पुण्यतिथि: शेख अब्दुल्ला- कश्मीर का वो शेर, जिसपर बगावत का लगा था इलजाम

पुण्यतिथि: शेख अब्दुल्ला- कश्मीर का वो शेर, जिसपर बगावत का लगा था इलजाम
शेख अब्दुल्ला को कश्मीर-साजिश के आरोप में लगभग 11 सालों के लिए जेल में डाल दिया गया- सांकेतिक फोटो

कश्मीर के चहेते लीडर शेख अब्दुल्ला (Sheikh Abdullah) को साजिश (Kashmir Conspiracy) के आरोप में लगभग 11 सालों के लिए जेल में डाल दिया गया. उनपर आरोप था कि वे आजाद कश्मीर चाहते हैं.

  • News18Hindi
  • Last Updated: September 8, 2020, 1:56 PM IST
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कश्मीर के देश से विलय में शेख अब्दुल्ला का बड़ा हाथ रहा. आज शेरे-कश्मीर कहलाने वाले इस नेता की पुण्यतिथि है. आजादी के तुरंत बाद शेख अब्दुल्ला उन चुनिंदा नेताओं में थे, जो कश्मीर को भारत से मिलाने पर यकीन रखते थे. हालांकि इसके बाद भी कश्मीर साजिश के आरोप में उन्हें 11 साल जेल की सलाखों के पीछे बिताने पड़े. तब उन्हें कश्मीर से तीन हजार किलोमीटर दूर तमिलनाडु में हाउस अरेस्ट रखा गया था. इसके पीछे कई किस्से-कहानियां चलती हैं. जानिए, कौन था कश्मीर का ये शेर और भारत से कश्मीर के विलय में क्या भूमिका रही.

शेख अब्दुल्ला का जन्म 5 दिसंबर, 1905 को श्रीनगर के पास स्थित सौरा में हुआ था. इस समय आम कश्मीरी गरीबी से जूझ रहे थे. वहीं शेख अब्दुल्ला का परिवार व्यापार से जुड़ा था इसलिए उन्हें पढ़ने-लिखने का मौका मिला. उन्होंने लाहौर और अलीगढ़ में पढ़ाई की. अलीगढ़ से साल 1930 में फिजिक्स में मास्टर्स की डिग्री हासिल करने के बाद वे श्रीनगर वापस लौट आए. इस समय तक जम्मू एवं कश्मीर रियासत के महाराजा हरि सिंह ने बहुसंख्यक कश्मीरी मुसलमानों पर जुल्म बढ़ा दिए थे.

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ये देखते हुए शेख अब्दुल्ला ने पढ़े-लिखे अवाम को इकठ्ठा करना शुरू किया और उनके भीतर राजनीतिक और सामाजिक चेतना जगाने की बात की. इसी तरह की कोशिशों से आखिरकार साल 1932 में मुस्लिम कांफ्रेंस नाम का संगठन बना. साल 1938 में संगठन का नाम ‘मुस्लिम कांफ्रेंस’ से बदलकर ‘नेशनल कांफ्रेंस’ कर दिया था.
Sheikh Abdullah
कश्मीर के चहेते लीडर शेख अब्दुल्ला जनता को संबोधित करते हुए


गैर-सांप्रदायिक और मुद्दों से जुड़ा होने के कारण इससे लोग जुड़ते चले गए. जल्दी ही फिजिक्स पढ़ा-लिखा ये युवक कश्मीर में लोकप्रिय हो गया. नए आए युवक को इतना चर्चित होता देख तत्कालीन राजा को डर होने लगा. साल 1946 में शेख अब्दुल्ला ने जम्मू- कश्मीर में महाराजा हरि सिंह के खिलाफ ‘कश्मीर छोड़ो’ आंदोलन चलाया. तब महाराजा ने उन्हें जेल में डाल दिया.

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बाद में पंडित जवाहरलाल नेहरू की कोशिशों से शेख अब्दुल्लाह जेल से रिहा हो गए और साल 1948 में वे तत्कालीन जम्मू-कश्मीर के प्रधानमंत्री बना दिए गए. बता दें कि तब कश्मीर में मुख्यमंत्री की जगह प्रधानमंत्री शब्द का इस्तेमाल किया जाता था. इस तरह से कश्मीरियों का ये चहेता नेता आखिरकार अपने लोगों के लिए काम करने लगा. लेकिन वक्त ने दोबारा पलटा खाया. करीब पांच साल उनकी सरकार को बहुमत न होने का आरोप लगाते हुए गिरा दिया गया. अब्दुल्ला ने सदन में बहुमत साबित करने के लिए गुहार लगाई लेकिन उन्हें इसका मौका नहीं दिया गया. शेख अब्दुल्ला की कैबिनेट के हिस्सा रहे बख्शी गुलाम मोहम्मद को कश्मीर का प्रधानमंत्री नियुक्त कर दिया गया. इसके कुछ ही दिनों बाद शेख अब्दुल्ला को कश्मीर-साजिश के आरोप में लगभग 11 सालों के लिए जेल में डाल दिया गया.

Sheikh Abdullah
पंडित जवाहरलाल नेहरू के साथ शेख अब्दुल्ला की दोस्ती थी, जो कश्मीर मसले पर तल्ख होने लगी


इस आरोप के पीछे एक वजह ये भी रही कि वे पाकिस्तान को कश्मीर पर दावा करने से रोकने के लिए पाकिस्तान के शासक जनरल अयूब से मुलाकातें करते थे. साथ ही उनपर ये आरोप भी लगने लगे थे कि वे आजाद कश्मीर चाहते हैं. कश्मीर साजिश के बारे में ये भी कहा जाता है कि नेहरू के प्रिय मित्र होने के कारण भी कई नेता शेख अब्दुल्ला को उनकी नजरों से गिराना चाहते थे. इसी कोशिश में उनपर आजाद कश्मीर का आरोप लगा दिया गया.

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कहा जाता है कि साल 1950 में खुफिया एजेंसियों को कई इनपुट मिले जो इसी ओर इशारा करते थे. IB के उस वक्त के चीफ बीएन मलिक ने अपनी एक किताब 'नेहरू के साथ मेरे दिन' में दावा किया था कि 1953 में शेख अब्दुल्ला ने विदेशी गुप्तचर एजेंसी के अधिकारियों के साथ बैठक की थी. इसके मुताबिक साल 1953 में वे कश्मीर को आजाद देश बनाने की बात करने वाले थे. इसके बाद ही शेख अब्दुल्ला को गिरफ्तार कर लिया गया.

शेख अब्दुल्ला के करीब 11 साल तक जेल में रहने के बाद सरकार ने उन पर से सारे आरोप वापस ले लिए थे. जब शेख अब्दुल्ला जेल से छूटकर वापस कश्मीर पहुंचे तो किसी हीरो की तरह उनका स्वागत किया गया. कहा जाता है कि नेहरू तब भारत और पाकिस्तान के रिश्तों की बेहतरी के लिए उनका साथ चाहते थे लेकिन वो नेहरू जी का आखिरी वक्त था.
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