शशि थरूर का सिर फटा, चुनाव प्रचार के दौरान इन दो प्रधानमंत्रियों के साथ भी हो चुका है हादसा

शशि थरूर को सिर में 8 टांके लगे हैं. अस्पताल के अधिकारियों ने जानकारी दी कि उनकी हालत स्थिर है और वह खतरे के बाहर है. रिपोर्ट के अनुसार जल्द ही थरूर की कुछ जांच की जाएगी.

News18Hindi
Updated: April 15, 2019, 12:39 PM IST
शशि थरूर का सिर फटा, चुनाव प्रचार के दौरान इन दो प्रधानमंत्रियों के साथ भी हो चुका है हादसा
शशि थरूर (फोटो- ट्विटर)
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Updated: April 15, 2019, 12:39 PM IST
कांग्रेस सांसद और तिरुवनंतपुरम से उम्मीदवार मंदिर में पूजा के दौरान शशि थरूर घायल हो गए हैं. सोमवार को थम्प नूर के गांधारी अम्मन कोविल में संतुलन बिगड़ने के बाद थरूर के सिर और पैर में चोट आई है. उन्हें तुरंत नजदीकी जनरल अस्पताल ले जाया गया. प्राथमिक जांच के बाद, उन्हें तिरुवनंतपुरम के सुपर-स्पेशियलिटी अस्पताल में ट्रांसफर कर दिया गया.

इससे पहले भी, कजाककुट्टम निर्वाचन क्षेत्र में चुनाव प्रचार करने से पहले, थरूर ने 11 अप्रैल को मंदिर में तुलभारम किया था. तुलभारम एक खास पूजा होती है जिसमें अपने वजन के बराबर चढ़ावा चढ़ाया जाता है. वजन तौलने के लिए मंदिरों में मशीने लगी होती हैं.

वैसे आपने एक अफवाह जरूर सुनी होगी कि पूर्व प्रधानमंत्री स्वर्गीय इंदिरा गांधी ने अपनी नाक की प्लास्टिक सर्जरी कराई थी. लेकिन ये सच्चाई नहीं है. हां ये जरूर हुआ था कि एक जनसभा में इंदिरा पर ईंट फेंकी गई. वो सीधे आकर उनके नाक पर लगी और खून बहने लगा. इसके बाद भी वो नाक से रूमाल से दबाकर भाषण देती रहीं. इसके बाद कोलकाता में भी जाकर जनसभा को संबोधित किया. बाद में उनकी नाक का आपरेशन करना पड़ा था.

ये फरवरी 1967 के चुनावों की बात है. प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी घूम घूमकर देशभर चुनाव प्रचार कर रही थीं. हालांकि उस समय भी देश में ज्यादातर लोगों को भ्रम था कि इंदिरा इतनी सुकोमल हैं कि देश के प्रधानमंत्री का भार नहीं उठा सकतीं. लेकिन वो लगातार ऐसी बातों को गलत साबित कर रहीं थीं.

1967 के चुनावों में वो देश के दूरदराज के हिस्सों में गईं. लाखों लोग खुद ब खुद उनका भाषण करने के लिए इकट्ठा होते थे.

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भुवनेश्वर में उन पर फेंकी गई थी ईंट 
ऐसे ही चुनाव प्रचार के सिलसिले में जब वो ओडिशा की राजधानी भुवनेश्वर गईं, तो वहां भीड़ में कुछ उपद्रवी भी थे. जिसके कारण भीड़ को नियंत्रण में रखना आयोजकों के लिए मुश्किल हो गया. वो बोल ही रही थीं कि उपद्रवियों ने पथराव शुरू कर दिया.

इंदिरा गांधी (फाइल फोटो)


एक ईंट का टुकड़ा आकर उनकी नाक पर लगा. खून बहने लगा. सुरक्षा अधिकारी उन्हें मंच से हटा ले जाना चाहते थे. स्थानीय कांग्रेस कार्यकर्ता अनुरोध करने लगे कि वो मंच के पिछले हिस्से में जाकर बैठ जाएं. मगर इंदिरा ने किसी की नहीं सुनी.

खून से डूबी नाक रूमाल से दबाकर खड़ी रहीं 
वो खून से डूबी नाक को रूमाल से दबाए निडरता से क्रुद्ध भीड़ के सामने खड़ी रहीं. उन्होंने उपद्रवियों को फटकारते हुए कहा, ये मेरा अपमान नहीं है बल्कि देश का अपमान है. क्योंकि प्रधानमंत्री होने के नाते मैं देश का प्रतिनिधित्व करती हूं. इस घटना से सारे देश को गहरा झटका लगा.

फिर कोलकाता में भी भाषण दिया 

इस घटना के बाद उनके स्टाफ और सुरक्षाकर्मियों ने उनसे दिल्ली लौटने का अनुरोध किया लेकिन उन्होने इसे भी नहीं माना. वो अगली जनसभा के लिए कोलकाता रवाना हो गईं. उन्होंने टूटी नाक पर पट्टी लगवा कोलकाता में लोगों के सामने भाषण दिया.

इंदिरा गांधी 1967 में (फाइल फोटो)


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दिल्ली में हुई नाक की सर्जरी 
जब वो दिल्ली लौटीं तो पता लगा उनके नाक को खासी चोट आई है. इसका आपरेशन करना होगा. बेहोश करके उनकी नाक का आपरेशन किया गया.

हालांकि बाद में वो मजाक में कहती थीं कि मुझे तो लग रहा था कि डॉक्टर प्लास्टिक सर्जरी करके मेरी नाक को सुंदर बना देंगे. आप तो जानते ही हैं कि मेरी नाक कितनी लंबी है लेकिन इसे खूबसूरत बनाने का एक मौका हाथ से निकल गया. कमबख्त डॉक्टरों ने कुछ नहीं किया. मैं वैसी की वैसी ही रह गई.

राजीव गांधी की हो गई थी हत्या
 21 मई 1991 को राजीव गांधी को देशवासियों ने वक्त से पहले खो दिया था. श्रीपेंरबदूर में राजीव गांधी की हत्या चुनाव प्रचार के दौरान एक धमाके में हुई थी. श्रीलंका के आतंकी संगठन लिट्टे ने उनकी हत्या करवाई थी. लिट्टे राजीव गांधी के श्रीलंका सरकार को संगठन के खिलाफ सैन्य मदद देने से नाराज था.

अभी तक तमिलनाडु की जेलों में बंद आरोपी करीब 27 साल जेलों में काट चुके हैं. हालांकि, इन आरोपियों को गांधी-नेहरू परिवार पहले ही माफ कर चुका है.

इस मामले में लगभग एक हजार गवाहों के लिखित बयान, 288 गवाहों से जिरह, 1477 दस्तावेजों जिनके कुल पन्नों की संख्या 10000 से ज्यादा थी, 1,180 नमूनों, सबूतों और वकीलों के हजारों तर्कों के बाद विशेष न्यायालय ने सभी 26 दोषियों को हत्या और षड्यंत्र का दोषी पाया. उसने वर्ष 1998 में सबको मौत की सजा सुना दी. सर्वोच्च न्यायालय ने माना कि विशेष अदालत का फैसला न्याय नहीं बल्कि ‘न्यायिक नरसंहार’ है और 1999 में इन 26 में से 19 लोगों को रिहा कर दिया था.

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