बीमार होने पर चींटियां भी हो जाती हैं आइसोलेट, शोध में हुए अनोखे खुलासे

बीमार चींटी खुद को आइसोलेट कर लेती है- सांकेतिक फोटो (pixabay)

बीमार चींटी खुद को आइसोलेट कर लेती है- सांकेतिक फोटो (pixabay)

एक खतरनाक फफूंद की चपेट में आने पर चींटी खुद को आइसोलेट (sick ant isolate herself) कर लेती है. वहीं साथी चींटियां उसके काम बांट लेती हैं और दूर से ही बीमार की देखभाल भी करती हैं.

  • News18Hindi
  • Last Updated: January 9, 2021, 7:22 AM IST
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कोरोना के साथ ही लगातार जो बात सुनने में आ रही है, वो है सोशल डिस्टेंसिंग (social distancing). अब भी इस महामारी के रहस्यों से जूझ रहे वैज्ञानिक एक सुर में मान चुके हैं कि कोरोना के लक्षण दिखने पर दूरी बनाना ही बेहतर है ताकि संक्रमण न फैले. आपको ये जानकर हैरानी होगी कि सोशल डिस्टेंसिंग का ये कंसेप्ट खुद को सबसे ज्यादा IQ का मानने वाले इंसानों में ही नहीं, बल्कि मामूली समझी जाने वाली चींटियों में भी मिलता है.

कैसे किया गया शोध

यूनिवर्सिटी ऑफ लुसेने, स्विटरजरलैंड की शोध टीम ने लेसियस नाइजर (Lasius niger) प्रजाति की चींटियों पर एक शोध किया, जिसके नतीजे सोशल डिस्टेंसिंग का सीधा उदाहरण हैं. इसके लिए उन्होंने चींटियों की बस्ती जिसे कॉलोनी भी कहते हैं, का चुनाव किया, जहां ज्यादा संख्या में चींटियां रहती थीं. इन बस्तियों में लगभग 22सौ चींटियों की रिहाइश थी. यहां पर इंफ्रारेड कैमरा लगाया गया ताकि उनकी हरेक गतिविधि पर नजर रखी जा सके.

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शोध टीम ने लेसियस नाइजर (Lasius niger) प्रजाति की चींटियों पर एक शोध किया- सांकेतिक फोटो (pixabay)

संक्रमण डाला गया

इसके बाद लगभग 10 प्रतिशत चींटियों को Metarhizium brunneum यानी एक ऐसे फंगस के संपर्क में लाया गया जो चींटियों में बीमारी फैलाने का काम करते हैं. शोधकर्ताओं ने इस फंगस का लो-डोज उन्हें दिया ताकि वे मरे नहीं लेकिन उनकी काम करने की क्षमता कम हो जाए. वैसे आमतौर पर इस फंगल इंफेक्शन से चींटियों की एक से दो दिनों के भीतर मौत हो जाती है.

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बीमार चींटियां हो गईं अलग

ऑस्ट्रिया के इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस एंड टेक्नोलॉजी की मुख्य शोधकर्ता सिल्विया क्रेमर के अनुसार फंगस के संपर्क में आने के बाद चींटियों का व्यवहार बदल गया. बीमार चींटियां अपने साथियों से दूर रहने लगीं ताकि उनकी बीमारी दूसरों को न लग जाए. बीमार चींटियां साथ रहने लगीं और मुख्य दल से एकदम अलग-थलग हो गईं.

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बीमार चींटियां खासकर शिशु और रानी चींटियों से अलग रहने लगीं ताकि उनकी जिंदगी खतरे में न आए. ऐसा करने की प्रक्रिया में मरीज चींटियां काम या तो बंद कर देती हैं या उसे न्यूनतम कर देती हैं, जिससे वे दल से दूर रह सकें. ये हम लोगों की सिक-लीव से मिलती-जुलती प्रक्रिया है.

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बीमार चींटियां अपने साथियों से दूर रहने लगीं ताकि उनकी बीमारी दूसरों को न लग जाए-सांकेतिक फोटो (pixabay)


एंटीबॉडी की भी समझ

शोध में पाया गया कि अक्सर बाहर खाना एकत्र करने वाली चींटियां पैथोजन के संपर्क में आती और बीमार होती हैं. ऐसे में वे बाकी समूह से खुद को अलग-थलग कर लेती हैं. ये एक तरह से वैक्सिनेशन की तरह काम करता है. दोबारा उसी पैथोजन के संपर्क में आने पर चींटियों में प्रतिरक्षा तंत्र तेजी से काम करता है और पैथोजन उन पर बेअसर रहता है.

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इंसानों को सीखने की जरूरत 

चींटियों के इस अनोखे व्यवहार को देखने के बाद शोधकर्ता नताली स्ट्रोमीट कहती हैं कि हमें संक्रामक बीमारियों को फैलने से रोकने के लिए चींटियों का व्यवहार अपनाने की जरूरत है. साथ ही साथ ये देखने की जरूरत है कि बीमार चींटी को दूसरी चींटियां आइसोलेशन में छोड़ नहीं देतीं, बल्कि उसकी सारी जरूरतें पूरी करती हैं और आपस में उसकी जिम्मेदारी भी बांट लेती हैं.

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चींटियों के दो पेट होते हैं. एक पेट में इकट्ठा खाना वे खुद खाती हैं तो दूसरे पेट का खाना वे साथियों के लिए ले जाती हैं- सांकेतिक फोटो (pixabay)


चींटियों पर शोध का औचित्य क्या है

यहां से भी समझने की जरूरत है कि आखिर चींटियों पर शोध क्यों किए जा रहे हैं, जबकि उनकी संरचना इंसानों से अलग है. दरअसल चींटियों को खास तवज्जो दी जा रही है, क्योंकि ये माना जाता है कि उनमें 'सुपरह्यूमन पावर' होती है. वे अपने वजन से लगभग 50 गुना ज्यादा वजन उठा सकती हैं. वहीं एशियन वेबर चींटी अपने वजन से सौ गुना ज्यादा वजन उठा लेती है. कान न होने के बाद भी ये नन्हा सा जीव वाइब्रेशन के जरिए साथी चींटियों का सिग्नल सुनता है.

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सबसे दिलचस्प तथ्य ये है कि चींटियों के दो पेट होते हैं. एक पेट में इकट्ठा खाना वे खुद खाती हैं तो दूसरे पेट का खाना वे साथियों के लिए ले जाती हैं. इस प्रक्रिया को trophallaxis कहते हैं. हर चींटी को अपनी उम्र और योग्यता के अनुसार अलग काम दिया जाता है. जैसे नई-नई मां बनी चींटियां शिशु चींटी की देखभाल तो अधिक उम्र की चींटियां खाना लाती हैं. बिना भाषा के भी ये आपस में संवाद करती हैं, जिसे विज्ञान की भाषा में 'एंटरनेट' नाम दिया गया है. एक खास हार्मोन के जरिए ये कनेक्शन बनता है और आपसी तालमेल का काम करता है.
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