पुण्यतिथि: शिव दयाल साहब, जिन्होंने राधास्वामी सत्संग की नींव रखी

शिव दयाल साहब राधा स्वामी सत्संग के संस्थापक थे

बालक शिव दयाल (Shiv Dayal Saheb) ने देखते ही देखते हिंदी, उर्दू, फारसी समेत कई भाषाओं पर समान अधिकार कर लिया था. लेकिन आगे चलकर सांसारिक कामकाम की बजाए वे धर्म और आध्यात्म से जुड़े और इस तरह राधास्वामी सत्संग (Radha Swami Satsang) की शुरुआत हुई.

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    भारत समेत दुनिया के लगभग 90 देशों में फैले राधा स्वामी सत्संग में लाखों लोग आस्था रखते हैं. इसपर आस्था रखने वाले सिख और हिंदू दोनों ही हैं. आज इसी राधास्वामी सत्संग के संस्थापक शिव दयाल साहब की पुण्यतिथि है. उन्होंने अपने अनुयायियों को सत्कर्म करते हुए जीवन चलाने की सीख दी थी.

    बचपन में ही दिया तीव्र बुद्धि का प्रमाण 
    आगरा में 24 अगस्त, 1881 में जन्मे शिव दयाल साहब जन्माष्टमी के दिन दुनिया में आए थे. इससे उन्हें बचपन से ही खास माना जाने लगा. माता-पिता हाथरस के एक संत तुलसी साहब को मानते थे और उन्हीं के नाम पर बालक का नाम तुलसी राम पड़ा. बालक आम बच्चों की तरह बढ़ने लगा लेकिन सीखने में उसकी प्रतिभा देखकर लोग हैरान रह जाते थे.

    भाषाओं पर विशेष अधिकार 
    पांच बरस की उम्र में तुलसी राम को स्कूल भेजा गया. वहां जल्द ही उन्होंने एक साथ कई भाषाओं पर अधिकार कर लिया. वे हिंदी और उर्दू समेत फारसी और गुरुमुखी जैसी एकदम अलग भाषाएं ऐसे बोला करते थे जैसे वो इसी के साथ जन्मे हों. थोड़े दिनों के भीतर बालक ने स्कूल के तमाम विद्यार्थियों को पीछे करते हुए अरबी और फिर संस्कृत भी सीख डाली.

    shiv dayal saheb
    शिव दयाल साहब का मूल नाम तुलसी राम थास जो उन्हें माता-पिता ने दिया था


    घर के धार्मिक माहौल का असर भी तुलसी पर
    वैष्णव परिवार में पलते-बढ़ते हुए वे भी हरदम कृष्णभक्ति में लीन रहने लगे. उस समय की मान्यता और चलन के मुताबिक इसी बीच बालक तुलसी का विवाह तय कर दिया गया. फरीदाबाद की लड़की थी, जिसका नाम था नारायणी देवी. बालिका भी आते ही पति के रंग में ढल गई और पूजा-पाठ करने लगी. कच्ची उम्र की नारायणी को पति के सीखने और भक्ति में समय बिताने पर कोई एतराज नहीं था, बल्कि वे उनपर आस्था रखने लगीं.

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    ऐसे हुई कामकाज की शुरुआत 
    साहूकार परिवार में जन्मे तुलसी राम पर शादी के बाद गृहस्थी चलाने की दबाव आया. कई भाषाओं का जानकार होने के कारण उन्हें काम मिलने में खास समस्या नहीं हुई और बांदा के एक सरकारी दफ्तर में फारसी के विशेषज्ञ का काम मिल गया. वे काम पर जाने लगे लेकिन दफ्तरी माहौल समेत कई बातें उन्हें अच्छी नहीं लगीं.

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    नौकरी छोड़कर घर लौट आए 
    वहां की नौकरी छोड़कर वे वल्लभगढ़ एस्टेट के ताल्लुका में फारसी टीचर के तौर पर काम करने लगे. सब ठीक चल रहा था लेकिन तुलसी राम को सांसारिक बातों में रुचि नहीं थी. शानदार तनख्वाह वाली वो नौकरी भी उन्होंने कुछ समय बाद छोड़ दी और घर लौट आए.

    shiv dayal saheb
    राधा स्वामी सत्संग में लाखों लोग आस्था रखते हैं


    सत्संग की शुरुआत हुई 
    यहां से तुलसी राम में वो बदलाव दिखा, जिसने उन्हें शिव दयाल साहब बना दिया. वे धार्मिक काम करने लगे. लगातार पूजा-पाठ में रमे दिखते. आखिरकार साल 1861 में उन्होंने खुद को संत सत्गुरु की तरह पेश किया. जल्द ही उनके अनुयायी बढ़ने लगे. वे आसान भाषा में हर तरह के लोगों को ईश्वर से जुड़ने का संदेश देते. उनका यकीन था कि इंसान केवल ईश्वर के नाम जाप से अपनी उच्चतम क्षमता को पा सकता है. साथ ही समुदाय में सच्चे लोगों के संपर्क यानी सत्संग को महत्व दिया गया. इन बातों को समझाते हुए शिव दयाल साहब ने दो पुस्तकें लिखीं, जिनमें से एक गद्य और एक छंदमय है.

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    आगरा में ही बनी समाधि 
    साल 1878 के 15 जून को सत्संग की प्रेरणा देते हुए ही शिव दयाल साहब का निधन हो गया. उनके गृहनगर आगरा में ही एक बगीचे में अस्थियां रखकर उनकी समाधि बनाई गई ताकि अनुयायियों को रास्ता मिलता रहे. इस बगीचे का नाम उनके नाम पर दयाल बाग रखा गया.

    दो खेमे हो गए राधास्वामी सत्संग के 
    उनके निधन के बाद राधा स्वामी संप्रदाय दो गुटों मे बंट गया. मुख्य समूह तो आगरा में ही दयाल बाग के पास है, जहां उनकी समाधि है. वहीं एक और समूह बना, जिसे उनके ही एक सिख अनुयायी जयमाल सिंह ने शुरू किया. अमृतसर के पास व्यास नदी के तट पर इस दूसरे समूह का कामकाज चलता है. इस पंथ को मानने वाले खुद को व्यास से राधा स्वामी कहते हैं.

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