Syed Ahmad Khan Death Anniversary- फतवे तक झेले थे मुस्लिम शिक्षा के लिए

सर सैयद अहमद (Sir Syed Ahmad Khan) एक सही मायनों में मुस्लिम शिक्षाविद थे. (फाइल फोटो)

सर सैयद अहमद (Sir Syed Ahmad Khan) एक सही मायनों में मुस्लिम शिक्षाविद थे. (फाइल फोटो)

27 मार्च 1898 को भारत के मुसलमानों (Muslims) के लिए आधुनिक शिक्षा (Modern Education) की शुरूआत करने वाले सर सैयद अहमद खान (Sir Syed Ahmed Khan) का निधन हुआ था.

  • News18Hindi
  • Last Updated: March 27, 2021, 6:35 AM IST
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भारतीय इतिहास (Indian History) में कुछ लोगों का यह मानना था कि मुस्लिम आधुनिक शिक्षा को अपनाने में झिझका करते थे. लेकिन सर सैयद अहमद खान (Sir Syed Ahmad Khan) ने इस धारणा को तोड़ा और मुस्लिमों को आधुनिक शिक्षा से जोड़ने में बड़ी भूमिका निभाई और अमर हो गए. 27 मार्च को सर सैयद अहमद खान की पुण्यतिथि है. उन्होंने 1898 में दुनिया को अलविदा कहा. उनकी स्थापित की गई अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी (Aligarh Muslim University) आज एक उत्कृष्ट संस्थान मानी जाती है.

कर्जे में परिवार

1817 में 17 अक्टूबर को सर सैयद अहमद तकवी बिन सैयद मुहम्मद मुताकी का जन्म दिल्ली में हुआ था. कई पीढ़ियों से उनका परिवार मुगल प्रशासन के पदों पर कार्यरत रहा था. लेकिन उनके बचपन में उनका परिवार कर्ज में था. 22 साल की उम्र में उनके पिता का निधन हो गया. इसके बाद उन्हें परिवार का खर्च उठाने के लिए बहुत कम उम्र से नौकरी शुरू करनी पड़ी थी.

परिवार को बोझ और नौकरी
सर सैयद अहमद ने 1830 में ईस्ट इंडिया कंपनी में क्लर्क के पद पर काम करना शुरू किया था. उस जमाने में किसी भारतीय के लिए ईस्ट इंडिया कंपनी में नौकरी पाना आसान नहीं था. उसके बाद अपनी योग्यता से 1841 में मैनपुरी में उप न्यायाधीश हो गए और कई जगहों पर न्यायिक विभाग में काम किया. ऊंचे ओहदे पर पहुंचने के बाद भी उन्होंने हमेशा साधारण जीवन जिया.

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सर सैयद अहमद खान (Sir Syed Ahmad Khan) का स्थापित कॉलेज बाद में विख्यात यूनिवर्सिटी हो गया. (फाइल फोटो)


क्रांति का वह दौर



1857 की क्रांति के दौरान वो ईस्ट इंडिया कंपनी के मुलाजिम थे. जब क्रांति के दौरान उन्होंने कई अंग्रेजों को बचाया. यह भी कहा जाता है कि वे अंग्रेजों के समर्थक थे. लेकिन इस क्रांति में उनके अपने कई रिश्तेदार मारे गए. इसके बाद अंग्रेजों के प्रति उनकी धारणा बदलने लगी. हालत ये हो गई कि वो देश छोड़कर मिस्र में बसने के बारे में सोचने लगे उन्होंने क्रांति के बाद असबाब ए बगावत ए हिंद नाम की किताब भी लिखी जिसमें उन्होंने इस धारणा को खारिज किया कि क्रांति कुछ मुस्लिम अमीरों की साजिश थी.

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स्कूलों की स्थापना

1850 के दशक के दौरान उन्हें भारत के मुसलमानों के भविष्य की बहुत चिंता हुई.  उन्हें पश्चिमी शिक्षा के फायदे दिखाई देने लगे. वे गणित, चिकित्सा और साहित्य कई विषयों में पारंगत थे. कहा जाता है कि जहां भी उनका तबादला होता था, वहां वे स्कूल खोल देते थे. मुरादाबाद में उन्होंने पहले मदरसा खोला, पर जब उन्हें लगा कि अंग्रेजी और विज्ञान पढ़े बिना काम नहीं चलेगा तो उन्होंने मुस्लिम बच्चों को मॉडर्न एजुकेशन देने के लिए स्कूलों की स्थापना की.

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सर सैयद अहमद खान (Sir Syed Ahmad Khan) पर यह भी आरोप लगा कि उन्होंने मुस्लिम शिक्षा की आड़ में अपना राजनैतिक एजेंडा चलाया. (फाइल फोटो)


जब उन्होंने मुस्लिमों को अंग्रेजी के साथ आधुनिक शिक्षा उपलब्ध कराने के लिए कॉलेज की नींव डाली तो खुद धार्मिक मुसलमानों ने उनकी बहुत आलोचना की. मुसलमान उन्हें कुफ्र का फ़तवा देते रहे. तब उन्हें मौलवी काफिर भी कहते थे. उन्हें उर्दू भाषा का बहुत बड़ा पैरोकार माना जाता है. शुरुआत में हिंदू मुस्लिम एकता के समर्थक सैयद बाद दोनों के लिए अलग अलग राष्ट्र के हिमायती बन गए थे.  उन्होंने अपने जीवन के अंतिम दो दशक अलीगढ़ में बिताए थे जहां का कॉलेज आज अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के नाम से जाना जाता
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