम चाहा वो अब भी उनके साथ हैं..."



राहुल के दो बेस्ट फ्रेंड थे - सिंधिया और पायलट
अय्यर लिखते हैं, जब राहुल गांधी वर्ष 2004 में संसद में पहली बार आए तो उनके दो सबसे अच्छे दोस्त थे--ज्योतिरादित्य सिंधिया और सचिन पायलट. वो हमेशा उनके नजदीक रहे. याद करिये राहुल की वो बात कि केवल सिंधिया ही हैं जो उनके घर कभी और किसी भी समय आ सकते हैं. उनकी इस कदर नजदीकी थी सिंधिया से. इस नजदीकी ने कांग्रेस में पुरानी पीढ़ी बनाम नई पीढ़ी की बात शुरू की. पार्टी में कुछ और युवा नेता भी थे जो अपनी महत्वाकांक्षाओं और उपलब्धियों को लेकर विनम्र थे."

अय्यर ने एक लेख में लिखा कि कांग्रेस ने पग-पग पर सचिन पायलट को आगे बढ़ाया. उन्हें


बकौल अय्यर, करीबियों से नेहरू-गांधी को लगते रहे हैं झटके
बकौल मणिशंकर, "ऐसे हालात का सामना नेहरू-गांधी परिवार ने हमेशा किया है. ऐसा ही नेहरू के साथ हुआ. फिर इंदिरा गांधी को भी ऐसे हालात से गुजरना पड़ा. फिर राजीव गांधी ने ऐसी स्थितियों का सामना किया. उनके सबसे पसंदीदा मिनिस्टर विश्वनाथ प्रताप सिंह थे. वहीं सिंधिया और पायलट की तरह थे आरिफ मोहम्मद खान और ताकतवर कजिन अरुण नेहरू. दोनों वीपी सिंह के साथ चले गए. पहले जनमोर्चा बनाया फिर राष्ट्रीय मोर्चा सरकार में शामिल हुए. हालांकि ये सरकार जल्दी ही ढह गई. हालांकि कांग्रेस से जाने वालों का भविष्य आमतौर पर अल्पजीवी ही रहा है."

ये भी पढ़ें- इस्लाम की दुहाई, जिन्ना का ऑफर ठुकराने वाले इस फौजी की अंत्येष्टि में शामिल हुए थे नेहरू

क्या वाकई सिंधिया और पायलट के साथ अन्याय हुआ
"पायलट और सिंधिया कह रहे हैं कि उनके साथ अन्याय हुआ. मीडिया भी उन्हीं के सुर में गा रहा है. ठीक है कांग्रेस के लिए झटका है लेकिन वो अपने आंसू पोंछ लेगी और फिर जाने वाले और उनका भाग्य. गांधी परिवार के लिए ये पहले से कहीं ज्यादा ऐसा कठिन समय है, जो उन्होंने पहले कभी नहीं देखा. कांग्रेस इस तरह सिमटती हुई भी नहीं दिखी है लेकिन इसका मतलब ये नहीं कि रुकें या घबरा जाएं."

क्यों नहीं मिला पायलट और सिंधिया को सीएम पद
"बेशक पायलट ने मेहनत की. उन्होंने विधानसभा चुनावों में जीत हासिल (हालांकि ये जीत बिल्कुल मुहाने तक ही पहुंच पाई थी) करके दिखाया. उन्हें मुख्यमंत्री का पद इसलिए नहीं मिला कि वो युवा हैं और ना ही सिंधिया को इसलिए कि उनमें बालसुलभता या युवा जोश ज्यादा था. बल्कि इसलिए क्योंकि गहलोत के पास नंबर्स यानि ज्यादा लोग थे और सिंधिया चुनाव से पहले ही चल रही सियासी गतिविधियों में हारे और कमलनाथ जीत गए."

बकौल अय्यर, वर्ष 2004 में जब राहुल गांधी ने पहली बार संसद में कदम रखा तो उनके दो बेस्ट फ्रेंड थे सचिन पायलट और ज्योतिरादित्य सिंधिया. दोनों उनसे अलग हो चुके हैं


जिस पार्टी ने उन्हें तैयार किया, उससे ऐसा सलूक 
इस लेख में उन्होंने कहा, " जिस पार्टी ने सचिन और ज्योतिरादित्य को तैयार किया, उससे बदला लेने की भावना उचित नहीं. हालांकि वो कोई भी कदम उठाने के लिए आजाद है लेकिन अगर खुद को परिस्थितियों और समय के हिसाब से कुछ लचीला या तैयार करते तो यकीनन उनका भविष्य वाकई कांग्रेस में बेहतर होता. राहुल व सोनिया भी उन्हें आगे बढ़ाते.आखिर वो खुद सोचें जब वो कांग्रेस में आए तो उम्र के दूसरे या तीसरे दशक में थे, तब से अब तक पार्टी ने पग-पग पर उनका कितना साथ दिया और बढ़ाया. अब वो मिडिल एज में आए तो उसी हाथ को काटने में लग गए, जो उनकी छत्रछाया बना."

ये भी पढ़ें - जानिए रूसी विमान में यात्रियों को क्यों खोलने पड़े छाते

पायलट को कब क्या मिला 
अय्यर के अनुसार, " सचिन ने पार्टी तब ज्वाइन की जब उनके पिता का निधन एक रोड एक्सीडेंट में हो गया. तब वो 23 साल के थे. 26 साल की उम्र में दौसा की उस सीट से सांसद बने, जहां उनकी मां मेंबर ऑफ पार्लियामेंट थीं. 32 साल की उम्र में केंद्रीय मंत्री बन गए. मैने उन्हें संसद में कंपनी एक्ट के मामलों में अगुवाई करते देखा है. 36 साल की उम्र में वो राजस्थान प्रदेश कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष बने. 40 साल की उम्र में डिप्टी सीएम बन गए. इसमें कोई शक नहीं उनमें अपार योग्यता है और ऊपर पहुंचने का माद्दा भी."

क्या प्रतिकूल हालात में टिकने का माद्दा कम है
"ज्योतिरादित्य सिंधिया की कहानी भी कुछ ऐसी ही है. शायद उनकी अपब्रिंगिग ऐसी रही कि प्रतिकूल हालात में टिक नहीं पाए. राजनीति में जब हम जीतते हैं तो ये बच्चों का खेल लगता है. लेकिन खराब समय भी कुछ सिखाने के लिए ही आता है."
"कांग्रेस के लिए ये सबक है कि हमें उन नेताओं के सिर पर हाथ रखे रखना चाहिए जिन पर पार्टी विश्वास रखती हो.

गांधी परिवार के लिए कठिन समय 
अय्यर ने लेख में माना कि ये समय मुश्किल है, "गांधी परिवार और कांग्रेस के लिए ये कठिन समय है. पार्टी के नेताओं को भी समझना होगा कि जगह और अवसर कम हैं. महत्वाकांक्षाओं और दूसरी बातों को जगह देने के मौके कम हो चुके हैं. नेतृत्व युवा और पुराने के आधार या 'टैलेंट है' या 'टैलेंट नहीं' के आधार पर तय नहीं होता बल्कि कांग्रेस की नीतियों और कार्यक्रमों के आधार पर तय होता है."
अगली ख़बर

फोटो

टॉप स्टोरीज

corona virus btn
corona virus btn
Loading