सिक्किम: ऐसी सीट जहां साधु ही प्रत्याशी और साधु ही वोटर, नक्शे पर दिखती ही नहीं ये विधानसभा

सिक्किम: ऐसी सीट जहां साधु ही प्रत्याशी और साधु ही वोटर, नक्शे पर दिखती ही नहीं ये विधानसभा
यह पूरे भारत में मौजूद एक ऐसी विधानसभा है जिसकी कोई सीमा नहीं है. सिक्क‌िम के मैप में यह विधानसभा दिखाई ही नहीं देती.

यह पूरे भारत में मौजूद एक ऐसी विधानसभा है जिसकी कोई सीमा नहीं है. सिक्क‌िम के मैप में यह विधानसभा दिखाई ही नहीं देती.

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लोकसभा चुनाव 2019 के साथ नॉर्थ-ईस्ट के दो राज्यों अरुणाचल प्रदेश और सि‌क्किम में विधानसभा चुनाव भी संपन्न हुए. दोनों ही राज्यों में बीते 11 अप्रैल को पहले चरण के मतदान के दौरान वोटिंग हुई और अब गुरुवार यानी 23 मई को नतीजे आना तय है. कहा जा रहा है कि मतगणना के दौरान पहले विधानसभा चुनावों के लिए दिए गए मतों की गिनती की जाएगी. मतगणना से ठीक पहले सिक्क‌िम की उस एक आरक्षित सीट के बारे में जानिए, जो सिर्फ बौध मंक (बौध सतं, साधु) के लिए आरक्षित है.

सिक्किम में कुल 32 विधानसभाएं हैं. इनमें विधानसभा संख्या 32, सांघा, एक ऐसी विधानसभा सभा है जो मठवासी समुदाय के लिए आर‌क्षित है. मुख्य चुनाव अध‌िकारी के कार्यालय से जारी हुई जानकारी के अनुसार यहां कुल 51 मठों को चिह्नित किया गया, जहां वोटिंग हुई.

सिक्किम के सीईओ आर तेलंग के अनुसार इस विधानसभा में कुल 3,293 वोटर हैं. इनमें 3,224 केवल बौध धर्मी संत हैं. इसके अलावा बचे 69 वोट नन के हैं. जानकारी के अनुसार यहां कुल 51 पोलिंग स्टेशन बने. यहां वोटिंग के लिए दो तरह की व्यवस्था की गई, पहली विधानसभा चुनावों के लिए और दूसरी लोकसभा चुनावों के लिए.



सैकड़ों साल पुराने हैं यहां की परंपराएं
साल 2014 में हुए चुनाव में सिक्क‌िम क्रांतिकारी मोर्चा के सोनम लामा ने यह सीट जीती थी. द हिन्दू से बातचीत के दौरान उन्होंने बताया कि इस क्षेत्र में सैकड़ों साल पुरानी परंपराएं हैं. लामा कहते हैं सिक्क‌िम साल 1975 में भारत का हिस्सा बना. इससे पहले वहां बौद्धों का ही राज हुआ करता था. यहां राजा परंपरा थी. हालांकि यहां राजा चुनने की प्रक्रिया में आम लोगों की मुख्य भूमिका थी.

नक्शे पर है ही नहीं ये सीट!
सिक्किम डेमोक्रेटिक फ्रंट से इस सीट पर उम्मीदवार रहे शेरिंग लामा बताते हैं कि संविधान की धारा 371 (एफ) से इस विधानसभा के अधिकारों की रक्षा होती है. अस्ल में, यह पूरे भारत में मौजूद एक ऐसी विधानसभा है जिसकी कोई सीमा नहीं है. सिक्क‌िम के मैप में यह विधानसभा दिखाई ही नहीं देती.

इसकी वजह ये है कि सिक्क‌िम का यह हिस्सा पहले भारत का हिस्सा नहीं हुआ करता था. लेकिन, साल 1975 में हुई संधि में यह भारत का ‌हिस्सा बना. इसके बाद पहली बार 1977 में यहां पहली दफा चुनाव हुआ. लेकिन तब सीमाओं को लेकर कोई लकीर नहीं बनाई गई. तनाव को देखते हुए कभी इस पर गौर नहीं किया गया कि सिक्किम की इस विधानसभा की सीमाएं कहां तक हैं. हालांकि प्रदेश में पंजीकृत वोटरों के आधार पर ही चुनाव कराया जाता है.

लामा- भूटिया और लेप्चा समुदाय के लोग
असल में पूरे सिक्किम में तीन तरह के लोग हैं, जिनमें भूटिया- बौध धर्म को मनने वाले, लेप्चा भी बौध के अनुयायी है. हालांकि वहां बसे ज्यादातर नेपाली लोग हिन्दू धर्म को मानते हैं. लेकिन सांघा में केवल बौध के मानने वाले ही रहते हैं.

इस विधानसभा में एक-एक वोट के इतने मायने
साल 2014 के विधानसभा चुनावों में यहां महज 124 वोटों के अंतर से हार-जीत हुई थी. बेहद कम वोटर्स वाली इस विधानसभा में मुख्य रूप से सिक्‍किम क्रांतिकारी मोर्चा, सिक्किम डेमोक्रेटिक फ्रंट में रहती हैं. हालांकि सीट पर कांग्रेस भी अपनी पकड़ रखती है. लेकिन बीते कई चुनावों से कांग्रेस को यहां जीत नसीब नहीं हुई है.

जानकारी के अनुसार हर बार चुनाव आने पर वोटिंग वाले दिन सभी संत अपनी रोजमर्रा के धार्मिक अनुष्ठानों को वोट करने के लिए मठों तक पहुंचते हैं.

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